गुरुवार, जून 04, 2020

बासु चैटर्जी : रजनीगंधा की महक




बासु चैटर्जी को उनकी फिल्म रजनीगंधा की याद के साथ प्रणाम 



कई साल पहले एक शाम एक फिल्म देखी थी - नाम था रजनीगंधा। तकनीकी बारीकियांफिल्म माध्यमतब भला कहां समझ में आती थीं‎‎। पर फिल्म की छवियां थीं कि मन में अटकी रह गई थीं। कुछ था जो मुंबइया फिल्मों की भीड़ से अलग था। बेहद सहज और अपने आसपास की दुनिया के पात्र और चेहरे। नकली और झूठा सा तो कुछ भी नहीं था। न जोरदार संगीतन शब्दबहुल नाटकीयता न चकाचौंध और ग्लैमर कहानी प्रेम से जुड़ी थी जिसमें एक स्त्री और दो पुरुष छवियां थीं। दोनों पुरुषों के व्यक्तित्व कितने अलग-अलग थे। पर दोनों अपनी अपनी तरह से भले लगते थे। कोई खलनायक न था। न कोई नायक था। बस एक कोमल सी कहानी में एक कोमल सी नायिका और उसके प्रेम को लेकर या कहें प्रेमपात्र को लेकर एक उलझन।

फिर कुछ अंतराल के बाद मन्नू भंडारी की कहानी पढ़ी - नाम था यही सच है। एक एक पंक्ति पढ़ते हुए मन उमगने लगा था। और रहस्य खुलता गया था कि इसी कहानी पर ही तो बनी होगी वह फिल्म। सभी कुछ तो वही है - दीपा की इंतजार करती आंखेंवो खुद कभी बालकनी से झांकती तो कभी कमरे के भीतर आतीकिताब खोलती कभी बंद करतीकभी अलमारी खोलतीकभी दीवार घड़ी की सुइयों को देखकर परेशान सी होती। हवा से पर्दा कांपता और वह चिंहुक कर उस तरफ देखती कि शायद संजय आ गया। वाह क्या कहानी थी! जैसे कोई खूबसूरत नीलाभ पारभासी पत्थरजिसे प्रकृति ने ताप और ठंडक के मेल से बनाया हो - भीतर तक जिसमें रंग और बुलबुले दिखते थे। कितना अनूठा था कथ्य और उतना ही अनूठा शिल्प भी। लय से भरा हुआमानो आलाप की नींव से एक संगीत लहरी धीरे धीरे ऊपर उठती जाती है। लेकिन अनूठा होकर भी शिल्प इतना सहज था जैसे एक डाल पर से दो टहनियां फूटें और उनमें अपनी अपनी कोंपलें और फूल पत्ते हवा के झोंको में लरजने लगें। 


प्रेम पर अनेक कहानियां लिखी गई हैं। स्वयं मन्नू ने भी प्रेम पर कई कोणों से कई बार लिखा है। पर यह कहानी प्रेम के पारंपरिक मिथक को जिस मासूमियत सेबिना किसी क्रांतिकारी तेवर के ध्वस्त करती हैउसकी मिसाल शायद ही मिले। खासकर स्त्री मन का ऐसा निर्वचन शायद तब तक हुआ नहीं था। कहानी में बाहरी तौर पर कोई बड़ी घटना नहीं घटतीकोई लंबा चौड़ा इतिवृत्त नहीं बनताफिर भी एक छोटी सी परिस्थिति से मन:स्थितियां बदलती हैंकुछ ऐसेजैसे रेगिस्तान में हवाएं चलने से रेत के बदलते आकारों से भूदृश्य बदल जाता है। पूरी कहानी में पल पल मन की तरगें कभी उठती हैंकभी गिरती हैं। वृत्त बनते जाते हैं। एक पल उमस भरा है तो दूसरे ही पल हवा का झोंका आ जाता है। यानी यह मन:स्थितियों की ही कहानी है । अंतत: भीतर ही भीतर एक द्वन्द्व में उलझती दीपा की कहानी। लेकिन उलझने का स्पेस भी तो जब कोई खुद को देता हैविशेषकर स्त्रीतो मन की यह उड़ान एक खास चेतना की परिचायक बन जाती है। मन को टटोलनाईमानदारी से भावों के आधार पर प्रेम में चुनाव के संकट से जूझनायह जोखिम उठानास्त्री की एक अभूतपूर्व छवि की रचना करता है। कई सवालों के बीज कहानी से फूटते हैं। क्या प्रेम कोई स्थिर धारणा हैक्या एकनिष्ठता ही प्रेम का चरित्र हैक्या अतीत बस अतीत हो जाता हैक्या वह नया जन्म लेकर हमारे सम्मुख लौटता नहींऔर क्या वर्तमान को अतीत बनते बहुत देर लगती हैऔर फिर इसके अलावा प्रेम की अभिव्यक्ति और संप्रेषण के उजले और धुंधले कितने स्तर हैंकितने चौड़े रास्ते और संकरी गलियां हैंक्या प्रेम मादक कल्पना और रोमान से जन्म लेता हैया सहज स्वाभाविक मैत्रीपूर्ण अंतरंगता का नाम प्रेम है?

कहानी एक पढ़ी-लिखी युवती दीपा की हैउसकी नजर से और उसी की जुबां में लिखी गई है। दीपा कानपुर में अकेली रहती है और अपने थीसिस पर काम कर रही है। वह संजय नाम के एक युवकजो एक ऑफिस में काम करता है से प्रेम करती है। अक्सर उन दोनों की शामें कभी घर तो कभी बाहर घूमते हुए साथ कटती हैं। कहानी की शुरुआत ही दीपा के इंतजार से शुरू होती है। यह इंतजार पूरी कहानी में रूप और पात्र बदल-बदल कर आने वाला मोटिफ है। उसी तरह एक सहज पर मार्मिक मोटिफ विदा करने का भी है। इन सब के बीच जगहों कीपात्रों की भूमिकाएं शिफ्ट होती रहती हैं‎‎। चीजें वही रहती हैं पर आलंबन बदल जाते हैं

