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सोमवार, सितंबर 06, 2010

स्त्री मन का अद्भुत निर्वचन


मन्‍नू भंडारी की यही सच है कहानी आपने पढ़ी होगी. और उस पर बनी रजनीगंधा फिल्‍म भी देखी होगी. इन दोनों को साथ साथ याद करना और आस्‍वाद लेना एक मजेदार अनुभव है. ब्लॉग की नजर से लेख जरा लंबा है. इसलिए किस्‍तों में दिया जा रहा है. अब पढि़ए अंतिम किस्‍त -


कहानी में एक और बेहद सुंदर वर्णन है । जब इंटरव्यू से मुक्त होने के बाद निशीथ के आमंत्रण पर दीपा और वह टैक्सी में बैठे हैं
'टुन की घंटी के साथ मीटर डाउन होता है और टैक्सी हवा से बात करने लगती है। निशीथ बहुत सतर्कता से कोने में बैठा है, बीच में इतनी जगह छोड़कर कि यदि हिचकोला खाकर भी रुके, तो हमारा स्पर्श न हो'
दैहिक भंगिमाओं के इस अर्थगर्भित विवरण के बाद का विवरण तो काव्य की सीमा को छूने लगता हैý
'हवा के झोंके से मेरी रेशमी साड़ी का पल्लू उसके समूचे बदन के स्पर्श में पड़कर फरफराता है। वह उसे हटाता नहीं है। मुझे लगता है, यह रेशमी सुवासित पल्लू उसके तन मन को रस में भिगो रहा है, यह स्पर्श उसे पुलकित कर रहा है। मैं विजय के अकथनीय आह्लाद से भर जाती हूं। ... ... जितनी द्रुतगति से टैक्सी चली जा रही है, मुझे लगता है, उतनी ही द्रुत गति से मैं भी बही जा रही हूं, अनुचित, अवांछित दिशाओं की ओर!'
फिल्म के लिए भी यह बहुत ही रोमानी, बहुत ही गर्भित क्षण है, फिल्मकार की अभिव्यक्ति को चुनौती देने वाला। और सचमुच ही मुंबइया फिल्मों के इतिहास में एक बड़ा सूक्ष्म दृश्य रचा जाता है। लेकिन उसमें फिल्मकार को कुछ कदम और आगे बढ़ना पड़ता है। फिल्म में भी दोनों टैक्सी के अंदर दूर दूर बैठे हैं। नवीन की आंखों पर काला चश्मा है। वह अपने भावों को खिड़की के बाहर देखने की भंगिमा में छिपाने की कोशिश में है। रेशमी आंचल इस बीच की दूरी को पाटने लगता है और नवीन को छूता है। फिल्म इस सब के दौरान एक बेहद सुंदर गीत का इस्तेमाल करती है। लेकिन साथ ही साथ कैमरा नवीन के हाथ पर भी फोकस करता है जो शिथिल सा उन दोनों के बीच में है। कैमरा दीपा की उन कनखियों को भी दिखाता है जो उस हाथ को देखती हैं। और दीपा तुलना कर उठती है। उसे संजय दिखता है जो उसे बाहों में घेरे है, और फिर वह कल्पना कर उठती है, और संजय की जगह नवीन ले लेता है यानी फिल्‍मकार के लिए अभिव्‍यंजना के ये क्षण उतने आसान नहीं थे इसलिए उसे आंचल के अलावा हाथ का भी इस्‍तेमाल करना पड़ा लेकिन ये हाथ इससे इकतरफा संकेत न रहकर नवीन के हृदय और इच्‍छा का भी वाह‍क बन जाता है
आज (दो हजार आठ के अंत में) साठ के दशक की ऐसी कहानी को पढ़ते हुए यह नहीं लगता कि यह बीते जमाने का द्वन्द्व है। आज भी अपने मानवीय सार के कारण यह कहानी तरोताजा लगती है। स्त्री विमर्श कहीं का कहीं पहुंच चुका है लेकिन इसने जो जमीन तोड़ी थी, उसका महत्व आज भी जस का तस है। दूसरी ओर फिल्म की तकनीक में भी आमूल परिवर्तन हो चुके हैं। फिर भी यह फिल्म एक कीर्तिमान की तरह आज भी स्थापित है
चलते चलते एक और बात, श्रेष्ठ कलाकृतियां जब जब एकाधिक माध्यमों में ढलती हैं तो आस्वाद के नए नए आयाम फूटते हैं। सौंदर्य के नए नए आभास होते हैं। अर्थछवियां, नई व्याख्याएं, नई दृष्टियां सब मिलकर उस रचना को पुनर्नवा बनाती रहती हैं। यही सच है जैसी कहानी और रजनीगंधा जैसी फिल्म भी कुछ ऐसा ही अनुभव जगाती है

बुधवार, अगस्त 18, 2010

स्त्री मन का अद्भुत निर्वचन



मन्‍नू भंडारी की यही सच है कहानी आपने पढ़ी होगी. और उस पर बनी रजनीगंधा फिल्‍म भी देखी होगी. इन दोनों को साथ साथ याद करना और आस्‍वाद लेना एक मजेदार अनुभव है. ब्लॉग की नजर से लेख जरा लंबा है. इसलिए किस्‍तों में दिया जा रहा है. अब पढि़ए पांचवीं किस्‍त -


