रविवार, जनवरी 23, 2011

अप्रतिम दीठ



विनोद कुमार शुक्‍ल के नौकर की कमीज, खिलेगा तो देखेंगे और दीवार में खिड़की रहती थी
उपन्यासों पर
सुमनिका सेठी और अनूप सेठी के बीच संवाद का तीसरा और अंतिम हिस्‍सा
विनोद कुमार शुक्ल का देखना
अनूप : आम तौर पर रचना में दो पहलुओं की छानबीन कर लेने से काफी कुछ पता चल जाता है कि उसमें क्या कहा है और कैसे कहा गया है। शुक्ल जी के संदर्भ में उनके देखने के अंदाज को देखना जरूरी लगता है। जैसे किसी भी घटना, पात्र, स्थिति, विचार, वस्तु को जानने के लिए यह जरूरी होता है कि हम उसे कहां से देखते हैं। दूर से, पास से, ऊंचे से, नीचे से, करुणा से, उदासीनता से, संलग्नता से या निर्लिप्तता या निर्ममता से। रचनाकार क्या पोजीशन लेता है, उससे उसके सरोकार तय हो जाते हैं
विनोद कुमार शुक्ल की दृष्टि अद्भुत है। वे अपने पात्र को मचान पर बैठकर या गर्त में गिराकर नहीं देखते। उनके पात्र न तो ऊंचाई से दिखने वाले खिलौने हैं, न ही नीचे से दिखने वाले भव्य महापुरुष‎‎। रचनाकार समस्तर पर रहकर देखता है। उसके पास पात्र को रंगने या बदरंग करने की कोई कूची भी नहीं है। जैसे रचनाकार को किसी चीज को जैसी है वैसा ही कहना बड़ा पसंद है। जैसे दिन की तरह का दिन था, या रात की तरह की रात थी। इसी तरह उसके पात्र जहां और जैसे हैं वे वास्तव में ही वहां और वैसे ही हैं। रचनाकार बस उनके अंग संग बना रहता हैý
सुमनिका : पर वो एक स्थिति को कोण बदल बदल के भी देखता है।
अनूप : इस देखने में मजे की बात है कि सिर्फ पात्र ही नहीं, पूरा जीवन-जगत ही उसके अंग संग है। उसमें व्यक्ति, प्राणि जगत और प्रकृति सब समाहित है। यहां व्यक्ति का मन भी उसी पारदर्शिता से दिखाता है जितनी स्फटिक दृष्टि से प्रकृति और वनस्पति जगत को देखा गया है
सुमनिका : हां। सम्पूर्ण जीवन के प्रति ऐसी समानुभूति कि एक हिलता हुआ पत्ता भी मानवीय स्थिति का हिस्सा ही होता है, संवादरत होता है। पेड़ की छाया भी, चींटी भी, चिड़िया भी, आलू प्याज और तोते का पिंजरा भी। सचमुच मुझे यह बचपन की नजर का अवतरण लगता है। जब कुछ भी निर्जीव नहीं होता। न ही अपने संसार से बाहर होता है। यह अद्भुत लौटना है। मैं इस नजर पर अभिभूत हूं
अनूप : विनोद कुमार शुक्ल के देखने में भावुकता नहीं है। निर्ममता और उदासीनता की कोई जगह नहीं है। पूरी तरह से संलिप्तता भी नहीं है। उस पर निर्लिप्तता की छाया प्रतीत होती है।
सुमनिका : हां, दृश्य पहली नजर में निर्लिप्त लगते हैं..
अनूप : हां, पर शायद इन्हीं दोनों के संतुलन से करुण दृष्टि का जन्म होता है। रचनाकार का देखना करुणा से डबडबाया हुआ है। यह एक दुर्लभ गुण है। इस तरह उपन्यासकार जीवन-जगत के सम-स्तर पर रहते हुए उसे करुणा-आप्लावित नजर से देखता है। इस वजह से उनका गद्य अनूठा बनता है। करुणा से देखे जाने के कारण ही रचना श्रेष्ठ होती है, इसमें कोई शक नहीं है। यहां रचनाकार प्रकृति और प्राणि जगत को भी उसी सजल नजर से देखता है। चाहे वे पेड़ पौधे हों, हाथी हो, चाहे बादल आकाश प्रकाश और अंधेरा हो।
सुमनिका : हां, यह उनकी बहुत बड़ी शक्ति है। और यह करुणा सपाट बयानी की तरह नहीं आती। करुणा पर वो एक झीना परदा डाल्ते हैं। यह उनके खास शिल्प का पर्दा है जिसमें लोक कथाएं, बच्चों के खेल और परी कथाओं का शिल्प है। सच और झठमूठ के खेल का एक निराला संतुलन बनता है
अनूप : विनोद कुमार शुक्ल की नजर में एक और गुण है, उनकी आर पार देखने की शक्ति। इसी नजर से वे आकाश को देखते हैं और उसमें अंधेरे उजाले को देखते हैं। इसी दृष्टि के कारण वे हाथी की खाली होती जगह देखते हैं और लिखते हैं 'हाथी आगे आगे निकलता जाता था और पीछे हाथी की खाली जगह छूटती जाती थी' यह पंक्ति दीवार में खिड़की रहती थी के पहले अध्याय का शीर्षक बनती है। यथार्थ को रूढ़िबध्द ढंग से देखने का आदी पाठक इस पंक्ति को निरर्थक पाता है। रूढ़ि में नवीनता देखने वाला पाठक इस पंक्ति में चमत्कार देखता है। लेकिन अगर आप ध्यान से पढ़ें और देखने लगें तो हाथी की जगह आपको दिखने लगेगी
