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मुक्तिबोध
एक
महाकाव्यात्मक जीवनी
विष्णु चंद्र शर्मा ने मुक्तिबोध की आत्मकथा लिखी है। मैंने बड़ी आसानी से कह दिया था कि मैं इस पर लिखूंगी, क्योंकि इस आत्मकथा को हासिल करने, हाथ में लेने और उसे पढ़ना शुरू करने के पहले तक मुझे यह भ्रम रहा कि मुक्तिबोध के जीवन की कई छवियों को मैंने किसी आत्मकथा में पढ़ा तो जरूर है, जिसमें नागपुर, उज्जैन, राजनंदगांव, इंदौर जैसे शहरों के नाम उभरे थे। उन शहरों के चौराहों, बाजारों और गलियों का उसमें जिक्र था। रात के कर्फ्यू में पुलिस की सीटियों के बीच घर लौटने की आवाजें भी थीं। चाय पीते हुए, बीड़ी जलाते हुए मुक्तिबोध और उनके सहचरों की छायाएँ, सड़कों के लैंप पोस्ट के नीचे, तो कभी नदी किनारे किसी चट्टान पर बैठे हुए। फिर लगा कि शायद वे एक साहित्यिक की डायरी के बिंब रहे हों, जो स्मृति में घुल कर बचे रह गए हैं और आज तक दर्ज हैं; या फिर यह सब स्वयं मुक्तिबोध की कविताओं का ही धड़कता हुआ देश काल और संसार था, जिसमें मुक्तिबोध का 'मैं', उनका नायक, विचरण करता सा था, अंधेरे से जगत में कभी डर से थर्रा कर भागता, कभी सुस्ताने लगता, अपने सिहरते हुए उद्वेलनों को संभाल कर सोचने लगता। चलते हुए चित्र और दृश्यावलियां- जैसे कोई फिल्म रील हो, एक ऐसी काव्य फेंटेसी, एक ऐसा तिलिस्मी जीवन, जहां जीवन-यथार्थ और फैंटेसी का भेद धुंधला कर गायब होने लगता है, जहां स्वप्न और जागृति की सीमाएं कोहरे में खो जाती हैं। बल्कि स्वप्नवत दृश्य में ही यथार्थ के अंतर्तल जाग्रत होकर मूर्त होने लगते हैं- स्वप्न के उन विज़न्स की तरह जो अचानक छुपे पहलुओं को सतह पर ले आते हैं।
लेकिन धीरे-धीरे इस आत्मकथा के पन्ने पलटने और पढ़ने पर लगा कि मुक्तिबोध के जीवन पर लिखी यह पुस्तक पहली बार ही मेरे हाथ में आई है और यह भी कि मुक्तिबोध के बीहड़ जीवन की बीहड़ यात्रा करने वाली यह आत्मकथा कितनी विषद है, कितनी संजटिल। यहां बृहत्तर संसार भी है, बाहरी घटनाओं के संदर्भ भी हैं, पर मुक्तिबोध के काव्य-संसार के चरित्र की तरह यहां भी मुक्तिबोध की आंतरिकता में अवगाहन की कोशिश ही अधिक है। हालांकि मुक्तिबोध इस भीतर बाहर को एक ही कंटिनुअम के रूप में व्याख्यायित करते आए हैं। फिर भी यह कथा उनके 'आत्म' में उतरती है। वहां जो निरंतर आलोड़न हैं, विचारों की लहरों पर लहरें हैं, संवेदनों के आवर्त पड़ते हैं, मंथन हैं, विभिन्न चेहरों की छायाएं हैं, उन सब का खाका उभरने लगता है। निश्चय ही यह सब बाहरी यथार्थ से नाभिनाल बद्ध ही है- बाहरी जीवन की विकटता, दरिद्रता, विद्रूपता, संबंधों में 'अनबन' और 'बेबनाव' की छायाएं चारों तरफ तो हैं ही। एक तो इस आत्म के व्यापक संदर्भ के रूप में मुक्तिबोध का 'इतिहास पुरुष' खड़ा है, तो दूसरी ओर स्वयं मुक्तिबोध भी व्यक्ति से ऊपर उठकर अपने आत्म संघर्ष में अपने समय के स्वप्नों और दुर्बलताओं का रूप हो गए हैं, उससे तदाकार हो गए हैं।