फिल्म में कहानी के पात्रों का चरित्रांकन बहुत महत्वपूर्ण है। शायद इस कथा और फिल्म के बीच जो संवाद घटित हुआ घटा है वह इस कहानी के तीन पात्रों को लेकर है। फिल्मकार ने उन्हें चेहरा और रूप देकर स्थिर सा कर दिया है। यानी कहानी की मूर्तता पर अंतिम मुहर लगा दी है। और इसके अलावा तीनों चरित्रों को विशिष्ट मैनरिज्म देकर प्रामाणिकता और कंट्रास्ट को गहरा किया है। इससे ये चरित्र दर्शक के मन में स्थाई जगह बना लेते हैं। दीपा की सहज सुंदर पर सादा छवि को विद्या सिन्हा ने मूर्त किया है। सूती साड़ी पहने हुए उसका सादा और भावमय रूप आंखों में बस जाता है। फिल्मकार ने उसका आभरण भी बेहद सादा रखा है। सादगी भरी यह सुंदरता ही उसकी पहचान बन जाती है। क्लोजअप में कभी कभी बस एक मोती का कर्णाभूषण चमकता है। अपनी लंबी चोटी को कभी आगे कभी पीछे ले जाती, अनजाने में कभी खोलती कभी गूंथती उसकी अंगुलियां एक मैनरिज्म रचती हैं और उसके खुलते और बंद होते मन की भंगिमा बन जाती हैं। कहानी तो दीपा के भीतरी स्पेस से ही रची गई है पर फिल्म को तो बाहर से ही भीतर जाना पड़ता है। फिल्म के ज्यादातर दृश्यों में दीपा चुप है इसलिए फिल्म में उसकी देहभाषा का ही बारीक अंकन है। उसकी खीझ और तुनक, फिर उसका पिघल उठना, उसकी असुरक्षा, उलझन, कातरता को कहानी में शब्दों के जरिए व्यक्त करना इतना कठिन नहीं, लेकिन फिल्म में उसकी लंबी नि:शब्दता को पार्श्व संगीत से, छोटी छोटी हरकत और अभिनय से मूर्त किया गया है और मन के भीतर समानांतर चलने वाले एकालापों, उलझनों और इच्छाओं को फिल्मकार ने दृश्य को फ्रीज करके सुनाने की तकनीक अपनाई है। उसके चरित्र में भी अंतर्निहित विरोधाभास है कि वो एक स्तर पर आधुनिका और आत्मनिर्भर होकर भी हृदय के स्तर पर अपराजेय और अभेद्य नहीं है। सपनों में खोई सी या अपने में उलझी सी यह भावुक लड़की कभी कभी बेहद कातर, अकेली, असहाय और असुरक्षित नजर आती है। और इसी पक्ष को उभारने के लिए बासु दा ने फिल्म की शुरुआत एक ऐसे दु:स्वप्न से की है जहां चलती ट्रेन में वो नितांत अकेली छूट गई है या एक निचाट प्लेटफार्म पर अकेली छूट गई है
नवीन के व्यक्तित्व को फिल्मकार ने लेखिका की आंखों से ही देखा है। यह और बात है कि उसमें कुछ आयाम और जोड़ दिए गए हैं। कहानी में निशीथ का अंतर्मुखी रूप संजय के खुले और सहज व्यक्तित्व का लगभग प्रतिपक्ष ही है। कवियों जैसे लंबे बाल और दुबला संवलाया चेहरा कहानी की तरह फिल्म में भी है। तो भी संजय के बरक्स उसे थोड़ा विशिष्ट बना दिया गया है। संजय की वेषभूषा और अंदाज ऑफिस जाने वाले किसी भी आम और मध्यवर्गीय युवा क है, और उसके कपड़ों और बालों पर ध्यान नहीं जाता। दूसरी ओर फिल्म का नवीन सादा होकर भी कुर्ते और पतलून में दिखाई पड़ता है। उसके व्यक्तित्व में उस समय के मीडिया की दुनिया और कलात्मकता का हल्का सा पुट है। थोड़ा सा बुद्धिजीवियों वाला अंदाज और अदा। फिल्म का नवीन एक के बाद एक सिगरेट जलाता रहता है और बहुत बार उसकी आंखों पर एक गहरा चश्मा रहता है जो उसके स्वभाव की अंतर्मुखता के अनुरूप उसके भावों को छुपाए रहता है। नवीन की जो छवि फिल्म में उभरती है वह अपने समय के बौद्धिक अथवा कलाकार वर्ग की हैý
दूसरी ओर संजय के व्यक्तित्व को काफी विस्तार दिया गया है। अनेक सहज दृश्यों के माध्यम से उसके व्यक्तित्व और दीपा से उसके संबंध की दृश्यात्मक व्याख्या की गई है। सबसे बढ़कर इस चरित्र के माध्यम से बासु दा ने हल्के ह्यूमर की सृष्टि की है। उसके आते ही पात्रों और दर्शकों के होठों के कोरों पर एक मंद मुस्कान आ जाती है। अक्सर उमस के बाद एक खुश्बूदार हवा के झोंके की तरह वो आता है। उसका मुस्कुराता चेहरा जब जब दिखता है, फिल्म का तनाव बिखरकर, धुंआ बनकर उड़ने लगता है। वह खिलखिला के दूसरों को हंसा देने वाला पात्र है, बला का बातूनी और भुलक्कड़। लेकिन अंतत: हर समस्या को गोली मारो के तकिया कलाम से उड़ा देता है। दीपा के साथ रहते हुए भी दफ्तर, चीफ, प्रमोशन, रंगनाथन, मेमोरेंडम और आखिर यूनियन की मांगें उसके दिमाग में भरी रहती हैं - और कभी कभी दीपा चिढ़ भी जाती है। दिल्ली की बरसात में अपनी फटी छतरी में जिस निर्कुंठ भाव से वो दीपा को बुलाता है, वो दृश्य बेहद सुंदर ही नहीं, रोमान की एक नई व्याख्या भी करता है। कहानी में बार बार देर से आने का जो सूत्र लेखिका ने दिया है, फिल्मकार ने उसे तरह तरह से उठाया है। फिल्म की शुरुआत में ही थियेटर के बाहर बेचैनी से इंतजार करती दीपा का दृश्य है। एक और दृश्य में वो फिल्म आधी बीत जाने पर पहुंचता है ओर उसके बाद भी टिककर फिल्म देख नहीं पाता। इसी बिंदु पर बासु दा फिल्म में फिल्म दिखाकर मानों मुंबइया फिल्मों पर एक टिप्पणी कर जाते हैं। भड़कीले गीत, चालू नाटकीयता दि‍खाकर वे एक विरोध का आभास भी यहां दे देते हैं

गुरुवार, अगस्त 12, 2010

स्त्री मन का अद्भुत निर्वचन



मन्‍नू भंडारी की यही सच है कहानी आपने पढ़ी होगी. और उस पर बनी रजनीगंधा फिल्‍म भी देखी होगी. इन दोनों को साथ साथ याद करना और आस्‍वाद लेना एक मजेदार अनुभव है. ब्लॉग की नजर से लेख जरा लंबा है. इसलिए किस्‍तों में दिया जा रहा है. अब पढि़ए चौथी किस्‍त-