मन्नू भंडारी ने दीपा में ही दो तरह की छवियों को अंकित किया है। इंतजार में भटकते मन और निगाहों वाली तथा सपनों के रोमांच में खोई खोई सी दीपातथा अचानक विभक्त-मनाउलझीअसुरक्षित और कातर दीपा। कहानी में संजय के व्यक्तित्व की रेखाएं कम सहीपर बड़े अचूक ढंग से उसे अंकित कर देती हैं कि प्रेम के अलावा भी वह पूरी दुनिया में डूबा है। उसका व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा सरल है कि वह जहां हो वहीं का हो कर रह जाता है। अत: बार बार देर से आना उसकी आदत बन गई है। पर वह दिल का साफ और बच्चे की तरह मासूम है इसलिए लाड़ दुलारप्रेम मनुहार करके दीपा को मना भी लेता है।

दीपा का एक अतीत भी है जब पटना में पढ़ाई करते हुए उसने निशीथ से प्रेम किया था। फिर किसी बात पर वह संबंध निशीथ की ओर से टूटा था और अपने पीछे अपमान का तिक्त स्वादआंसुओं का ज्वार और घनी रिक्तता छोड़ गया था। अत: अब निशीथ का नाम मजाक में भी सुनना उसे पसंद नहीं।  

लेकिन कहानी में मोड़ तब आता है जब दीपा को नौकरी के सिलसिले में इंटरव्यू देने अकेले कलकत्ता जाना पड़ता है। वहां एक नए परिवेश में अचानक उसकी भेंट फिर से अपने अतीत यानी निशीथ से हो जाती है। निशीथ दीपा की नौकरी के लिए पूरी तरह जुट जाता है। इधर दीपा इन तीन चार दिनों के साथ में उसकी अनकही भावनाओं का आकलन करते करते अपने ही मन में विभक्त होने लगती है। एक गहरे नैतिक संकट के तहत उसे लगता है कि निशीथ को संजय के बारे में सब बता देना चाहिए ताकि किसी तरह की गलतफहमी न रहे। पर दूसरी ओर अनकहे आकर्षण के चलते उसके ओंठ भी नहीं खुलते ... ।

अपने लिए खामोशी से इतना कुछ करते देख और अतीत की मंद रोशनी में उसका हृदय पिघलने लगता है। कभी जिज्ञासा होती हैकभी हल्की सी मोह भरी सहलाहट। और वह चाहने लगती है कि वह साफ साफ कह क्यों नहीं देता। वह उसके पसंदीदा रंग की नीली साड़ी पहन लेती है। साथ कॉफी पीते हुए निशीथ के कांपते ओठों की धड़कन तक महसूस करती है। और एक वह क्षण आता है कि वह चाहने लगती है कि निशीथ हाथ बढ़ाए और उसे छू ले। उसे घेर ले एक आलिंगन में। पर मानो निशीथ का हृदय बस फड़फड़ाता है

फिर कलकत्ता और निशीथ से विदा होने का वह क्षण आता है जब निशीथ को देखते हुए उसकी आंखें कातर हो उठती हैं। वह सुनना चाहती है वह बात जो उसके कानों और हृदय में बज रही है। गाड़ी की सीटी के साथ आंखें छलछलाती हैं और झटके से गाड़ी के सरकने पर आंसू बह आते हैं... और तब निशीथ के हाथ का क्षणिक स्पर्श ....‎ 



 पूरी कहानी दृश्य-गंध-ध्वनि और गति को शब्द के माध्यम से आंकती एक फिल्म जैसी ही है। कहानी में रजनीगंधा के फूलों की महक भरी है। कहानी की एक एक भंगिमाएक एक वाक्य ऐसा है कि फिल्मकार कुछ भी कहां छोड़ पाया है। उसने शब्द की हर भंगिमा को अपनी निजी भाषा में ढाला है। जिस तरह किसी चित्र को देखते हुए हम चित्रकार की दृष्टि के भी रूबरू होते हैंउसी तरह फिल्म को देखने से आभास होता है कि फिल्मकार कहानी पर इतना मुग्ध है कि न केवल ऐसे ऑफबीट विषय को फिल्म के लिए चुनने का जोखिम उन्होंने उठायाबल्कि कहानी के सौंदर्य से छेड़छाड़ किए बगैर उसे बरकरार रखने की कोशिश भी की हैउसे पूरा सम्मान दिया है। फिल्मकार इस मार्मिक कहानी की उंचाई तक फिल्म को पहुंचाना चाहते थेउसकी सूक्ष्मता और मानवीय सार को व्यक्त करना चाहते थे। विश्व फिल्म इतिहास में ऐसा कम हुआ है कि अच्छी कहानी या उपन्यास पर फिल्म भी उसी स्तर की बनी हो। पर यह फिल्म इस दृष्टि से अपवाद है

फिल्म माध्यम की अनिवार्यता के तहत फिल्मकार ने जहां कुछ तब्दीलियां और सरलीकरण किए हैंवहीं कुछ विस्तार अैर पल्लवन भी फिल्म के हक में किए हैं

फिल्म ने कथा के दृष्टिकोण को लगभग यथावत् रखा है। यानी फिल्म भी दीपा के ही दृष्टिकोण से कही गई है। मन्नू भंडारी इस तकनीक की - बेहद सांद्र तकनीक कीबड़ी माहिर प्रयोक्ता रही हैं - हम याद कर सकते हैं आपका बंटी और त्रिशंकु की युवा होती किशोरी को। यह कहानी के शिल्प का बहुत महत्वपूर्ण पक्ष है कि कहीं भी लेखिका अपने या दूसरे पात्रों की नजर से कुछ नहीं कहती। जो कुछ भी प्रतिबिंबित हो रहा है वो सब दीपा के दृष्टिबिंदु से और उसी के मन में हो रहा है। लेकिन फिल्मकार के लिए इसे यथावत दिखाने में बड़ी चुनौती छिपी थी। दीपा के मन में हर पल चलने वाली उलझनबाहरी खामोशी के भीतर चलने वाले संवादों-प्रतिसंवादोंएकालापों कोविस्मय और संवेग के तमाम उद्गारों को कैसे दिखाया-सुनाया जाए। पर बासू चैटर्जी जैसे फिल्मकार ने इसके लिए अपने माध्यम को तरह तरह से आविष्कृत किया। क्योंकि वह इस कहानी को उसी रूप में और उन्हीं डिटेल्स के साथअपने माध्यम में दर्शकों को सुनाना चाहते थेजिस रूप में यह मन्नू जी की कलम से निकली थी। 