विष्णु चंद्र शर्मा का मूल उद्देश्य और सरोकार तो मुक्तिबोध को समझना रहा है- बहैसियत एक आदमी के, सीधे-सीधे, बिल्कुल, कतई। इस बीहड़ यात्रा में उनका सबसे प्रधान उपजीव्य बनी हैं स्वयं कवि मुक्तिबोध की रचनाएं- जिनमें उनके आत्म संघर्ष का, बहसों का, विद्रोहों और रूपांतरण के सपनों का इतिहास दर्ज है। काव्य के अलावा इनमें कहानी, लेख, डायरी- प्रसंग और मुक्तिबोध का मित्रों से किया गया पत्र-व्यवहार भी आधार बना है। फिर आते हैं मुक्तिबोध के परिवार के लोग- उनकी पत्नी शांता मुक्तिबोध ,बेटे रमेश मुक्तिबोध, भाई शरद मुक्तिबोध के माध्यम से मुक्तिबोध के जीवन प्रसंगों और रचनाओं के कालक्रम को समझने की कोशिश। फिर व्यक्ति मुक्तिबोध की पहचान का सिलसिला उनके तमाम मित्रों और लोगों से मिलकर भी खुला है, जिनमें दिल्ली के जगत शंखधर और नेमिचंद्र जैन, शमशेर बहादुर सिंह, नागपुर में उनके कवि भाई शरद मुक्तिबोध, भोपाल में त्रिलोचन शास्त्री और अशोक बाजपेई, जबलपुर में परसाई और सृष्टिधर मुखर्जी आदि का सहाय्य खोजा गया था।
मुक्तिबोध के वैचारिक व्यक्तित्व और मार्क्सवादी सौंदर्य दृष्टि की परख के उपजीव्य बने थे रामविलास शर्मा के ग्रंथ और राहुल जी तथा अन्य कई रूसी और भारतीय चिंतक एवं राजनीतिक विचारक। शैली चुनी थी उन्होंने पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यास 'बाणभट्ट की आत्मकथा' की । जिसमें तीन भुजाएं थीं अर्थात भीतर, बाहर और चेतना से बना एक त्रिभुज।
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विष्णुचंद्र शर्मा लिखते हैं कि काशी में जब वह घूमा करते थे तो मुक्तिबोध की 'हर चीज़/ मुझ पर अपनी एक सपनीली छाँह डालती थी।' यानी एक गहरा सा रोमान था उनके प्रति। उन्हें समझने की, उन्हें जानने की उत्कट जिज्ञासा का बीज बनारस में ही पड़ा था।
एक ओर कवि मुक्तिबोध
का संपूर्ण काव्य और साहित्य जहां उनकी आत्मा के संघर्ष का गवाह है, वहीं वह साहित्य
भारतीय मध्य वर्ग की मन:बाधाओं और रूपांतरण के स्वप्न का भी हलफनामा और इतिहास है।
यह कवि मुक्तिबोध का निजी संसार ही नहीं, शायद हम सब का, तमाम उन लोगों का निजी संसार
और अंतर जगत है, जो निरंतर द्विधाग्रस्त और विभाजितमना है, कार्यशीलता का स्वप्न देखकर
भी जो कुछ कर नहीं पाते, अगतिकता और सुविधापरस्ती और टल्लेनवीसी में जो जकड़ा हुआ है।
फिर भी वह शिद्दत से चाहता है कि निजी जीवन और अस्तित्व
रक्षा की दीवारों को लांघ व्यापक जीवन का आत्यंतिक हिस्सा हो जाए- इसीलिए विष्णु चंद्र
शर्मा ने प्रेमचंद के उपन्यास 'रंगभूमि' के सूरदास के बिंब से इसे तुलनीय माना है।
‘उसके जीवन में नैराश्यपूर्ण दारिद्र्य था। न खाट, न बिस्तर, न बर्तन, न भांडा- लेकिन यह चरित्र महाजनी सभ्यता से लड़ते-लड़ते कैसे अद्भुत ढंग से देशव्यापी चरित्र में तबदील हो जाता है।’