लेकिन फिल्म में सुविधा के लिए कानपुर और कलकत्ता को दिल्ली और मुंबई में बदल दिया गया है। यों दिल्ली की सुरम्यता पेड़ों की कतारों वाली चौड़ी सड़कों, पृष्ठभूमि की मुगलकालीन इमारतों, मकबरों के अलावा बसों और बस-स्टापों के बीच मध्यवर्गीय जीवन में मूर्त होती है। यद्यपि ये दिल्ली की टिपिकल छवियां नहीं हैं। फिल्म में मुंबई किंचित मांसलता से उभरती है, अपने शरीर और आत्मा के साथ। जिसमें टैक्सी की खिड़की से भागते दृश्य हैं तो वहां का व्यस्त जीवन, चिपचिपा पसीना, पानी की समस्या, जमीन से ऊंचे घर और लिफ्टें, मैजिक आई से देखना भी है। निशीथ का काम (फिल्म में इसका नाम नवीन है) फिल्म में मूर्त हो जाता है। यहां विज्ञापन की दुनिया उभरती है। एक पार्टी के दृश्य के जरिए फिल्मकार मुंबई के उच्चभ्रू जगत का एक चुस्त कोलाज रच देता है। पार्टी में इधर उधर झांकता कैमरा और बातों के कुछ टुकड़ों में रेस कोर्स, नाटक, बुटीक और फिल्म जैसे शब्द झरते हैं। इस मेलजोल के पीछे संपर्क बढ़ाकर बिजनेस पाने के निहितार्थ को भी फिलमकार ने रेखांकित कर दिया है
फिल्म में कुछ बदलाव किए गए हैं जिनसे लगता है सरलीकरण हो गया है। जैसे दीपा को नितांत अकेले नहीं, दिल्ली में भाई-भाभी के साथ रहते दिखाया गया है। इस बदलाव के कारण मन्नू भंडारी के पात्रों के रिश्तों के बीच जो छोटे छोटे पेंच और भंवर पड़ते हैं और जिन्हें वे छोटे से किसी संकेत, वाक्य या मुद्रा से कह जाती हैं, वे अनकहे तनाव यहां नहीं हैं। दूसरे अकेले रहने से जो दीपा की आत्मनिर्भर युवति की छवि कहानी में बनती है, वह फिल्म में किंचित मंद पड़ जाती है। और फिर अचानक भाई-भाभी को जाना पड़ जाता है जिससे दीपा कहानी की मूल स्थिति में आ जाती है। यह युक्ति बहुत ज्यादा समझ में नहीं जाती, जैसे यह बात भी खास समझ में नहीं आती कि कानपुर को दिल्ली और कलकत्ते को मुंबई में क्यों किया गया है।
फिल्म का एक और सुंदर विस्तार दो पुरानी सखियों के मिलने के दृश्य में हुआ है। इरा के चरित्र का पल्लवन करके उसे एक प्रामाणिक रूप दिया गया है। इरा के पति की अनुपस्थिति में उनका अनौपचारिक खुला व्यवहार, गिले-शिकवे, छेड़डाड़ और चुहल मूर्त हो जाती है। इन दृश्यों में इरा के खुले और निस्संकोच विवाहित रूप तथा दीपा के खामोश और शर्मीले रूप का भी कहीं न कहीं एक सहज सा कंट्रास्ट है। फिल्म में नवीन और दीपा के संबंध-विच्छेद को भी छात्रों की हड़ताल से जोड़ा गया है। इस तरह बासू चैटर्जी सामाजिक और व्यक्तिगत की टकराहट के माध्यम से दो प्रेमियों की ईगो की सहज व्याख्या कर देते हैं। फिल्म और कहानी में एक और बड़ा फर्क मुंबई में दीपा और नवीन की मुलाकात से जुड़ा है। कहानी में एक कॉफीहाउस में संयोगवश इन दोनों की मुलाकात होती है, जबकि फिल्म में यह संयोग न रहकर सुनियोजित उपक्रम बन जाता है। हालांकि इसके पीछे इरा की व्यस्तता के चलते रेलवे स्टेशन पर दीपा को रिसीव करने न जा पाना है। वैसे भी मुंबई जैसे जनसमुद्र में ऐसे संयोगों की जगह नहीं है। इसलिए यह परिवर्तन आरोपित नहीं लगता।

गुरुवार, अगस्त 05, 2010

स्त्री मन का अद्भुत निर्वचन


मन्‍नू भंडारी की यही सच है कहानी आपने पढ़ी होगी. और उस पर बनी रजनीगंधा फिल्‍म भी देखी होगी. इन दोनों को साथ साथ याद करना और आस्‍वाद लेना एक मजेदार अनुभव है. ब्लॉग की नजर से लेख जरा लंबा है. इसलिए किस्‍तों में दिया जा रहा है. अब पढि़ए तीसरी किस्‍त

पूरी कहानी दृश्य-गंध-ध्वनि और गति को शब्द के माध्यम से आंकती एक फिल्म जैसी ही है। कहानी में रजनीगंधा के फूलों की महक भरी है। कहानी की एक एक भंगिमा, एक एक वाक्य ऐसा है कि फिल्मकार कुछ भी कहां छोड़ पाया है। उसने शब्द की हर भंगिमा को अपनी निजी भाषा में ढाला है। जिस तरह किसी चित्र को देखते हुए हम चित्रकार की दृष्टि के भी रूबरू होते हैं, उसी तरह फिल्म को देखने से आभास होता है कि फिल्मकार कहानी पर इतना मुग्ध है कि न केवल ऐसे ऑफबीट विषय को फिल्म के लिए चुनने का जोखिम उन्होंने उठाया, बल्कि कहानी के सौंदर्य से छेड़छाड़ किए बगैर उसे बरकरार रखने की कोशिश भी की है, उसे पूरा सम्मान दिया है। फिल्मकार इस मार्मिक कहानी की उंचाई तक फिल्म को पहुंचाना चाहते थे, उसकी सूक्ष्मता और मानवीय सार को व्यक्त करना चाहते थे। विश्व फिल्म इतिहास में ऐसा कम हुआ है कि अच्छी कहानी या उपन्यास पर फिल्म भी उसी स्तर की बनी हो। पर यह फिल्म इस दृष्टि से अपवाद है
फिल्म माध्यम की अनिवार्यता के तहत फिल्मकार ने जहां कुछ तब्दीलियां और सरलीकरण किए हैं, वहीं कुछ विस्तार अैर पल्लवन भी फिल्म के हक में किए हैंý
फिल्म ने कथा के दृष्टिकोण को लगभग यथावत् रखा है। यानी फिल्म भी दीपा के ही दृष्टिकोण से कही गई है। मन्नू भंडारी इस तकनीक की - बेहद सांद्र तकनीक की, बड़ी माहिर प्रयोक्ता रही हैं - हम याद कर सकते हैं आपका बंटी और त्रिशंकु की युवा होती किशोरी क। यह कहानी के शिल्प का बहुत महत्वपूर्ण पक्ष है कि कहीं भी लेखिका अपने या दूसरे पात्रों की नजर से कुछ नहीं कहती। जो कुछ भी प्रतिबिंबित हो रहा है वो सब दीपा के दृष्टिबिंदु से और उसी के मन में हो रहा है। लेकिन फिल्मकार के लिए इसे यथावत दिखाने में बड़ी चुनौती छिपी थी। दीपा के मन में हर पल चलने वाली उलझन, बाहरी खामोशी के भीतर चलने वाले संवादों-प्रतिसंवादों, एकालापों को, विस्मय और संवेग के तमाम उद्गारों को कैसे दिखाया-सुनाया जाए। पर बासू चैटर्जी जैसे फिल्मकार ने इसके लिए अपने माध्यम को तरह तरह से आविष्कृत किया। क्योंकि वह इस कहानी को उसी रूप में और उन्हीं डिटेल्स के साथ, अपने माध्यम में दर्शकों को सुनाना चाहते थे, जिस रूप में यह मन्नू जी की कलम से निकली थी।

कहानी के शिल्प को खुला छोड़ दिया गया है। यानी आदि से अंत वाली कालक्रमिकता यहां नहीं है। कहानी दो समय खंडों में और दो स्थानों में आवाजाही करती है। फिल्म में भी कहानी के उस मूल शिल्प को बरकरार रखा गया है जिसमें पूरी कहानी दो स्थानों, दो भूगोलों या दो परिवेशों में बंट जाती है। ये दो स्थान मूल द्वन्द्व का प्रतीक बन जाते हैं, ये संजय और निशीथ के प्रतीक बन जाते हैं - दीपा के वर्तमान और अतीत के प्रतीक। इनमें भविष्य के अंकुर अलग अलग ढंग से फूटना चाहते हैं। दोनों स्थानों का द्वन्द्व अंतत: उभरता है। पर पृष्ठभूमि में किंचित दूरस्थ अतीत में पटना भी है जहां पिता और भाई-भाभी के संरक्षण में पढ़ते हुए सत्रह साल की उम्र में दीपा ने निशीथ से प्रेम किया था

सोमवार, अगस्त 02, 2010

स्त्री मन का अद्भुत निर्वचन



मन्‍नू भंडारी की यही सच है कहानी आपने पढ़ी होगी. और उस पर बनी रजनीगंधा फिल्‍म भी देखी होगी. इन दोनों को साथ साथ याद करना और आस्‍वाद लेना एक मजेदार अनुभव है. ब्लॉग की नजर से लेख जरा लंबा है. इसलिए किस्‍तों में दिया जा रहा है. अब पढि़ए दूसरी किस्‍त -