कहानी के शिल्प को खुला छोड़ दिया गया है। यानी आदि से अंत वाली कालक्रमिकता यहां नहीं है। कहानी दो समय खंडों में और दो स्थानों में आवाजाही करती है। फिल्म में भी कहानी के उस मूल शिल्प को बरकरार रखा गया है जिसमें पूरी कहानी दो स्थानोंदो भूगोलों या दो परिवेशों में बंट जाती है। ये दो स्थान मूल द्वन्द्व का प्रतीक बन जाते हैंये संजय और निशीथ के प्रतीक बन जाते हैं - दीपा के वर्तमान और अतीत के प्रतीक। इनमें भविष्य के अंकुर अलग अलग ढंग से फूटना चाहते हैं। दोनों स्थानों का द्वन्द्व अंतत: उभरता है। पर पृष्ठभूमि में किंचित दूरस्थ अतीत में पटना भी है जहां पिता और भाई-भाभी के संरक्षण में पढ़ते हुए सत्रह साल की उम्र में दीपा ने निशीथ से प्रेम किया था

लेकिन फिल्म में सुविधा के लिए कानपुर और कलकत्ता को दिल्ली और मुंबई में बदल दिया गया है। यों दिल्ली की सुरम्यता पेड़ों की कतारों वाली चौड़ी सड़कोंपृष्ठभूमि की मुगलकालीन इमारतोंमकबरों के अलावा बसों और बस-स्टापों के बीच मध्यवर्गीय जीवन में मूर्त होती है। यद्यपि ये दिल्ली की टिपिकल छवियां नहीं हैं। फिल्म में मुंबई किंचित मांसलता से उभरती हैअपने शरीर और आत्मा के साथ। जिसमें टैक्सी की खिड़की से भागते दृश्य हैं तो वहां का व्यस्त जीवनचिपचिपा पसीनापानी की समस्याजमीन से ऊंचे घर और लिफ्टेंमैजिक आई से देखना भी है। निशीथ का काम (फिल्म में इसका नाम नवीन है) फिल्म में मूर्त हो जाता है। यहां विज्ञापन की दुनिया उभरती है। एक पार्टी के दृश्य के जरिए फिल्मकार मुंबई के उच्चभ्रू जगत का एक चुस्त कोलाज रच देता है। पार्टी में इधर उधर झांकता कैमरा और बातों के कुछ टुकड़ों में रेस कोर्सनाटकबुटीक और फिल्म जैसे शब्द झरते हैं। इस मेलजोल के पीछे संपर्क बढ़ाकर बिजनेस पाने के निहितार्थ को भी फिलमकार ने रेखांकित कर दिया है

फिल्म में कुछ बदलाव किए गए हैं जिनसे लगता है सरलीकरण हो गया है। जैसे दीपा को नितांत अकेले नहींदिल्ली में भाई-भाभी के साथ रहते दिखाया गया है। इस बदलाव के कारण मन्नू भंडारी के पात्रों के रिश्तों के बीच जो छोटे छोटे पेंच और भंवर पड़ते हैं और जिन्हें वे छोटे से किसी संकेतवाक्य या मुद्रा से कह जाती हैंवे अनकहे तनाव यहां नहीं हैं। दूसरे अकेले रहने से जो दीपा की आत्मनिर्भर युवति की छवि कहानी में बनती हैवह फिल्म में किंचित मंद पड़ जाती है। और फिर अचानक भाई-भाभी को जाना पड़ जाता है जिससे दीपा कहानी की मूल स्थिति में आ जाती है। यह युक्ति बहुत ज्यादा समझ में नहीं जातीजैसे यह बात भी खास समझ में नहीं आती कि कानपुर को दिल्ली और कलकत्ते को मुंबई में क्यों किया गया है।

फिल्म का एक और सुंदर विस्तार दो पुरानी सखियों के मिलने के दृश्य में हुआ है। इरा के चरित्र का पल्लवन करके उसे एक प्रामाणिक रूप दिया गया है। इरा के पति की अनुपस्थिति में उनका अनौपचारिक खुला व्यवहारगिले-शिकवेछेड़डाड़ और चुहल मूर्त हो जाती है। इन दृश्यों में इरा के खुले और निस्संकोच विवाहित रूप तथा दीपा के खामोश और शर्मीले रूप का भी कहीं न कहीं एक सहज सा कंट्रास्ट है। फिल्म में नवीन और दीपा के संबंध-विच्छेद को भी छात्रों की हड़ताल से जोड़ा गया है। इस तरह बासू चैटर्जी सामाजिक और व्यक्तिगत की टकराहट के माध्यम से दो प्रेमियों की ईगो की सहज व्याख्या कर देते हैं। फिल्म और कहानी में एक और बड़ा फर्क मुंबई में दीपा और नवीन की मुलाकात से जुड़ा है। कहानी में एक कॉफीहाउस में संयोगवश इन दोनों की मुलाकात होती हैजबकि फिल्म में यह संयोग न रहकर सुनियोजित उपक्रम बन जाता है। हालांकि इसके पीछे इरा की व्यस्तता के चलते रेलवे स्टेशन पर दीपा को रिसीव करने न जा पाना है। वैसे भी मुंबई जैसे जनसमुद्र में ऐसे संयोगों की जगह नहीं है। इसलिए यह परिवर्तन आरोपित नहीं लगता।