विष्णु जी ने फ्रांसीसी जीवनी लेखक हेनरी ट्रायट की जीवनी 'तोल्स्तोय' से भी मुक्तिबोध के व्यक्तित्व के कई सूत्र खोले हैं अर्थात मुक्तिबोध की लक्ष्य के प्रति एकाग्रता और जीवन को बदलने की रचना प्रक्रिया का पाठ पढ़ा है । लेकिन सबसे अधिक समानता तो डच कलाकार विंसेंट वैन गॉग के जीवन से मुक्तिबोध की रही है। उन की जीवनी 'लस्ट फ़ॉर लाइफ' ने मुक्तिबोध के कलाकार की पीड़ाओं और संघर्षों को पहचानने में मदद की है।
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मुक्तिबोध की चिंतन प्रक्रिया के भी उन्होंने दो स्तर माने हैं- एक है अपनी पूरी परंपरा और वैचारिक थाती को स्वीकार करके उसका परिष्कार। मुक्तिबोध की रचनाओं में इतिहास, पुराण और मिथकों के पात्र ही नहीं, उनकी छवियां, आद्यरूप एवं कथाएं भी आती हैं और यों उनकी काव्य चेतना समय के भूत-वर्तमान और भविष्यगत छोरों तक व्याप्त हो जाती है- गूंजने लगती है समय के आर पार। वहां रावण भी आता है, ब्रह्मराक्षस, अजीगर्त और शुन:शेप भी; वहाँ तिलक, गांधी, नेहरू जैसे नेता भी विचरते दीखते हैं, जिन्हें बिल्कुल युगानुकूल संदर्भ में मुक्तिबोध ने ढाला है।
दूसरा स्तर आधुनिकता की अस्तित्ववादी आधुनिकता से अलग आधुनिकता की प्रगतिशील भूमिका का है। यह बात मुक्तिबोध की तमाम वैचारिकता को दृष्टि में रखकर सही हो सकती है - है भी, लेकिन फिर भी अस्तित्ववादी अवसाद एवं अलगाव, खालीपन और एकाकीपन मुक्तिबोध के जीवन-अनुभव का बड़ा हिस्सा तो रहा ही है- वह भी उनकी परिस्थितियों और मनुष्य की टकराहटों से ही जन्मा है, थोपा हुआ नहीं है। यह और बात है कि स्वप्न, क्रांति और समाज के आमूल परिवर्तन का देखा जा रहा है।
विष्णु चंद्र शर्मा
खुद को भी आधुनिकता की इसी दूसरी परंपरा से संबद्ध करते हैं। वे बताते हैं की बनारस
में उनके साथ रूस की अध्येता नतालिया और चीन के ली घूमा करते थे। यह तीनों ही दुनिया
के तीन बड़े देशों में क्रांति की विचारधारा से, समाजवाद से, रूपांतरण से और मानवता
के संघर्ष से जुड़े लोग थे।
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आत्मकथाकार ने मुक्तिबोध के बचपन की तलाश की है। सतह से कुछ नीचे जाकर खुदाई की है- यहाँ वर्णन और ब्योरे तो हैं पर इन निचली सतहों में कुछ स्मृतियां दर्ज हैं- कुछ पुरानी सी छवियां, कुछ प्रबलअनुभूतियाँ। पूरी आत्मकथा के अनुपात में बीच बीच मे कौंधने वाली बचपन की ये स्मृतियाँ बिखरी बिखरी सी, कदाचित धुंधली और छिटपुट लग सकती हैं, पर इनका महत्व बहुत गहरा है।
कोई भी मनोवैज्ञानिक बचपन के अनुभवों के महत्व को गहराई से समझता है। आत्मकथाकार ने भी इन्हें मुक्तिबोध के व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों के बीजों के रूप में देखा है। यही बीज, और भावों के संस्कार पल्लवित होते हैं एक जटिल व्यक्तित्व में और फिर मुक्तिबोध के काव्य-व्यक्तित्व में भी। बचपन की इन स्मृति-छवियों के सहारे मुक्तिबोध के लेखन के अनेक अनछुए पहलुओं को खोजने की गुंजायश आज भी बनी हुई है।