सुमनिका : हम कह सकते हैं कि एक दृश्य के गतिशील तत्वों को वे देखते हैं तो रुके हुए तत्वों को भी। फोरग्राउंड को देखते हैं तो बैकग्राउंड को भी। और उन्हें इंटरचेंज भी कर देते हैं। कभी अग्रभूमि का आकार देखते हैं तो कभी पृष्ठभूमि का। जैसे अंधेरा और हाथी। फिर अंधेरे के हाथी। पानी के भीतर और पानी के ऊपर का अंधेरा। मनोविज्ञान में यह परसेप्शन का खेल होता है
अनूप : असल में विनोद कुमार शुक्ल को हड़बड़ी में नहीं पढ़ा जा सकता। धीरज से पढ़ने पर ही अनूठी दुनिया खुलती है। जाते हुए हाथी से हाथी की विशालता, कालेपन और मंद चाल का एहसास होता है। लेखक उसे दत्तचित होकर जाता देखता है। रघुवर प्रसाद, सोनसी और छोटू हाथी को इसी नजर से देखते हैं
सुमनिका : हां, वो दृश्य में इतने गहरे उतरते जाते हैं .. क्षण क्षण के विकास के साथ। और हम से भी उसी चाल की मांग करते हैं। और शायद ऊब की तोहमत इसी कारण लगती है कि हमारी नजर ऐसी विलंबित और दृश्य में डूबी हुई नहीं होती।
अनूप : इसी तरह रचनाकार प्रकाश और अंधेरे की छटाओं की विलक्षणता को देख और दिखाकर पाठक को आह्यलाद से भर देता है। खिड़की से बाहर जाता या अंदर आता अंधेरा या प्रकाश वास्तव में ही दिखने लगता है। गहन अंधेरे के बाद अत्यधिक उजाले को वे दो सूर्यों का उजाला कहते हैं। विरह के अंधेरे में पड़े रघुवर को दिन का उजाला इतना ज्यादा चुभता है मानो वह दो सूर्यों का उजाला हो। हाथी को स्वतंत्र करने का सुख रघुवर प्रसाद को इतना ज्यादा है कि उन्हें आगे पीछे अंधेरे का स्वतंत्र हुए हाथियों का जूलूस निकला हुआ महसूस होता है। इससे एक तरफ अंधेरे की सघनता का बिंब बनता है, दूसरी तरफ हाथी को आजाद करने का उल्लास सारे वातावरण में घुल जाता है। एक अन्य प्रसंग में बिजली के उजाले में गिरती हुई पानी की बूंदें दिखती हैं जो पतंगों की जरह जीवित दिखती हैंý
इसी में सोनसी का अपने घर जाने और रघुवर प्रसाद के विरह का प्रसंग भी बहुत मार्मिक है। यहां 'नहीं है' शब्दों की ध्वनि मानो कई दिन तक हवा में अटकी रहती है। रचनाकार मानो ध्वनि को भी देख रहा है। रघुवर प्रसाद हाथी को खोलने के लिए जा रहे हैं। जाते जाते सोनसी पेड़ पर बैठे रहने वाले लड़के के बारे में पूछती है। वे धीरे से चिल्ला कर कहते हैं 'नहीं है'। रात के सन्नाटे में यह आवाज आगे तक चली गई। एक और आदमी जो अपने घर के सामने बैठा था, उसने भी यह आवाज सुनी। वह सहज बोल उठा, 'कौन नहीं है' इसके बाद सोनसी के जाने का प्रसंग है। रघुवर प्रसाद को लगता है कि बस इस तरह रवाना हुई जैसे सोनसी को छीन कर ले गई। जो रघुवर खिड़की से बाहर अपने मन के लोक में रमे रहते थे, वे अचानक यांत्रिक हो जाते हैं। नवविवाहित का पत्नी के बिना मन नहीं लग रहा। रात को नींद खुलने पर वे सड़क पर आ जाते हैं। वे रात के सन्नाटे में 'नहीं है' शब्द बोलना चाहते हैं। उन्हें लगा 'नहीं है' जैसा वातावरण गहराया हुआ है। वे दृश्य की कल्पना सी करते रहते हैं जिसमें कोई आदमी फिर पूछता है 'कौन नहीं है भाई'। रघुवर कातर मन से कहते हैं 'सोनसी नहीं है'‎‎। यह ध्वनि मानों कई दिन तक अटकी रही आती है‎‎। यह रघुवर की अटकी हुई मन:स्थिति ही है
सुमनिका : कदम कदम पर उनके वर्णन करुण-हास्य या ब्लैक कामेडी के जीवित उदाहरण हैं
अनूप : हां। इस तरह हम कह सकते हैं कि विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों की विषय-वस्तु और शिल्प का आस्वाद तभी लिया जा सकता है जब हम उनके देखने को भी तनिक समझ लें। अगर उनकी तरह के देखने से हम तदाकार नहीं होते हैं तो हमें कथा, कथ्य, विषय-वस्तु बहुत साधारण लगेगा। उनके कहने का तरीका चामत्कारिक लगेगा। तब उपन्यासों को रूपवाद की तरफ ठेल दिया जाएगा। ऐसा करना इन उपन्यासों के साथ अन्याय होगा। इसका अर्थ है कि उपन्यासों के क्या और कैसे को उनकी अप्रतिम दीठ के जरिए समझने में मदद मिलती है
चित्र इंटरनेट से साभार

1 टिप्पणी:

सागर ने कहा…

मेरे जागने से पहले हाय रे मेरी किस्मत... !!!
इतने दिन कहाँ था मैं... चलिए देर ही सही.. इस ज्ञान रस के भंडार से अब वंचित नहीं रहूँगा. शुक्रिया