फिल्म में कहानी के पात्रों का चरित्रांकन बहुत महत्वपूर्ण है। शायद इस कथा और फिल्म के बीच जो संवाद घटित हुआ घटा है वह इस कहानी के तीन पात्रों को लेकर है। फिल्मकार ने उन्हें चेहरा और रूप देकर स्थिर सा कर दिया है। यानी कहानी की मूर्तता पर अंतिम मुहर लगा दी है। और इसके अलावा तीनों चरित्रों को विशिष्ट मैनरिज्म देकर प्रामाणिकता और कंट्रास्ट को गहरा किया है। इससे ये चरित्र दर्शक के मन में स्थाई जगह बना लेते हैं। दीपा की सहज सुंदर पर सादा छवि को विद्या सिन्हा ने मूर्त किया है। सूती साड़ी पहने हुए उसका सादा और भावमय रूप आंखों में बस जाता है। फिल्मकार ने उसका आभरण भी बेहद सादा रखा है। सादगी भरी यह सुंदरता ही उसकी पहचान बन जाती है। क्लोजअप में कभी कभी बस एक मोती का कर्णाभूषण चमकता है। अपनी लंबी चोटी को कभी आगे कभी पीछे ले जातीअनजाने में कभी खोलती कभी गूंथती उसकी अंगुलियां एक मैनरिज्म रचती हैं और उसके खुलते और बंद होते मन की भंगिमा बन जाती हैं। कहानी तो दीपा के भीतरी स्पेस से ही रची गई है पर फिल्म को तो बाहर से ही भीतर जाना पड़ता है। फिल्म के ज्यादातर दृश्यों में दीपा चुप है इसलिए फिल्म में उसकी देहभाषा का ही बारीक अंकन है। उसकी खीझ और तुनकफिर उसका पिघल उठनाउसकी असुरक्षाउलझनकातरता को कहानी में शब्दों के जरिए व्यक्त करना इतना कठिन नहींलेकिन फिल्म में उसकी लंबी नि:शब्दता को पार्श्व संगीत सेछोटी छोटी हरकत और अभिनय से मूर्त किया गया है और मन के भीतर समानांतर चलने वाले एकालापोंउलझनों और इच्छाओं को फिल्मकार ने दृश्य को फ्रीज करके सुनाने की तकनीक अपनाई है। उसके चरित्र में भी अंतर्निहित विरोधाभास है कि वो एक स्तर पर आधुनिका और आत्मनिर्भर होकर भी हृदय के स्तर पर अपराजेय और अभेद्य नहीं है। सपनों में खोई सी या अपने में उलझी सी यह भावुक लड़की कभी कभी बेहद कातरअकेलीअसहाय और असुरक्षित नजर आती है। और इसी पक्ष को उभारने के लिए बासु दा ने फिल्म की शुरुआत एक ऐसे दु:स्वप्न से की है जहां चलती ट्रेन में वो नितांत अकेली छूट गई है या एक निचाट प्लेटफार्म पर अकेली छूट गई है

नवीन के व्यक्तित्व को फिल्मकार ने लेखिका की आंखों से ही देखा है। यह और बात है कि उसमें कुछ आयाम और जोड़ दिए गए हैं। कहानी में निशीथ का अंतर्मुखी रूप संजय के खुले और सहज व्यक्तित्व का लगभग प्रतिपक्ष ही है। कवियों जैसे लंबे बाल और दुबला संवलाया चेहरा कहानी की तरह फिल्म में भी है। तो भी संजय के बरक्स उसे थोड़ा विशिष्ट बना दिया गया है। संजय की वेषभूषा और अंदाज ऑफिस जाने वाले किसी भी आम और मध्यवर्गीय युवा का हैऔर उसके कपड़ों और बालों पर ध्यान नहीं जाता। दूसरी ओर फिल्म का नवीन सादा होकर भी कुर्ते और पतलून में दिखाई पड़ता है। उसके व्यक्तित्व में उस समय के मीडिया की दुनिया और कलात्मकता का हल्का सा पुट है। थोड़ा सा बुद्धिजीवियों वाला अंदाज और अदा। फिल्म का नवीन एक के बाद एक सिगरेट जलाता रहता है और बहुत बार उसकी आंखों पर एक गहरा चश्मा रहता है जो उसके स्वभाव की अंतर्मुखता के अनुरूप उसके भावों को छुपाए रहता है। नवीन की जो छवि फिल्म में उभरती है वह अपने समय के बौद्धिक अथवा कलाकार वर्ग की है

दूसरी ओर संजय के व्यक्तित्व को काफी विस्तार दिया गया है। अनेक सहज दृश्यों के माध्यम से उसके व्यक्तित्व और दीपा से उसके संबंध की दृश्यात्मक व्याख्या की गई है। सबसे बढ़कर इस चरित्र के माध्यम से बासु दा ने हल्के ह्यूमर की सृष्टि की है। उसके आते ही पात्रों और दर्शकों के होठों के कोरों पर एक मंद मुस्कान आ जाती है। अक्सर उमस के बाद एक खुश्बूदार हवा के झोंके की तरह वो आता है। उसका मुस्कुराता चेहरा जब जब दिखता हैफिल्म का तनाव बिखरकरधुंआ बनकर उड़ने लगता है। वह खिलखिला के दूसरों को हंसा देने वाला पात्र हैबला का बातूनी और भुलक्कड़। लेकिन अंतत: हर समस्या को गोली मारो के तकिया कलाम से उड़ा देता है। दीपा के साथ रहते हुए भी दफ्तरचीफप्रमोशनरंगनाथनमेमोरेंडम और आखिर यूनियन की मांगें उसके दिमाग में भरी रहती हैं - और कभी कभी दीपा चिढ़ भी जाती है। दिल्ली की बरसात में अपनी फटी छतरी में जिस निर्कुंठ भाव से वो दीपा को बुलाता हैवो दृश्य बेहद सुंदर ही नहींरोमान की एक नई व्याख्या भी करता है। कहानी में बार बार देर से आने का जो सूत्र लेखिका ने दिया हैफिल्मकार ने उसे तरह तरह से उठाया है। फिल्म की शुरुआत में ही थियेटर के बाहर बेचैनी से इंतजार करती दीपा का दृश्य है। एक और दृश्य में वो फिल्म आधी बीत जाने पर पहुंचता है ओर उसके बाद भी टिककर फिल्म देख नहीं पाता। इसी बिंदु पर बासु दा फिल्म में फिल्म दिखाकर मानों मुंबइया फिल्मों पर एक टिप्पणी कर जाते हैं। भड़कीले गीत, चालू नाटकीयता दि‍खाकर वे एक विरोध का आभास भी यहां दे देते हैं।