ग्वालियर में पिता की पुलिस की नौकरी की बदौलत हवेलीनुमा घर मे रहना, फिर सरकारी क्वाटरों का जीवन और फिर तो नौकरी के लिए शहर शहर भटकना और गहरे पराजयबोध, चिंताओं और आत्मग्लानि से जूझना यहाँ दर्ज हुआ है।
बचपन की तमाम स्मृतियों में एक प्रबल अनुभूति इस बात की थी कि बड़े बच्चों के साथ कितना अन्याय करते हैं, क्यों वे बच्चे के सच्चे आवेगों को, प्रश्नों को, जिज्ञासाओं की तीव्रता को, कभी भी समझ नहीं पाते। बच्चा खुद को एक पीड़ित मानता है । 'न समझे जाने का दुख' बच्चे में सदा व्याप्त सा रहता है। इसी दमित और असन्तुष्ट मनोभूमि से ही न जाने कितना कुछ फूटा है, आत्माभिव्यक्ति की बाधाएँ, पृथकता का बोध, आक्रोश और विद्रोह, ज़िद और आत्मग्रस्तता।
'इसी ने विद्रोह और प्रतिकार के साथ साथ ज़िद के बीज भी डाल दिए थे । और इस जिद में अपनी बात पूरी करवाने के लिए मैं रोया करता। बालक के प्रश्न पर कोई हंस देता, कोई प्यार से पुचकार या सहला देता, कोई फटकार देता, कोई टाल देता- जवाब कोई न देता।' आखिर क्योंकर जिज्ञासाओं का दमन किया जाता है। आगे चल कर भी आत्माभिव्यक्ति कभी सहज नहीं रही- सदा बाधित ही रही।
'घर में इधर अपनों
के चेहरे गम्भीरता में डूबे लगते हैं, बाहर की बातें भी घिर-घिर कर मेरे अन्तर्प्रवाह
में आती हैं- वही मेरे मन की सहजता को रोक देती हैं- मन के भावों पर पाबंदी से लगाते
शब्द- मानों लाल झंडी दिखा रहे हों।'
'मैं जो लिखना चाहता हूँ, वह लिखा नहीं जाता है। जो भीतर है वह प्राणों का संवेदन है, जो बाहर है वह निषेध है।'
बचपन में प्रतिकार
का भाव भी जम गया था अंदर, … कोई किसी को मारे
और मैं केवल दर्शक बना रहूँ.. मुझे मंजूर न
था।
वे कहते हैं कि जिज्ञासा
के शिकार हम दोनों भाई थे। घर की चीज़ों को तोड़ के देखना
- समझना चाहते थे। उज्जैन की हवेली की छत पर चढ़ कर मैं चारों ओर देखता, वैज्ञानिक विचारों
की प्रयोगशाला कहीं भी खुल जाती थी। आगे चलकर यही सतह के नीचे जाकर विचारों और तंत्र
की पहचान की प्रयोगशाला बन गई थी। यहाँ तक कि खुद अपने
भावों और विचारों की टोह लेता, उन्हें टटोला
करता।
'मैं' जिज्ञासावश विभिन्न देशों के इतिहासों को पढ़
चुके था।'
'अपने इर्द गिर्द के चेहरों की ऐयारी करता रहता हूँ।
खुद की भी छानबीन करता हूँ।'
'चरित्र का विस्तार
से अध्ययन एक वयस्क धंधा है।'
और यहीं (बचपन में) जन्मी थी
किसी दूसरे रहस्यलोक में जाने और घूमने की माइग्रटेरी वृत्ति। याद आता है
कि उनकी नानी उन्हें गोद में लेकर घण्टों डुलाती, झूमतीं और झूम-झूम कर गीत गाया करतीं।
‘ये गीत मुझे रहस्य की दुनिया में ले जाते, मैं
चुप-चुप रहस्य में खोया रहता।’ यही कल्पनालोक, रहस्यलोक या एक समानांतर आंतर लोक ही
तो लेखन का प्रतिसंसार बनता है, रचनाशीलता का लोक।
'मन्दसौर में नदी है, घाट पर बैठ कर मैं उड़ा करता।
मन्दिर के घण्टे, दरगाहें… शाही किले में ऐसे घूमता जैसे शाहज़ादा होऊं।'