कहानी एक पढ़ी-लिखी युवती दीपा की है, उसकी नजर से और उसी की जुबां में लिखी गई है। दीपा कानपुर में अकेली रहती है और अपने थीसिस पर काम कर रही है। वह संजय नाम के एक युवक, जो एक ऑफिस में काम करता है से प्रेम करती है। अक्सर उन दोनों की शामें कभी घर तो कभी बाहर घूमते हुए साथ कटती हैं। कहानी की शुरुआत ही दीपा के इंतजार से शुरू होती है। यह इंतजार पूरी कहानी में रूप और पात्र बदल-बदल कर आने वाला मोटिफ है। उसी तरह एक सहज पर मार्मिक मोटिफ विदा करने का भी है। इन सब के बीच जगहों की, पात्रों की भूमिकाएं शिफ्ट होती रहती हैं‎‎। चीजें वही रहती हैं पर आलंबन बदल जाते हैं
मन्नू भंडारी ने दीपा में ही दो तरह की छवियों को अंकित किया है। इंतजार में भटकते मन और निगाहों वाली तथा सपनों के रोमांच में खोई खोई सी दीपा, तथा अचानक विभक्त-मना, उलझी, असुरक्षित और कातर दीपा। कहानी में संजय के व्यक्तित्व की रेखाएं कम सही, पर बड़े अचूक ढंग से उसे अंकित कर देती हैं कि प्रेम के अलावा भी वह पूरी दुनिया में डूबा है। उसका व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा सरल है कि वह जहां हो वहीं का हो कर रह जाता है। अत: बार बार देर से आना उसकी आदत बन गई है। पर वह दिल का साफ और बच्चे की तरह मासूम है इसलिए लाड़ दुलार, प्रेम मनुहार करके दीपा को मना भी लेता है।
दीपा का एक अतीत भी है जब पटना में पढ़ाई करते हुए उसने निशीथ से प्रेम किया था। फिर किसी बात पर वह संबंध निशीथ की ओर से टूटा था और अपने पीछे अपमान का तिक्त स्वाद, आंसुओं का ज्वार और घनी रिक्तता छोड़ गया था। अत: अब निशीथ का नाम मजाक में भी सुनना उसे पसंद नहींý
लेकिन कहानी में मोड़ तब आता है जब दीपा को नौकरी के सिलसिले में इंटरव्यू देने अकेले कलकत्ता जाना पड़ता है। वहां एक नए परिवेश में अचानक उसकी भेंट फिर से अपने अतीत यानी निशीथ से हो जाती है। निशीथ दीपा की नौकरी के लिए पूरी तरह जुट जाता है। इधर दीपा इन तीन चार दिनों के साथ में उसकी अनकही भावनाओं का आकलन करते करते अपने ही मन में विभक्त होने लगती है। एक गहरे नैतिक संकट के तहत उसे लगता है कि निशीथ को संजय के बारे में सब बता देना चाहिए ताकि किसी तरह की गलतफहमी न रहे। पर दूसरी ओर अनकहे आकर्षण के चलते उसके ओंठ भी नहीं खुलते ... ।
अपने लिए खामोशी से इतना कुछ करते देख और अतीत की मंद रोशनी में उसका हृदय पिघलने लगता है। कभी जिज्ञासा होती है, कभी हल्की सी मोह भरी सहलाहट। और वह चाहने लगती है कि वह साफ साफ कह क्यों नहीं देता। वह उसके पसंदीदा रंग की नीली साड़ी पहन लेती है। साथ कॉफी पीते हुए निशीथ के कांपते ओठों की धड़कन तक महसूस करती है। और एक वह क्षण आता है कि वह चाहने लगती है कि निशीथ हाथ बढ़ाए और उसे छू ले। उसे घेर ले एक आलिंगन में। पर मानो निशीथ का हृदय बस फड़फड़ाता है
फिर कलकत्ता और निशीथ से विदा होने का वह क्षण आता है जब निशीथ को देखते हुए उसकी आंखें कातर हो उठती हैं। वह सुनना चाहती है वह बात जो उसके कानों और हृदय में बज रही है। गाड़ी की सीटी के साथ आंखें छलछलाती हैं और झटके से गाड़ी के सरकने पर आंसू बह आते हैं... और तब निशीथ के हाथ का क्षणिक स्पर्श ....ý

शुक्रवार, जुलाई 30, 2010

स्त्री मन का अद्भुत निर्वचन


मन्‍नू भंडारी की यही सच है कहानी आपने पढ़ी होगी. और उस पर बनी रजनीगंधा फिल्म भी देखी होगी. इन दोनों को याद करना साथ साथ याद करना और आस्वाद लेना एक मजेदार अनुभव है. ब्‍लॉग की नजर से लेख जरा लंबा है, इसलिए किस्‍तों में पढि़ए.