कहानी में नवीन से मिलने पर दीपा के मन में अनजाने ही जो तुलना संजय से होती जाती हैउसे भी जस का तस लिया गया है। जैसे संजय की विलंब से आने की पृष्ठभूमि में नवीन का समय से पहले आ जाना। या संजय का अपनी झोंक में दीपा की साड़ी और सौंदर्य को देखकर भी न देख पाना। जबकि तुलना में मितभाषी नवीन का यह उच्छवास, 'इस साड़ी में तुम बहुत सुंदर लग रही होदीपा को रोमांचित कर जाता है। देखा जाए तो यह भी एक सांयोगिक कंट्रास्ट ही बन जाता है कि दीपा के आग्रह के बावजूद ऑफिस की व्यस्तता के कारण संजय दीपा के साथ मुंबई नहीं जा पाता और इधर नवीन दीपा के लिए खुद को झोंक सा देता है और ऑफिस से छुट्टी तक ले लेता है 

मन्नू भंडारी 
लेकिन कहानी की खूबी यह है कि अलग अलग व्यक्ति होकर भी लेखिका की तरफ से इन विशेषताओं के बल पर कोई मूल्यांकन नहीं किया गया है। न ही इनसे प्रेम की अधिकता या न्यूनता को मापने की कोशिश की है। दोनों पुरुषों का कभी सामना भी नहीं होता। वे तो लगभग एक दूसरे के अस्तित्व तक से अनजान हैं अत: पारंपरिक प्रतिद्वंद्विता जैसा तो कुछ है ही नहीं। जो भी उलझन है वो दीपा के मन में है। वे दोनों तो अपनी अपनी तरह से दीपा से जुड़े हैं और अपने अपने अंदाज में प्रेम का अनुभव और अभिव्यक्ति भी करते ही हैं। सारा द्वन्द्व और चुनाव का सारा जोखिम तो दीपा के ही हिस्से में आया है। और एक बिंदु पर वह अपने लिए एक त गढ़ती है कि शायद प्रथम प्रेन्रेम ही सच्चा प्रेम होता है

फिल्म में संजय दीपा को मुंबई के लिए विदा करने स्टेशन तक आता हैजबकि कहानी में ऐसा नहीं है। इस दृश्य से नवीन द्वारा दीपा को विदा करने के दृश्य में समांतरता पैदा होती है और साथ ही फिल्म में एक संतुलन बनता है। विदा लेने और देने का मोटिफ और अलग होने की पीड़ा दोनों में उभरती है। लेकिन फिल्म में जिस तरह गाड़ी के चलने से पहले बहुत सी भाप इंजिन से निकलती है और स्क्रीन पर धुंए का एक बादल सा छा जाता हैउसी के बरक्स दीपा का संयम टूटता है। संवेग का वाष्प आंसू बनकर बह निकलता है।

सबसे बढ़कर है रजनीगंधा के फूलों का काव्यात्मक मोटिफ जिसका इस्तेमाल फिल्म ने भी उतनी ही खूबसूरती से किया है बल्कि फिल्मकार ने इसे एक केंद्रीय मोटिफ (अभिप्राय) के रूप में चुना है। इसीलिए ये फूल फिल्म का नाम बनते हैं। कई तरह से रजनीगंधा के फूलों का प्रयोग कई तरह से हुआ है। इन फूलों के माध्यम से प्रेम का एक ऐन्द्रिय आयाम भी उभरता है। कभी दीपा फूलों को देखती हैमंद मुस्कान के साथकभी कोमलता से उन्हें छूती और अपने गालों पर महसूस करती है। कभी खुद को आइने में फूलों के साथ निहारती है तो कभी फूलों को अपने सोने के कमरे में ले आती है। एक पूरे गीत में उनके प्रतीक को स्वर दिए गए हैं। यह पीछे छूटी प्रेम की मदिर खशबू के रूप में तो आता ही हैसंजय के अस्तित्व के साथ भी जुड़ा है। बार बार ये फूल आते हैं। दीपा के मन में संजय की उपस्थिति से वे जुड़ गए हैं।

'और अब तो मुझे भी ऐसी आदत हो गई है कि एक दिन भी कमरे में फूल न रहें तो न पढ़ने में मन लगता है न सोने में। ये फूल जैसे संजय की उपस्थिति का आभास देते रहते हैं।'

कहानी में एक जगह दीपा रजनीगंधा के अनेक फूलों में संजय की आंखें देखती है, 'जो मुझे देख रही हैंसहला रही हैंदुलरा रही हैं ', और यह कल्पना ही उसे लजा देती है। फिल्म में इस अमूर्त भाव को भी फिल्मकार ने अभिनय क्षमता से मूर्त किया है। फिल्म में भी ये बार बार दिखते हैं। संजय के आने के साथ और संजय के जाने के बाद तक भी वे एक कोने में महकते रहते हैं। कहना न होगा कि रजनीगंधा के सफेद महकते फूल एक स्तर पर संजय के खिले हुए अस्तित्व और दूसरे स्तर पर तन मन पर बरसते प्रेम भाव का प्रतीक हैं।
'लौटकर अपना कमरा खोलती हूंतो देखती हूंसब कुछ ज्यों का त्यों है सिर्फ फूलदान के रजनीगंधा मुरझा गए हैं। कुछ फूल झर कर इधर उधर भी बिखर गए हैं'

यह दृश्य मुंबई से लौट के आने के बाद का है और फूलों का मुरझाना संजय की छवि के मंद पड़ जाने से सहज ही जुड़ जाता है

नवीन को खत लिखती हुई दीपा सूने फूलदान को देखती है लेकिन फिर कतरा कर दिशा बदल कर सो जाती है

कहानी में एक और बेहद सुंदर वर्णन है । जब इंटरव्यू से मुक्त होने के बाद निशीथ के आमंत्रण पर दीपा और वह टैक्सी में बैठे हैं
'टुन की घंटी के साथ मीटर डाउन होता है और टैक्सी हवा से बात करने लगती है। निशीथ बहुत सतर्कता से कोने में बैठा हैबीच में इतनी जगह छोड़कर कि यदि हिचकोला खाकर भी रुकेतो हमारा स्पर्श न हो'

दैहिक भंगिमाओं के इस अर्थगर्भित विवरण के बाद का विवरण तो काव्य की सीमा को छूने लगता है
'हवा के झोंके से मेरी रेशमी साड़ी का पल्लू उसके समूचे बदन के स्पर्श में पड़कर फरफराता है। वह उसे हटाता नहीं है। मुझे लगता हैयह रेशमी सुवासित पल्लू उसके तन मन को रस में भिगो रहा हैयह स्पर्श उसे पुलकित कर रहा है। मैं विजय के अकथनीय आह्लाद से भर जाती हूं। ... ... जितनी द्रुतगति से टैक्सी चली जा रही हैमुझे लगता हैउतनी ही द्रुत गति से मैं भी बही जा रही हूंअनुचितअवांछित दिशाओं की ओर!'