विष्णुशर्मा एक छोटे
बालक की अंतर्मुख प्रवृत्ति की भी व्याख्या करते हैं- 'जब मां मेरे सवालों का जवाब
न दे पातीं तो मैं भीतर ही भीतर उनके हल खोजा करता। खोजते खोजते मैं एकदम आत्मकेन्द्रित
और तल्लीन हो जाता। इसी आत्मकेंद्रित एकांत में मैंने अत्यंत भावुक सपने देखे हैं।
सपनों की दुनिया में पहुंच कर मैं एक बड़े अनुराग में डोलने लगता।'
क्या यही मुक्तिबोध
की काव्य फंतासी की मनोभूमिका नहीं है? तीव्र
अनुभव क्षण में सब कुछ भूल कर खो जाना -इसे ही उन्होंने मन का एक से दो हो जाना भी
कहा है।
'मन विलग होकर क्षिप्रा
के किनारे किनारे उड़ चला।'
इसी बचपन मे अंधेरे
में कंदील का मन्द प्रकाश भी छाया हुआ है। यही घुप्प अंधेरा और फिर नीम उजाला उन की
कविताओं का भी तो वातावरण है, भौतिक और मनोवैज्ञानिक ।
बचपन की एक और स्वप्नछवि
है कि 'कोई लगातार 'मेरा' पीछा कर रहा है, मैं भाग रहा हूँ।'
मुक्तिबोध के आगामी
जीवन के तमाम पलायन बोध, परसीक्यूशन, भय और चिंताएँ इस एक स्वप्नबिम्ब मे समाई हुई
हैं। फिर यह पलायन चाहे अपनों और परिवार से
हो, अपने अपराध बोधों और चिंताओं से हो, उदर भरण की जद्दोजहद हो या फिर सत्ता की शिकारी
नज़रों से बच कर भागना हो।
एक स्वप्न बिम्ब में
'मैं' खुद को पुरानी सी पुस्तस्क पढ़ते हुए देखता है। फिर यह भी की उसके हाथ में कोई
अमोलक हीरा है जो पता नहीं कहां गिर कर खो गया है। इन सपनो में बहुत सा भय, बहुत आक्रोश
और बहुत बेबसी की भावनाएँ हुआ करतीं। जीवन एक गूढ़ रहस्य सा प्रतीत होता। और फिर यहीं
आत्मान्वेषण और आत्महनन की प्रवृत्तियां भी हैं, जो अन्त तक उनके साथ रूप बदल बदल कर
चलती रहीं। वे एक ही साथ विद्रोह और निर्वासन के ध्रुवों पर जीते रहे।
विष्णुचंद्र शर्मा मुक्तिबोध की एक त्रिमूर्ति गढ़ते हैं। जिसमें एक चेहरा है जिज्ञासु बालक का, दूसरा है वैज्ञानिक युवक का और तीसरा है अनुभवपूर्ण मत बनाने वाले वृद्ध का। यह तीनों जीवन के क्रम में धीरे धीरे प्रकट हुए हैं और फिर उनमें तीनों समाहित से भी हो गए हैं। बचपन के वर्णनों के भीतर प्रबल जिज्ञासा और सम्वेदन धड़क रहे हैं। इस स्तर की छवियाँ कुछ ऐसी हैं जैसे मानवता के शैशव की प्रागैतिहासिक अंधेरी गुफाओं में उकेरे गए आदिम और इकहरे चित्र हों।
इस आत्मकथा में यौवन के वर्णनों के रंग बड़े भास्वर और दीप्त हैं।
वे न केवल भावुकता के रंग में रँगे हैं, बल्कि बचपन के इकहरे और स्थिर चित्रों के बरक्स
उनमें ऐन्द्रीयता, दैहिकता, अस्थिरता और गहन नैतिक द्वंद्व के आयाम भी हैं। यौवन के प्रेम-उद्वेगों और तनावों का जैसा ईमानदार
आत्मसाक्षात्कार यहां मिलता है, वह कम ही देखा
गया है। आवेग जितना तीव्र होता गया है, आत्म
संघर्ष और द्वैत भी उतना प्रबल होता गया है।
शांता का युवा मुक्तिबोध के जीवन में गहरे आकर्षण
की तरह प्रकट होना दर्ज है। शर्मीले मुक्तिबोध से वह बात करने लगी थी और निकट चली आयी