कई साल पहले एक शाम एक फिल्म देखी थी - नाम था रजनीगंधा। तकनीकी बारीकियां, फिल्म माध्यम, तब भला कहां समझ में आती थीं‎‎। पर फिल्म की छवियां थीं कि मन में अटकी रह गई थीं। कुछ था जो मुंबइया फिल्मों की भीड़ से अलग था। बेहद सहज और अपने आसपास की दुनिया के पात्र और चेहरे। नकली और झूठा सा तो कुछ भी नहीं था। न जोरदार संगीत, न शब्दबहुल नाटकीयता न चकाचौंध और ग्लैमर कहानी प्रेम से जुड़ी थी जिसमें एक स्त्री और दो पुरुष छवियां थीं। दोनों पुरुषों के व्यक्तित्व कितने अलग-अलग थे। पर दोनों अपनी अपनी तरह से भले लगते थे। कोई खलनायक न था। न कोई नायक था। बस एक कोमल सी कहानी में एक कोमल सी नायिका और उसके प्रेम को लेकर या कहें प्रेमपात्र को लेकर एक उलझन।
फिर कुछ अंतराल के बाद मन्नू भंडारी की कहानी पढ़ी - नाम था यही सच है। एक एक पंक्ति पढ़ते हुए मन उमगने लगा था। और रहस्य खुलता गया था कि इसी कहानी पर ही तो बनी होगी वह फिल्म। सभी कुछ तो वही है - दीपा की इंतजार करती आंखें, वो खुद कभी बालकनी से झांकती तो कभी कमरे के भीतर आती, किताब खोलती कभी बंद करती, कभी अलमारी खोलती, कभी दीवार घड़ी की सुइयों को देखकर परेशान सी होती। हवा से पर्दा कांपता और वह चिंहुक कर उस तरफ देखती कि शायद संजय आ गया। वाह क्या कहानी थी! जैसे कोई खूबसूरत नीलाभ पारभासी पत्थर, जिसे प्रकृति ने ताप और ठंडक के मेल से बनाया हो - भीतर तक जिसमें रंग और बुलबुले दिखते थे। कितना अनूठा था कथ्य और उतना ही अनूठा शिल्प भी। लय से भरा हुआ, मानो आलाप की नींव से एक संगीत लहरी धीरे धीरे ऊपर उठती जाती है। लेकिन अनूठा होकर भी शिल्प इतना सहज था जैसे एक डाल पर से दो टहनियां फूटें और उनमें अपनी अपनी कोंपलें और फूल पत्ते हवा के झोंको में लरजने लगें।
प्रेम पर अनेक कहानियां लिखी गई हैं। स्वयं मन्नू ने भी प्रेम पर कई कोणों से कई बार लिखा है। पर यह कहानी प्रेम के पारंपरिक मिथक को जिस मासूमियत से, बिना किसी क्रांतिकारी तेवर के ध्वस्त करती है, उसकी मिसाल शायद ही मिले। खासकर स्त्री मन का ऐसा निर्वचन शायद तब तक हुआ नहीं था। कहानी में बाहरी तौर पर कोई बड़ी घटना नहीं घटती, कोई लंबा चौड़ा इतिवृत्त नहीं बनता, फिर भी एक छोटी सी परिस्थिति से मन:स्थितियां बदलती हैं, कुछ ऐसे, जैसे रेगिस्तान में हवाएं चलने से रेत के बदलते आकारों से भूदृश्य बदल जाता है। पूरी कहानी में पल पल मन की तरगें कभी उठती हैं, कभी गिरती हैं। वृत्त बनते जाते हैं। एक पल उमस भरा है तो दूसरे ही पल हवा का झोंका आ जाता है। यानी यह मन:स्थितियों की ही कहानी है । अंतत: भीतर ही भीतर एक द्वन्द्व में उलझती दीपा की कहानी। लेकिन उलझने का स्पेस भी तो जब कोई खुद को देता है, विशेषकर स्त्री, तो मन की यह उड़ान एक खास चेतना की परिचायक बन जाती है। मन को टटोलना, ईमानदारी से भावों के आधार पर प्रेम में चुनाव के संकट से जूझना, यह जोखिम उठाना, स्त्री की एक अभूतपूर्व छवि की रचना करता है। कई सवालों के बीज कहानी से फूटते हैं। क्या प्रेम कोई स्थिर धारणा है? क्या एकनिष्ठता ही प्रेम का चरित्र है? क्या अतीत बस अतीत हो जाता है? क्या वह नया जन्म लेकर हमारे सम्मुख लौटता नहीं? और क्या वर्तमान को अतीत बनते बहुत देर लगती है? और फिर इसके अलावा प्रेम की अभिव्यक्ति और संप्रेषण के उजले और धुंधले कितने स्तर हैं? कितने चौड़े रास्ते और संकरी गलियां हैं? क्या प्रेम मादक कल्पना और रोमान से जन्म लेता है? या सहज स्वाभाविक मैत्रीपूर्ण अंतरंगता का नाम प्रेम है?

सोमवार, नवंबर 24, 2008

ढूंढ़ लाया हूं वही गीत मैं तेरे लिए

ढूंढ़ लाया हूं वही गीत मैं तेरे लिए



बचपन की आंतरिकता के सरोवर तक स्मृति की सीढ़ियां पहुंचती हैं। जैसे समय का कोई दूसरा ही तल हो। यहां भी एक विराट संसार है। लेकिन उस सब को समेट ले, इतनी बड़ी अंजुरि नहीं। कच्चा सा मन, उससे भी कच्ची बुद्धि‍ लेकिन संवेदनाओं का संसार खूब टटका...। न जाने कितने दृश्य हैं जो भीतर तह दर तह दबे पड़े हैं। उनके रंग ज़रा भी तो फीके नहीं पड़े- शायद इसलिए कि तब हमने दृश्यों को, वस्तुओं को उनके रंगों और रूपाकारों में ही भीतर उतारा था। यादों की नीम अंधेरी सुरंग में घुसो तो रोशनी के अनेक रूप उभरते है - कई स्रोतों से फूटती, अलग अलग कोण एवं डिज़ाइन बनाती रोशनियां और अंधेरे। अनेक स्पर्श बोध सरसराते हैं। और विशिष्ट गंधों के झोकें तो समय के लंबे अंतराल को मानों अपने गरुड़ पंखों से एक पल में लांध जाते हैं। यहीं दबी पड़ी हैं अनेक ध्वनियां, आवाज़े और पुकारें - सृष्टि और प्रकृति की, मानव सभ्यता की और फिर घर की चौहद्दी की। यही ठहर ठहर कर और रुक रुक कर आने वाली पुकारें और आवाज़ें जो अनुभूति और आवेग की उद्दामता में स्वर लहरी बन जैसे हवा में लहराने लगी हों।

तो वो परिवेश और परिदृश्य मां और पिता की बांहों के दायरे से लेकर, बिस्तर की चौहद्दी, कमरे, गलियारे और घर आंगन से लेकर बाहर सड़कों, चौराहों, समृद्र और आकाश तक प्रसरित था। इस सब में दिन, शाम और रात के रंग जगते-बुझते, लोग, चेहरे और फूल खिलते, पेड़ झूमते। इसी ऐन्द्रिय गम्य संसार से कच्ची पक्की भावनाओं का रिश्ता भी बनने लगा था। तो इस विराटता और बहुरूपता में कुछ स्वर लहरियां होती जो कहीं से भी, कहीं भी बहते पानियों से बहने लगतीं और संपूर्ण परिवेश में हस्तक्षेप करतीं। ये स्वर लहरियां और उनमें ढल गए शब्द उन गीतों के होते जिन्हें बाद में हमने फिल्मी गीतों के रूप में पहचाना। ये स्वर हमारे अमूर्त और औघड़ से भावों के निकट आ जाते और भीतर और बाहर के दृश्य संसार में कुछ अतिरिक्त उजास सी भर जाती। जैसे कायनात ही कुछ कहने लगी हो, कोई वाणी उसके भीतर से फूटी हो। अनकहे - अरूप भावों में कोई सूरत सी उभरने लगती। मन ठहर कर सुनने लगता। कुछ शब्द भी होते जो हंस स्वरों की पीठ पर सवार आकाश में उड़ाने भरते होते, हमारी चेतना पर मंडराते और हमारे कंधों पर आ बैठते।

अपने बचकाने और सीमित अनुभव संसार की बिनाह पर ही हम शब्दों की छवियां एवं अर्थ ग्रहण करते हैं। बालमन खंड खंड शब्दों को पकड़ पाता है, संपूर्ण अर्थ या प्रोक्ति को नहीं। और ये अर्थ भी मनस बिंब के रूप में ही उभरते हैं। बाद तक भी शब्दों के साथ हमारा बचपन लिपटा रहता है। इरविन एडमैन कहते हैं - शब्द कभी अनासक्त अर्थों के वाहक नहीं होते यानी एक ओर वे ध्वनि एवं टोन होते हैं, दूसरी ओर त पूर्ण प्रतीक, तो तीसरी ओर भावनात्मक उत्तेजना। उनमें बाल्यकाल की स्मृतियां होती हैं, और उस समय की परिस्थितियों के साहचर्य (असोसिएशन्ज़) भी। तो तबका छोटा सा अनुभव संसार था। उसी से छन कर कुछ बिंब और छवियां शब्दों से झरतीं और हमारी झोली में आ गिरती। कुछ तासुरात, कुछ कैफियतें भी उनके गिर्द लिपटी होतीं - जिन्हें खोल पाना या जिनकी व्याख्या कर पाना तब उस अवस्था के बस की बात न थी। लेकिन कुछ तो था - कोई मीठी सी अनुभूति, एक झंकृति। अपने और इस संसार के होने का बोध सा जग जाता जो शेष अनुभूतियों से भिन्न होता। दो मिनट तक एक जादू सा तारी रहता, फिर अचानक तिलिस्म टूट जाता। देश और काल सबकुछ को वैसे ही धारण किए होता पर फिर भी जैसे अचानक खाली सा हो जाता। मन का जो संप वस्तुजगत से हुआ था, वो एकबारगी टूट जाता। कुछ समय पहले, निकटतम दृश्य का जो चौथा भावमय आयाम उभरा था - वो अब विलीन हो जाता। और चीज़े अपनी सामान्यता और सतही अस्तित्व में लौट आतीं।