फिल्म के लिए भी यह बहुत ही रोमानीबहुत ही गर्भित क्षण हैफिल्मकार की अभिव्यक्ति को चुनौती देने वाला। और सचमुच ही मुंबइया फिल्मों के इतिहास में एक बड़ा सूक्ष्म दृश्य रचा जाता है। लेकिन उसमें फिल्मकार को कुछ कदम और आगे बढ़ना पड़ता है। फिल्म में भी दोनों टैक्सी के अंदर दूर दूर बैठे हैं। नवीन की आंखों पर काला चश्मा है। वह अपने भावों को खिड़की के बाहर देखने की भंगिमा में छिपाने की कोशिश में है। रेशमी आंचल इस बीच की दूरी को पाटने लगता है और नवीन को छूता है। फिल्म इस सब के दौरान एक बेहद सुंदर गीत का इस्तेमाल करती है। लेकिन साथ ही साथ कैमरा नवीन के हाथ पर भी फोकस करता है जो शिथिल सा उन दोनों के बीच में है। कैमरा दीपा की उन कनखियों को भी दिखाता है जो उस हाथ को देखती हैं। और दीपा तुलना कर उठती है। उसे संजय दिखता है जो उसे बाहों में घेरे हैऔर फिर वह कल्पना कर उठती हैऔर संजय की जगह नवीन ले लेता है यानी फिल्‍मकार के लिए अभिव्‍यंजना के ये क्षण उतने आसान नहीं थे इसलिए उसे आंचल के अलावा हाथ का भी इस्‍तेमाल करना पड़ा। लेकिन ये हाथ इससे इकतरफा संकेत न रहकर नवीन के हृदय और इच्‍छा का भी वाह‍क बन जाता है। 


आज (दो हजार आठ के अंत में) साठ के दशक की ऐसी कहानी को पढ़ते हुए यह नहीं लगता कि यह बीते जमाने का द्वन्द्व है। आज भी अपने मानवीय सार के कारण यह कहानी तरोताजा लगती है। स्त्री विमर्श कहीं का कहीं पहुंच चुका है लेकिन इसने जो जमीन तोड़ी थीउसका महत्व आज भी जस का तस है। दूसरी ओर फिल्म की तकनीक में भी आमूल परिवर्तन हो चुके हैं। फिर भी यह फिल्म एक कीर्तिमान की तरह आज भी स्थापित है

चलते चलते एक और बातश्रेष्ठ कलाकृतियां जब जब एकाधिक माध्यमों में ढलती हैं तो आस्वाद के नए नए आयाम फूटते हैं। सौंदर्य के नए नए आभास होते हैं। अर्थछवियांनई व्याख्याएंनई दृष्टियां सब मिलकर उस रचना को पुनर्नवा बनाती रहती हैं। यही सच है जैसी कहानी और रजनीगंधा जैसी फिल्म भी कुछ ऐसा ही अनुभव जगाती है


गुरुवार, सितंबर 20, 2018

भाषा एक नदी का नाम है




एक ऐसी भाषा पर बोलना,  लिखना या सोचना कठिन प्रतीत होता है जो अपने भीतर समाई हुई  हो, जिसे अपने से अलग करके देखना आसान नहीं, क्योंकि उसने आपके बहुत से हिस्से को गढ़ा होता है - जो सातवीं इंद्रिय की तरह व्यक्ति और संसार के बीच निरंतर एक अदृश्य तंतुवाय रचती है। हिंदी के विषय में सोचना कुछ ऐसा ही है मेरे लिए। लेकिन मुझसे अलग भी तो, मुझ से बाहर भी तो, उसका एक जीवन है - विराट स्वरूप है। फिर शायद मेरे भीतर की इस भाषा और मुझसे बाहर बहुत बड़ी इस भाषा का वजूद भी तो अलग-अलग कहां है!

हिंदी वही भाषा है जो कि विश्व के सबसे बड़े भाषा परिवार - भारोपीय भाषा परिवार की भारत-ईरानी शाखा की वंशज है। इस भाषा के शरीर, इसकी आत्मा में साढ़े तीन हजार सालों की भाषा की अटूट श्रृंखला, एक परंपरा समाई हुई है। उसकी ध्वनि और शब्द परंपरा में ही नहीं - अर्थतत्व में भी।

यह भाषा एक दीर्घ समय-क्रम में संस्कृत, पाली, प्राकृत और अपभ्रंशों की एक लंबी यात्रा तय करके आज यहां तक पहुंची है। यही है वह भाषा जिसमें वज्रयानी सिद्धों ने सहज सुख एवं शून्‍य तत्व की खोज की थी, नाथों ने वैराग्य और हठयोग गाया था तथा जैनों ने पुरा-कथाओं को अहिंसा और निर्वेद में ढाला था। इसी भाषा में राजस्थान की वीर गाथाएं गूंजीं और अमीर खुसरो का मस्ती भरा जन साहित्य पल्लवित हुआ। इसी में कपड़ा बुनते हुए कबीर ने परम तत्व की खोज की तो रैदास, नानक जैसे संतों ने अपने गूढ़ आध्‍यात्‍मिक मंतव्य कहे। इसी भाषा में सूफियों ने प्रेम को ईश्वर बना दिया और इसी में कृष्ण भक्ति और राम भक्ति की धाराएं बह निकलीं। इसी ने दरबारों में पहुंचकर श्रृंगार, नीति और भक्ति की त्रिवेणी बहाई और फिर भारतेंदु और महावीर प्रसाद द्विवेदी के कारखानों में ढलती ढलाती हुई खड़ी बोली बनी। इसी में छायावादियों ने प्रकृति, प्रेम और उद्दात्‍त कल्पना के रंग भरे, प्रगतिवाद ने मानवीय न्याय के गीत गुंजाए और प्रयोगवाद और नई कविता की सूक्ष्‍म संकेत व्यवस्था बुनी गई। इसी में प्रेमचंद, जैनेंद्र, यशपाल, अश्क, आचार्य द्विवेदी, नागार्जुन, अज्ञेय, इलाचंद्र जोशी, भारती, राकेश, निर्मल वर्मा ने अपने-अपने संसार रचे। यही गालिब, मीर, सौदा, इस्मत, मंटो, बेदी और फैज़ अहमद फैज़ की जुबान बनी।