थी। यह दुर्दम आकर्षण पतझर के पीले पत्तों के जग में अचानक वसन्त सा छा जाता है और
झंझावात सा बहने लगता है। यहां मुक्तिबोध खुद को तोल्स्तोय के 'रेज़रेक्शन' के पन्नों
पर अपने सपनों और विचारों की दुनिया में जीने वाले नेख्लोदोव के रूप में पहचानते हैं। शांता उन्हें आधी नौकरानी
और आधी कुलीन कात्यूशा सी लगती।
इसी स्तर पर मुक्तिबोध
की आत्मा की 'दुइ' का भी प्रतिफलन हुआ है- आकर्षण-विकर्षण, आवेग-कायरता और कल्पना और
यथार्थ के धरातल पर। शांताबाई के समानांतर एक काल्पनिक प्रेमिका का अस्तित्व भी तनाव
पैदा करता है। 'मैं' दैहिक आवेशों को लेकर नैतिक दुविधा से भी परेशान होता है।
'वह मेरी कल्पना और
19-20 साल की युवावस्था के बीच एक समस्या सी बन गई थी….।'
'मैं' कल्पना और ठोस वास्तविकता में तालमेल नहीं बैठा पाता है और डिस्टर्ब हो जाता है।
अर्थात यौवन का चिह्न बनता है अस्थिर मानस, मन की कई कई दिशाओं में विभक्ति और गति। 'जैसे एक ही समय में 'मैं' कई आदमियों में रूपांतरित हो जाता। एक सुख स्वप्न देखता, दूसरा सुनहरी यादों में डूबता, तीसरा परिवर्तन चाहता, 'मैं' तिनके सा धूल के सिर पर उड़ता- कभी तरल अवसाद के आंसू बहाता, कभी मरुभूमि सा जलता तो कभी पीले उदास पत्तों सा बिखरता।'
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मुक्तिबोध के कवि व्यक्तित्व की रचना के मूल में उनकी अंतर्मुखता और उनकी आत्मछवियां, सामान्य जीवन से उनकी पार्थक्य भावना, उनकी आत्मलीनता और कल्पनाशीलता और आत्मान्वेषण की खोज और व्याख्या हुई है। वहीं उनके मित्र संसार में पैठकर उनकी चर्चाओं, उनकी साहित्यिक रीडिंग्ज़, उनके प्रभाव, विभिन्न काव्यादर्शों और काव्यान्दोलनों पर चर्चाएँ , वैचारिक मंथन और बहसें भी भास्वरता से उभरती हैं। शायद एक रचनाकार की आत्मकथा में उसकी रचनात्मक मनोभूमियों की तलाश कर पाना सबसे बड़ी उपलब्धि होती है। और उससे भी बड़ी बात है एक तरफ भोगे गए जीवन के अनुभव और दूसरी तरफ उसके साहित्य एवं कला जीवन में संबंधों की तलाश कर पाना। यहाँ कवि लेखक मुक्तिबोध के साथ-साथ उनके समकालीनों का संसार भी उभरता है और उस समय के साहित्य-सांस्कृतिक माहौल से भी पाठक का साक्षात्कार होता है।
रचना की मनोभूमि में आत्मकथाकार ने कवि की आत्मा के द्वैत या दुई की चर्चा बार-बार की है - 'मैं ऐसे समय में एक नहीं रह पाता, एक 'मैं' नायक बना उड़ा करता, दूसरा 'मैं' गंभीर बना अलगाव बनाए रखता। एक आंतरिक काल्पनिक जीवन था जो फैलता रहने वाला था, उड़ता रहने वाला, दूसरी तरफ बाहर का मन और अभिव्यक्ति सिमटती जाती, सिकुड़ती रहती।'
तोलस्तोय से लेकर दोस्तोएव्स्की और शेक्सपीयर और प्रसाद से लेकर प्रेमचंद तक में खुद की छायाएं देखने वाला कवि-व्यक्तित्व संसार से गहरे पार्थक्य की चेतना से भी ग्रस्त रहा है। दोस्तोएव्स्की का ईडियट पढ़कर उसे लगता, 'इस सभ्य दुनिया में मूर्ख, महामूर्ख मैं ही हूं।' तोलस्तोय के नेख्लदोव के दर्पण में खुद से उनका साक्षात्कार होता है।
