![]() |
| लास्य कागज़ पर चारकोल सुमनिका |


द्वार मंडप के एक ओर नवग्रह अंकित थे - मनुष्य रूप में। तो यह यात्रा अंतरिक्ष से शुरू हुई। दूसरी ओर अर्धनारीश्वर लक्ष्मी और नारायण थे। यूं तो स्त्री और पुरुष तत्त्व का द्वैत और संतुलन विश्व के सभी पुराने दर्शनों में प्राप्त होता है, जिनमें भारतीय तंत्र का वज्र और कमल प्रतीक और चीनी दर्शन का याङग और यिन हैं। बौध्द धर्म की वज्रयान शाखा में यही ओम् मणि पद्म हुमहो जाता है। लेकिन कला में जिस सुंदरता और पूर्णता के साथ अर्धनारीश्वर का बिंब आया है वह अनूठा है। मंदिर की दीवारों पर उत्कीर्ण मूर्तियों में एक योजना थी। दस अवतार थोड़ी थोड़ी निश्चित दूरी पर चहुंओर मंदिर को घेरे थे। उनमें कहीं वामन रूप था - दैहिक विद्रूप और असामान्यता पर सत्वपूर्णता, नरसिंह थे - मनुष्यत्व एवं पशुत्व का संतुलन, पृथ्वी को जल प्रलय से उबारते महावाराह की नन्हीं प्रतिमा थी, कच्छपावतार और मत्स्यावतार थे जो जलीय सृष्टिवाद की कहानी कहते थे - अर्थात् यह संकेत कि जीवन का उद्भव जल से हुआ। वहां योद्धा कार्तिकेय भी थे। ऋषि परशुराम, गोचारी कृष्ण, वन में भटकने वाले राम और ध्यानी बुद्ध भी।