गर्भ के भीतर धड़कन सुनने के बाद मां के हृदय की धड़कन और फिर थपकियों की ताल और गुनगुनाहटों की स्वरता के बाद संगीत की शक्ति से यह भी एक महत्वपूर्ण सामना था। और ये एक ऐसा साहचर्य था जो जीवन भर बना रहा। बहुत से अमूर्त भावों के नयन-नक्श इन्हीं गीतों ने उभारे और फिर कुछ विचार, जो विचार ही बने रहते तो ठीक से भीतर घुल नहीं पाते। इन्हीं स्वरों की भंगिमाओं में ढल गए और फिर हमारी निजी एवं जातीय भंगिमाओं का हिस्सा बने।

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लोकांचलों में जो स्थान लोकगीतों और लोक धुनों का है, कुछ कुछ वैसा ही आधुनिक शहरी अंचलों में फिल्मी गीतों का रहा है। भारतीय समाज में संगीत केवल मंच एवं फिल्म का ही नायक नहीं-- बल्कि जीवन की हर 'समवेतता' के रूप के साथ जुड़ा है। फिर वो चाहे राजनीतिक सभा हो, धार्मिक सभा, मेले--जुलूस हों, तीज त्यौहार हो या मृत्यु का मातम। बच्चे के प्रभाव ग्रहण और संवेदन-प्रत्यक्षीकरण के विकास और दूसरी ओर मानवजाति के संवेदन प्रत्यक्षीकरण के क्रमिक ओर ऐतिहासिक विकास में कुछ समांतरता तो जरूर है। और इसी आधार पर यह कहने का मन होता है कि फिल्मी गीतों ने तमाम शहरी और कस्बाई भारतीय जनमानस के दु:ख:सुख को ग्रहण किया है, उन्हें गाकर उन्हें ही लौटाते वक्त साथ में जीवन जीने का रोमान और संघर्ष की शक्ति दी है। इन गीतों ने इस जन की अनेक अनुभूतियों और स्थितियों को शब्द और बिंब दिए है,स्वर और लय बक्शे हैं। फिर इन्हीं गीतों ने अस्थाई रूप ही से सही दर्शन की उद्दात्त मनोभूमियों को भी जनमानस में रोपा है, पल्लवित किया है। समाज और व्यवस्था ने उन्हें जैसा भी न्यायविहीन जीवन दिया हो, चेहरों पर जैसी भी विडंबनाएं उकेरी हों, इन जन कलाओं ने ही जन को यह ताकत दी है कि वे इस जीवन को झेल ले जाएं। जीवन जैसा भी दारुण हो, उसे गीत में ढाल कर गाया जा सकता है। यह अनमोल दर्शक भाव भी वहीं से मिलता है। कुछ भी जी लेने के बाद उससे कुछ दूर खड़े होकर उसे देखा जा सकता है, अपलक, और शब्दों की माला में गूंथा जा सकता है, स्वर एवं लय में बांधा जा सकता है, रंग रेखाओं में निबध्द किया जा सकता है। और इस तरह निज से ऊपर उठकर उनका संस्कार किया जा सकता है। जीवन में ही क्षणिक ही सही पर मुक्ति का अहसास पाया जा सकता है। और फिर इसी ज़मीन से फूटती है संघर्ष की शक्ति और जीवन का रोमान।

जन के दु:ख तकलीफ़ों की छाया मन में घुमड़ती है तो मुकेश की सीधी, सच्ची आवाज़ में गाया एक गीत उभरता हैः
दिल का हाल कहे दिल वाला। सीधी सी बात न मिर्च मसाला। कह के रहेगा कहने वाला। छोटे से घर में ग़रीब का बेटा। मैं भी हूं मां के नसीब का बेटा। रंजोगम बचपन के साथी। आंधियों में जली जीवन बाती। भूख ने है बड़े प्यार से पाला....
भारत की दरिद्र जनता की यह एक ऐसी अभिव्यक्ति (तस्वीर) है जिसमें उसका दु:ख और संघर्ष, जीवट और रोमान घुलामिला सा है। गाने वाली की आवाज़ का असर, शब्दों का रचाव, सीधी धुन एवं ढोलक या ढफली की सरल थापों पर गाया गया गीत वाकई कला के करतबबाज़ो (सीधी सी बात न मिर्च मसाला) और भाषाई छल से परे जाता है। दरिद्र के कठिन जीवन को यह काव्य बना देता है। लेकिन ये ग्लोरीफिकेशन नहीं, अफ़ीम नहीं, कोई ऐसा भुलावा नहीं जो दु:ख से दूर किसी नकली दुनिया में बहका कर ले जाए। यहीं, इसी समाज में रहते हुए, उसकी तमाम विसंगतियों के बीच यह एक आकलन है, जो निश्चय ही जीवन जीने की शक्ति को प्रखर करता है। सामाजिक अन्याय की बात एक ओर हृदय में घुटन भरती है तो दूसरी और उसका सार्वजनिक कलात्मक कथन शक्ति भी देता है।

बचपन ही की सतह से एक और पुकार उठती है। और गांवदेवी, मुंबई के पहले तल्ले के फ्लैट के बरामदे में शाम को सुन पड़ती है
राही मनवा दु:ख की चिंता क्यों सताती है / दु:ख तो अपना साथी है / सुख है एक छांव -- ढलती / आती है-जाती है...

गीत की दार्शनिकता को छू ले, ऐसी तो बुध्दि न थी। पर फिर भी स्वरों और कुछेक शब्दों के 'मेल' में कुछ ऐसा था कि सुनना भला लगता। बाद में आभास हुआ कि यह दु:ख की मस्ती है या फिर मस्ती से दु:ख को गाने का भाव है। गीत के बीच बीच में माऊथ आर्गन का बड़ा विशिष्ट पीस था जो शब्दों से भी ज्यादा उस धुन (जो स्वयं में एक भावानात्मक एवं दार्शनिक प्रोक्ति थी) की भावानात्मक टेक था। बाद में पाया कि वह संगीतत्मक टुकड़ा पूरी फिल्म का थीम संगीत था। खैर! तो वो शायद कोई भिखारी था (कौन जाने) पर उसके जीवन की व्यथा ने उस गीत में आश्रय खोज लिया था। दु:ख के प्रति यह स्वीकार भाव तो जीवन का अंतिम सत्व है। जबकि उस सुंदर गीत ने बालमन पर उसकी कोई प्राथमिक भूमि तो ज़रूर बनाई थी। ऐसी ही भूमि, या फिर उससे उच्चतर भूमि जन मन में भी तो बनी होगी। क्या इसे प्रतिक्रियावाद कहकर नकारा जा सकता है। दु:ख के अस्तित्व को कौन नकार पाएगा लेकिन डरकर, भागकर उसका सामना क्या संभव हो पाता है। उसके करीब जाना होता है, मैत्री करनी होती है, बुध्द की तरह।