आंतरिक रूप से बहुत गहरे जुड़े होकर भी एक धरातल पर पृथकता का अनुभव या बोध परिवार के प्रिय जनों, मित्रों तक ही नहीं, वरन अपने ख्यालों, विचारों के संदर्भ में भी है। 'मैं अपने कमरे में सबसे पृथक् हूं। भीतर आने का कोई साहस नहीं करता। …विचार भी अलग-थलग खड़े होकर मानो दरवाजे से झांकते हैं, मेरे भीतर दाखिल नहीं हो पाते।'
व्यक्ति और व्यक्ति
के बीच की भी दूरियाँ और चिलचिलाते फासलों
की बात उनकी कविताओं में बार-बार आती है। यहाँ तक कि मित्रों
के बीच भी यह एहसास जब-तब उभर आता है, खटकता रहता है, पीड़ित करता है। भाषा में भी
यह प्रतिफलित होता है -
'एक ही भाषा, एक ही
अभिधार्थ होते हुए भी ध्वन्यार्थ अलग अलग हो जाते हैं ।'
लेकिन कवि का दूसरा मन इन दूरियों का अतिक्रमण करना चाहता है । बचपन में मां की थपकियों में जो दूरियां विलीन हो जाती थीं- इतिहास की दूरियाँ भी माँ की कही कहानियों में पट जाती थीं, कुछ वैसे ही मनुष्य और मनुष्य के बीच फासलों को पाट देने वाला एक मन था, जो अपनी अगतिकता और अस्तित्व रक्षा की कैद से ऊपर उठ जाना चाहता था।
मुक्तिबोध के संबंधों का एक नितांत भीतरी दायरा है, जहां धर्मनिष्ठ और नेक पिता का हार्दिक अधिकार है, वात्सल्यमूर्ति मां का चमत्कारी ममत्व है। मुक्तिबोध को प्रेमचंद का संस्कार देने वाली मां रंगभूमि के किसान सी है, छोटा भाई शरद वान गॉग और उसके भाई थियो के अटूट रिश्ते में बंधा सा है। पत्नी शांता और बच्चों की दुर्दशा मुक्तिबोध को बार बार आत्मग्लानि के कुएं में धकेल देती है।
मुक्तिबोध के मित्र
संसार और उनके बीच के संवादों का अंकन जिस तरह
और जितने विस्तार, जीवन्तता और गहनता से हुआ है, वह वास्तव में ही अप्रतिम है।
नेमिचन्द्र जैन तो मुक्तिबोध की आत्मा के सबसे करीबी सहचर मित्र रहे। दूर रह कर भी उनसे निरंतर पत्रव्यवहार में मुक्तिबोध की सबसे आंतरिक वेदनाएँ वाणी पाती
हैं। घोर दरिद्रता, आत्मग्लानि और व्यर्थता बोध, कर्ज़ से लेकर तमाम तरह की अंतरंग स्वीकारोक्तियाँ इन पत्रों की इबारत
में खुल खुल जाती हैं। मुक्तिबोध लिखते हैं कि नेमि जी ही उनका सम्बन्ध जीवन की ठोस
वास्तविकता से कराते थे।
'मुझे बाहर की वृहत्तर
दुनिया से जोड़ते हैं- ठोस सच्चाइयों से मेरा नाता जोड़ते हैं।'
उन्ही की बदौलत मुक्तिबोध
मार्क्सवादी बने अर्थात मुक्तिबोध को भावी क्रांति का सपना दिखाने वाले, उनकी विचारधारा
को निर्मित करने का श्रेय भी उन्हें ही प्राप्त है।
'मैंने दुनिया भर का साहित्य पढ़ा था, भौतिकवाद की ओर रुझान भी था, पर था मैं कोरा कलाकार ही, बौद्धिक और मानसिक उहापोह से ग्रस्त, अपने भोले भाव में पूरा रोमांटिक।'
यहीं मराठी भाषी हिंदी
कवि प्रभाकर माचवे हैं, शमशेर बहादुर सिंह हैं, बनारस में त्रिलोचन हैं, नरेश मेहता हैं। और सबसे खूबसूरत
और महत्वपूर्ण वर्णन हैं जहाँ गहरी रोमानी और मृदुल चेतन के कवि वीरेंद्र जैन के सानिध्य