यही क्यों, मेरे लिए और मुझ जैसे सैकड़ों हजारों के लिए यह भाषा एक ऐसा सेतु भी बनी जिसने हमारा परिचय रूसी साहित्य से, बांग्ला के रवींद्र और शरत से कराया था।

यह वही तो विराट-स्वरूपा भाषा है जो आज मुझ जैसे अदना वजूद की रगों में, रस बनकर बहती है, चेतना बनकर उजास देती है।

हिंदी का यह विराट स्वरूप इस पृथ्वी के गोलाकार पर जगह-जगह पर प्रसरित सा है। भारतीय उपमहाद्वीप में और जहां जहां भारत मूल के लोग रहते हैं जैसे पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, म्यांमार, मालदीव, श्रीलंका, इत्यादि देशों में उसका अस्तित्व है तो भारतीय संस्कृति से प्रभावित दक्षिण पूर्वी देशों जैसे इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, चीन, मंगोलिया, कोरिया तथा जापान जैसे देशों में भी इसकी उपस्थिति है। फिर वे देश हैं जहां हिंदी को विश्व की आधुनिक भाषा के रूप में पढ़ा-पढ़ाया जाता है जैसे अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, यूरोप के देश। और फिर दुबई, अफगानिस्तान, मिस्र जैसे इस्लामी देशों के अलावा मॉरीशस जैसे दीपों में भी उसका अनिवार अस्तित्व है। मॉरीशस में हिंदी सन् 1834 से गिरमिटिया या बंधुआ मजदूरों के साथ गई थी तो फिजी यानी दक्षिण प्रशांत सागर में 322 देशों के समूह में जनसंख्या का 44% भारतीय है। नेपाल राजनीतिक रूप से अलग होकर भी भारत से जुड़ा रहा है। वहां के तराई क्षेत्र में स्कूलों की भाषा भी हिन्‍दी रही है। श्रीलंका में बिनाका गीतमाला को कौन भूला होगा। इसी तरह यूएई में इंडो पाक मुशायरे की परंपरा रही है। जर्मनी, हंगरी, ब्रिटेन, कनाडा के अनेक विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जाती है और रूसी में तो हिंदी पुस्तकों की सर्वाधिक अनुवाद हुए हैं। इन देशों में हिंदी भाषा का शिक्षण भारत-विद्या (इंडोलॉजी) का अंग रहा है।

आज बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपने व्यापार के लिए यह भाषा महत्वपूर्ण लगती है तो टेक्नोलॉजी के संदर्भ में भी हिंदी को लेकर जो भय थे, वे काफी हद तक दूर हो चुके हैं। माइक्रोसॉफ्ट ने यह बात रेखांकित की है कि भारत के तकनीकी रूपांतरण की प्रक्रिया हिंदी और दूसरी भाषाओं की सहभागिता के बिना अधूरी है। माइक्रोसॉफ्ट अपने उत्पादों तथा सेवाओं को ज्यादा से ज्यादा भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराने के लिए कृतसंकल्प है। और फिर यह भी कि जब बोलकर टाइप करने की तकनीक और विकसित हो जाएगी तो हिंदी को एक नई तरह की पंख मिल जाएंगे।

ये सब बातें आशान्वित तो करती हैं, फिर भी अपने देश के संदर्भ के बिना ये बातें थोड़ी हवाई प्रतीत होती हैं। भारत का भाषाई नक्शा देखें तो दिखेगा एक बेहद बहुवर्णी देश। अनेक भाषाएं और उनके अनेक रंग। फिर भी ऊपर हिमाचल से लेकर नीचे छत्तीसगढ़ तक एक रंग ऊपर नीचे दाएं बाएं फैला दिखेगा - जो हिंदी भाषा का रंग है। तब लगता है कि यह भाषा कितनी व्यापक है और इसके कितने रूप हैं,  कितनी बोलियों वाला एक भरा पूरा परिवार है हिन्दी का। एक कल्‍पना उभरती है मन में कि एक संवेदी रिकॉर्डर लेकर भारत भ्रमण किया जाए- जगह जगह थमते हुए, जगह जगह रमते हुए, ऊपर से नीचे, हर गली-कूचे-बाज़ार-सड़क-घर पर बोली जाती जुबानों, हिंदी की अनेकों छवियों, रंग और वर्णों से एक ऑडियो महाग्रंथ रचा जाए। तब दिखेगा कि हिंदी का भी कोई एक रंग नहीं - रंग में रंग घुल-मिल रहे हैं- अलग-अलग लहजे उभर रहे हैं।

इसी वैविध्‍य के बीच कई बार अन्य भारतीय भाषाओं की तरफ से यह दबी दबी जुबान में कहा जाता है कि हिंदी अन्य भारतीय भाषाओं और बोलियों की जगह कम कर रही है- उन्हें प्रसरित होने से रोक रही है। पर हिंदी तो स्वयं उन तमाम बोलियों और भाषाओं के समाहार से बनी है - वहीं से उसका उद्भव हुआ है  - और वह जो भारतीयता की समग्रता की पहचान है, भारतीय भाषाओं की प्रतिनिधि है, कभी उनके विरुद्ध नहीं हो सकती। खड़ी बोली के महत्व पाने के कारण भौगोलिक भी रहे हैं, राजनीतिक और सांस्कृतिक भी। वह तो भारत की एकता एवं उसकी अनूठी सामासिक संस्कृति का, गंगा जमुनी तहजीब का साकार मूर्त रूप है। भारत में तमाम राष्ट्रभाषाएं हैं पर कोई भी देख सकता है उन भाषाओं की क्षेत्रीय सीमाएं हैं, जबकि राजकाज की भाषा के अलावा हिंदी एक संपर्क भाषा, एक मैटा लैंग्वेज, एक कौमी जुबान की तरह उभरी है। उर्दू भी तो हिंदी की ही शैली है - या यूं कहें कि हिंदी और उर्दू एक ही भाषा के चेहरे के दो परिपार्श्‍व या प्रोफाइल हैं। उर्दू की रंगत वहां नजर आती है जहां हिंदी में अरबी फारसी के शब्दों की मात्रा बढ़ जाती है और वहां परिनिष्ठित हिंदी होती है जहां संस्कृत के तत्सम शब्द आने लगते हैं।