कुछ और बड़े होने पर जब करुणा के अंखुए भीतर फूट रहे थे तो एक और गीत सुनाई पड़ा फिल्म (दोस्ती) का

जाने वालो ज़रा / मुड़के देखो मुझे / एक इंसान हूं / मैं तुम्हारी तरह... फिल्म बाद में देखी पर गीत के टुकड़ा टुकड़ा शब्द, मन को मसोसने वाले स्वर तो पहले से छूते रहे। फिल्म में एक अंधा किशोर, हालात का मारा, सड़कों पर गुहारता दिखता है।

मेरे पास आओ, छोड़ो ये सारा भरम / जो मेरा दु:ख वही है तुम्हारा भी गम / फिर रहा हूं भटकता / मैं यहां से वहां / और परेशान हूं।

छटपटाती हुई टेक बार बार लौटती है - ''मैं तुम्हारी तरह''

अंतरे में अद्वैतवाद की स्पष्ट गूंज है लेकिन लौट लौट कर जो सत्य गीत के भीतर छटपटाता है, वह है मनुष्य का मनुष्य को पुकारना, सब वर्गीय, जातीय भेदों को नकार कर। एक का दूसरे से यह कहना कि देखो, ठीक से, भीतर तक। मैं कोई 'अन्य' नहीं। तुम सा ही हूं। दीवारों के पार, बराबरी के रिश्ते से इंसान, इंसान से संवाद साधने की कोशिश करता है। यह भाव बोध शब्द और संगीत के मेल से जन्म लेता है-- ताकि अर्थ से आगे।

वर्षोँ बाद विद्यार्थी जीवन के दौरान गुरुनानक विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए, ऊब कर जब हम चौथे तल्ले से भोले की दुकान में चाय पीने उतरते तो फिर ठिठुरन भरी सर्दी में कुछ गीत होते जो पास सिमट आते और उमस भरी गर्मी में ठंडे झोके से बहते। अंधेरे से कमरे में स्टोव से काले पड़े धातु के बर्तनों और शीशे के गिलासों का संसार था। खस्ता हाल स्टोव पर चाय का पानी चढ़ा रहता और इसी संसार में रमा भोला सबको ढाल ढाल कर चाय पिलाता। वो मुहम्मद रफ़ी के गीतों का दीवाना था। एक से एक सुंदर, मधुर और दर्द भरे गीत बजते रहते और भोला गुनगुनाता हुआ अपना काम करता। खूब काली दाढ़ी और काली आंखे वाले सरदार की आंखों में अजीब सी कोमलता थी। यह स्वप्नमयता और मस्ती यकीनन उस संगीत का प्रभाव था जो उसका बेहद आत्मीय संगी था।

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कहा जाता है कि भारतीय फिल्मों में फिल्मी गीत एक पुरानी रूढ़ि है (संस्कृत नाटकों से आई हुई)। संगीतशास्त्री अशोक रानाडे शुरुआती गीतों को बाद के फिल्मी गीतों से इस अर्थ में अलगाते हैं कि वे मौखिक संस्कृति का ही (वार्तालाप) हिस्सा थे। शुध्द गद्य से छंदों में और छंदों से सरलतम धुनों में यह वार्तालाप सहज आवा-जाही करता था और यहां ज़रूरत सौंदर्यात्मक से ज्यादा सम्प्रेष्ण ही की अधिक थी। खैर आज जिस अर्थ में हम 'फिल्मी गीत' को जानते हैं वह एक ओर तो रागों की छाप तो दूसरी ओर लोक धुनों के मेल वाला, पाश्चात्य वायलिनों, गिटार, ड्रम के साथ अनेक भारतीय साज़ों की संगत वाला, ढाई मिनट का यह गीत अपनी तरह की एक उत्कृष्ट संकर विधा है। लेकिन संगीत निर्देशकों में मधु मास्टर, प्रभात स्टूडियो के केशवराव भोले, कृष्णराव फुलम्व्रीकर, न्यू थियेट्रज़ के तिमिर बरण और रायचंद बोराल से लेकर सरस्वती देवी, चितलकर, एस.डी. वर्मन, हेमन्त कुमार, ओ.पी. नैयर, मदनमोहन इत्यादि तक तथा गायकों में अशोक कुमार, कानन बाला, उमादेवी, सी.एच. आत्मा, सहगल, सुरैया, शमशाद बेगम से लेकर मुकेश, रफ़ी, हेमन्त, तलत, मन्नाडे, लता, आशा, किशोर कुमार, येसूदास... तक यह दीर्घ परंपरा क्या केवल रूढ़ि के ज़ोर पर जिंदा है। संगीत भारतीय जनमानस का एक अंग ही नहीं, एक महत् मूल्य है। अनेक फिल्मों में संगीत स्वयं में एक थिमेटिक मोटिफ़ है। जहां नायक संगीत का साधक है, दिवाना है। किसी एक पुरानी फिल्म में जब नायिका नायक से संगीत छोड़ देने की शर्त रखती है तो नायक को गहरा सदमा लगता है और वह नायिका से रिश्ता तोड़ लेता है। 'बैजू-बावरा' जैसी फिल्मों में प्रेम और संगीत एक दूसरे के पूरक हैं, अविभाज्य से हैं। प्रेम के बिछोह और पीड़ाओं से संगीत उर्जस्वित होता जाता है और राजसत्ता तक को चुनौती दे डालता है। एक ओर ग़रीब, फटेहाल गायक के दु:ख की फहराती पताका है तो दूसरी ओर राजाश्रित उस्ताद का स्फ़ीत अंह। लेकिन ग़रीब की ज़िंदगी से उपजा संगीत, सुख-सुविधाओं में साधे गए अवकाश भोगी संगीत को पराजित कर देता है। यह संगीत का वर्ग चरित्र है - इस या उस कला का आमना-सामना है।

फिर सामान्य रूप से एक ओर कला की उज्ज्वलता और दूसरी ओर संसार की मलिनता का चिरंतन द्वंद्व भी हमारी फिल्में उठाती रही हैं। कला अच्छाई और संवदेनशीलता की प्रतीक है, सामाजिक न्याय की पक्षधर है और जन जन की उदात्तता का सघन रूप है। फिल्म का नायक इसी की मशाल जलाता है और जनता भी उसके गाये गीतों की अंगुलि थाम लेती है। 'सुर' जीवन की अंतिम आकांक्षा बनता है। संगी और साथी बनता है। बार-बार वेदना में डूबे स्वर उभरते हैं।

सुर सजे, क्या गाऊं मैं / सुर के बिना, जीवन सूना.... मेरे गीत मेरे संग सहारे / कोई मेरा संसार में / ..... तू ही बता मैं कैसे गाऊं बहरी दुनिया के आगे.....
सात सुरो के सातों सागर / मन की उमंगों से जागे.....

जीवन एवं प्रेम के लिए संगीत का संसार उपमान भी बनता है
साज़ हो तुम / आवाज़ हूं मैं / तुम बीना हो, मैं हूं तार.....