में मुक्तिबोध का भिन्न किस्म का काव्य एस्थेटिक्स आकार ग्रहण करता है। उज्जैन के होल्कर
कॉलेज में पढ़ते हुए रवींद्र जैन जैसे कोमल, स्वप्नजीवी और अतिअभिजात कलाकार के माध्यम
से मुक्तिबोध रवीन्द्र के छायालोक में ही नहीं, कालिदास, कीट्स, बायरन, येट्स और टॉमस हार्डी के मनोलोक में प्रवेश करते हैं, छायावादी चेतना और काव्यादर्श के दर्शन
करते हैं। आत्मकथा के ये अंश खासे दिलचस्प हैं, जहाँ दो भिन्न तरह के लोग एक दूसरे
से आकर्षित विकर्षित होते रहते हैं। वीरेंद्र मुक्तिबोध की कविता में पीले रंग के बाहुल्य,
मराठी भाषी होकर भी हिंदी के संस्कार और शिल्प के प्रशंसक थे। वे खुद वीतराग से दिखते,
मृत्यु और प्रकृति की सौन्दर्यगाहों पर लिखते, जबकि मुक्तिबोध हर प्रवृत्ति, हर चीज़ हर पात्र की सामाजिक व्याख्याएँ करते। उनकी कविता
विविधता के गहरे बोध को तलाशा करती। वे खुद को अजीब रहस्यलोकों का नागरिक कहते।
'मेरी कविता-यात्रा ध्वंसावशेषों और पुरातत्व से
अपने रूपक और बिम्ब तलाश किया करती।'
आत्मप्रदर्शन से बिल्कुल शून्य, बल्कि बेसलीका जीवन जीने वाले मुक्तिबोध का काव्य बोध खुरदुरा, लापरवाह और रगेडनेस लिए हुए था।
इन मित्रों की चर्चाओं में एक ओर अरविंद, रवीन्द्र, परमहँस और विवेकानंद उभरते तो दूसरी ओर लेनिन, मार्क्स और स्तालिन। इन युगपुरुषों के साथ साथ मन के अवचेतन के गहरे तलों में प्रवेश करने वाले फ्रॉयड, एडलर, और बर्गसां भी उपस्थित रहते। वेदांत पर, पातंजल योग और समाधि पर, मित्र व्यास से गहरी चर्चाएँ होतीं, सायकोएनालिसिस की दुनिया में प्रवेश होता।
यों कवि और कविता तो
आकार ग्रहण करती रही, निखरती गई, पर जीवन यथार्थ की विद्रूपता और विकटता कम होने के
बजाय बढ़ती ही चली गई । चित्रकार विंसेंट वैन गॉग की ही तरह
मुक्तिबोध को एक त्रासदीय नायक बनाने में उसने शायद ही कोई कसर छोड़ी हो। संसार और उनके
बीच बेबनाव और अनबन का अहसास बढ़ता ही गया। परिवार के भीतर, जगह जगह की नौकरियों में,
वैचारिकताओं में। वर्तमान और भविष्य के कई कई डरावने चेहरे और रूप उनकी आत्मा को दबोच
लेते।
'मैं उनसे लड़ता हूँ।
जीवन मे सहज दिखने की कोशिश करता हूँ … '
'क्योंकि जीवन की विडम्बनाओं
में जीने का आदी हो गया हूँ । .. लेकिन एक मन्द ध्वनि, सतह के नीचे गहरी अंतर्व्यथा
की एक नदी की धीमी आवाज़ मुझे जगाए रहती है। मैं मूर्ख नहीं, उत्पीड़ित और संतप्त हूँ।'
बस एक मात्र प्राप्ति यह है 'भीतर का तमाम दुख और पीड़ा काव्य के, साहित्य के, बिंदु में विलीन होने लगते हैं।' 'मेरा लेखन ही ही मेरा सुरक्षा गृह है।'
जिस तरह दोस्तोएव्स्की ने अपने अजीब जीवन के अनुभवों को रचनाओं में बदला था, दार्शनिक धुन्ध के बीच आत्म संघर्ष किया था, उसी तरह मुक्तिबोध भी दुखों और संघर्ष भरे जीवन को निरंतर अपनी लेखकीय मानसिकता में ढालते रहे, अपने आसुंओं से प्रेम बेल सींचते रहे।
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