आज भाषा पर हमारा चिंतन कुछ बहुत ही उपयोगितावाद से भरा या रिडॉक्शनिस्‍ट किस्म का हो गया है। हम कहने लगे हैं कि वह बस विनिमय का, संप्रेषण का जरिया भर है। लेकिन क्या इतनी ही होती है कोई भी भाषा ?

न्‍यूंगी व थ्‍योंगो कहते हैं कि भाषा में हमारी पूरी स्मृति परंपरा समाई रहती है, वह एक स्मृति भंडार होती है, सहस्रों वर्षों का एक मेमरी बैंक - एक सांस्कृतिक स्‍टोर हाउस। क्या भाषा एक ऐसी नदी सरीखी नहीं होती जो अनेक युगों अनेक जगहों से बहती हुई हमारे पास आती है और उनमें हमारे पूर्वजों के अनुभवों, मूल्यों, स्वप्नों और संस्कृति का जल भरा होता है ? यह एक रिक्‍थ, एक दीर्घ विरासत की वाहक है, जिसके एक घूंट जल में सदियां समाई रहती हैं - हम उस नदी में नहाते हैं तो वे सारे स्वप्न और मूल्‍य हमारे रक्त में उतर जाते हैं, वह सारा परिवेश, वे तमाम तत्व हमारा हिस्सा हो जाते हैं। अगर हमें ऐसी जादुई नदी का जल पीना न चाहें तो यह चुनाव सचमुच में ही त्रासद है।

मेरा दागिस्तान के लेखक रसूल हमजातोव ने इसी बात को कुछ यूं कहा था कि हमारी संस्कृति, हमारे अनुभव और हमारे मूल्य मालमत्ते से भरे एक भारी संदूक की तरह हैं और भाषा है उस संदूक की चाबी है।

आजादी से पहले और आजादी की जंग के दौरान जिस हिंदी को तबके इतिहास पुरुषों ने अंगीकार किया था - आज आजादी के बाद हमारी नजर में यह कैसा विकार, कैसा टेढ़ापन आ गया है कि हम अब लाभ-लोभ के चश्मे से ही भाषा का आकलन करते हैं।

समय क्रम में हम बहुत सी चीजों से कटे हैं- राजेश जोशी के शब्दों में कहें तो टूटने के क्रम में टूटा है बहुत कुछ

हम कटते गए हैं अपनी सामासिक जीवन शैली से, प्रकृति से... भाषा को लेकर भी यही सच है।

आज हिंदी मीडिया की भाषा है, विज्ञापनों की भाषा है, आम जन की भाषा भी है पर  विद्वत समाज हिंदी को तिलांजलि देने पर तुला है। क्यों यह सभा गोष्ठियों में, अकादमिक हलकों में, गंभीर विमर्श की और ज्ञान विज्ञान की भाषा नहीं बन पा रही है? क्‍या यह भाषा की कमी है या इस भाषा के बोलने वालों की ?

कुछ दिन पहले एक तथाकथित उपयोगी विषय पढ़ाने वाली अध्यापिका ने जब जाना कि मैं हिंदी पढ़ाती हूं तो उन्होंने बताया कि उनका नौ वर्षीय नौनिहाल उनसे पूछता है कि हम हिंदी-मराठी पढ़ते ही क्यों हैं? एक तो इसमें मात्राओं की गड़बड़ी के कारण मार्क्स कटते हैं और फिर यह मेरे करियर के लिए नितांत अनावश्यक है। बच्चे की बातें बचकानी हों तो क्या मुज़ायका – पर क्‍या यह केवल बच्चों की दलीलें हैं ? क्या यह अभिजन वर्ग की दबी-ढंकी कभी खुली आवाज नहीं है ? क्या जीवन से तमाम सूक्ष्म संवेदनाएं, पूर्ण मनुष्य होने की जरूरत एक झटके में गायब हो जाएंगी ?

जब मैं छोटी थी तो मां के गीत और कहानियों से बनने वाली छवियों के बाद कार्टूनों से मोहित होने लगी थी। यह कार्टून लाहौर टीवी पर एक खास वक्त पर आते थे। तब मन ललकता था कि ये सब अपनी भाषा में हो। बड़े होने पर लगा कि पुरातत्व, इतिहास, समाजविज्ञान, मनोविज्ञान, कला पर अपनी भाषा में उम्‍दा लेखन पढ़ूं। कुछ कुछ मिला भी- पर वैसा नहीं जैसा अंग्रेजी में उपलब्ध था।

तो कहां कमी रह गई ? शायद हमारे प्रेम करने में ही कुछ दरार आ गई होगी! अगर भाषा से प्रेम करते हैं तो केवल सम्मेलनों, दिवसों, बड़ी-बड़ी बातों से आगे तो जाना ही होगा। यह प्रेम मौन  भाव से अपनी भाषा को बूंद दर बूंद समृद्ध बनाने से ही फलित होगा। यही होगा हमारे इस इश्क का इजहार और बयान।




शनिवार, दिसंबर 23, 2017

रमेश कुंतल मेघ






इस वर्ष का साहित्‍य अकादमी पुरस्कार 

हमारे आदरणीय और प्रिय गुरू डॉ रमेश कुंतल मेघ 
को उनके वृहद् ग्रंथ विश्‍व मिथक सरित्‍सागर को दिया गया है। 
डॉ मेघ को आलोचक और कलाचिंतक के रूप में ही जाना जाता है। 
वे कवि भी हैं, चित्रकार भी। यहां उनका एक रेखांकन देखिए