एक ओर संगीत एवं कला की पवित्रतम प्रतिमा है दूसरी ओर मलिनताओं भरा संसार। काव्य और साहित्य के लिए भी यह सत्य है, चित्रकला, मूर्तिकला और नृत्य कला के लिए भी। 'प्यासा' में कवि की कोमल एवं मानवीय कवि दृष्टि और समाज की महलों, तख्तों, ताज़ों और रिवाज़ों वाली शोषक दृष्टियां आमने-सामने हैं। 'नवरंग' के कवि की सुमधुर कल्पना एवं कटु यथार्थ के बीच भी एक खाई पैदा हो गई है। 'अनुपमा' में शोर शराबे और रंगीनी से भरी पार्टी में एक कवि भरी आवाज़ में गा रहा है -
या दिल की सुनो दुनिया वालो / या मुझ को अभी चुप रहने दो / मैं गम को खुशी कैसे कह दूं / जो कहते हैं, उनको कहने दो....


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बदलते हुए समाज की छायाओं को गीतों में पढ़ा जा सकता है। पूंजीवादी युग के बढ़ते कदमों और उसके साथ व्यवसायीकरण और अनन्त लोभ की आहटें इस प्रसिध्द गीत में क्या साफ सुनाई नहीं पड़तीं
रमइया वस्ता वइया..... उस गांव में, प्यार की छांव में / प्यार के नाम पर ही धड़कते थे दिल / इस देश में, तेरे परदेस में / सोने चांदी के बदले में बिकते हैं दिल.....
भोली भाली गंवई जनता के हार्दिक प्रेम और प्रकृति से जुड़े सौंदर्य बोध को इस 'बदलते मन' से गहरी शिकायत है...
तू और था, तेरा दिल और था / तेरी आंखों में यह दुनिया दारी थी / ..... तेरी बातों में मीठी कटारी थी.../ चांद तारों के तले, रात ये गाती चले... दिल, नज़र और जुबा का पूरा बदला पैटर्न यहां अंकित हो गया है।
ऐसे समय एवं समाज से कटते जाते मनुष्य के अकेलेपन और पराएपन के गीत भी अनेक हैं जो पूंजीवादी समाज में एक संवेदनशील मनुष्य की वास्तविक नियति को उजागर करते हैं।
जाने वो कैसे लोग थे जिनके / प्यार को प्यार मिला... हमको अपना साया तक.... अक्सर बेज़ार मिला....ऐसी ही अनुभूतियां एवं अकेलापन साहिर के इस गीत में भी उभरा है, जिस में स्वर भंगिमा दर्द और हताशा के नशे में इधर-उधर टकराती सी लगती है....
महफ़िल से उठ जाने वालो / तुम लोगों पर क्या इलज़ाम / तुम आबाद घरों के वासी / मैं आवारा और बदनाम.... / मेरे साथी मेरे साथी..... खाली जाम....धन के वर्चस्व के खिलाफ़ इन गीतों ने तान छेड़ी है, गहन विलाप किया है। ये और बात है कि अधिकतर प्रेम की भूमि से ही ये बादल घुमड़े और बरसे हैं।
ताज या तख्त या दौलत, हो ज़माने भर की / कौन सी चीज़ मुहब्बत से बड़ी होती है --
व्यवस्था और धर्मसत्ता के विरुद्ध भी आवाज़ सुनाई पड़ती है --
बेशक मंदिर मस्जिद तोड़ो / बुल्लेशाह ये कैहन्दा......मज़दूरों, किसानों के ऐसे हल्के-फुल्के गीत भी अपनी चौंध में प्रखर हैं --
कैसे दिवाली मनाएं हम लाला / अपना तो बारहों महीने दिवाला...गीत अवसाद में डूब जाते हैं और बार बार सवाल करते हैं कि ये कैसी दुनिया और समाज है जहां निगाहों में उलझन है, दिलों में उदासी और हर सू बदहवासी का आलम है। ऐसे समाज का पूर्ण अस्वीकार है --
यह दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?
(एक तीखे एवं उद्दाम प्रश्न की सांगीतिक भंगिमा)। ''यह दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है --'' (निश्वास की भंगिमा)।

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न जाने कितने कृषक गीत हैं, मांझी गीत हैं, गाड़ीवानों, तांगेवालों, रिक्शेवालों, नटों, बाज़ीगरों, बंजारों, कैदियों और भिखारियों के गीत हैं जो भारतीय जन जीवन को लोक गीतों के बाद फिर से प्रतिष्ठित करते हैं। कृषक गीतों में सामूहिक स्वरों की पुकार का सौंदर्य बोध अलग है। मांझी गीतों में चप्पू की लय और पानी के विस्तार पर बैठे व्यक्ति की अकेली गूंज है। किसान की प्रतीक्षा और सावन के आने की ठेठ किसानी खुशी

हरियाला सावन ढोल बजाता आया.... तक तक तक मन के मोर नचाता आया....


दूसरी ओर रोमांतिक विश्वदर्शन वाले मध्यवर्गीय व्यक्तिवादी (प्रगतिशील) गीत भी अनेक हैं जिनमें अलमस्त जिप्सी भाव, प्रेम, सौंदर्य, प्रकृति और व्यापक मानवतावाद या छायावादी स्वरूप उभरा है।

पुकारता चला हूं मैं / गली गली बहार की / हरेक शाम जुल्फ़ की..... हरइक निगाह प्यार की.....गिटार की मीठी 'स्ट्रमिंग्ज़' के बीच में टुकड़ा टुकड़ा छिटके हुए पलों की तरह के शब्द एवं स्वर उभरते हैं
आगे भी.. जाने न तू.. पीछे भी.. जाने न तू... जो भी है... बस यही इक पल है।


फिल्म संगीत में क्षणवाद और आनंदवाद का इससे बेहतर उदाहरण शायद ही मिले।

व्यक्ति चेतना के पूर्ण रूपांतरण का भाव भी 'फिल्मी गीत' जैसी नाकारा समझी जाने वाली विधा में उभरा है। मुक्तिबोध की कविता जिसे 'व्यक्तित्वांतरित' होना कहती है और जो सामाजिक क्रांति का ही व्यक्ति परक पक्ष है, आत्मा की उस नयी रसायनिक प्रक्रिया का अक्स क्या यह नहीं है?

आज पुरानी राहों से, कोई मुझे आवाज़ न दे / दर्द में डूबे गीत न दे / गम का सिसकता साज़ न दे.....स्वर उर्जस्वित होते जाते हैं
न वो भरम... न वो दीन धर्म... अब दूर हूं सारे गुनाहों से....

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दार्शनिक भूमियों के अतिरिक्त प्रकृति का संपूर्ण संसार है जो गीतों में खुलता आता है, कभी सीधे तो कभी उपमा रूप में। हवाएं और आंधियां गीतों के पट खोलकर बहती हैं, काली घटाएं छा जाती हैं, बिजलियां गीतों के आकाश में कौंधती हैं, धूप और बारिश की परियां नाचती हैं। पुरवा, बयार, ठंडी हवाओं के तेवर अनेक हैं। सुबहें, शामें और रातें मोटिफ़ की तरह आती है, कभी प्रतीक तो कभी कैफ़ियत के रूप में। नींद और जागृति भी एक मोटिफ़ के रूप में आते हैं

जाग दर्द इश्क जाग.... जाग दिले दिवाना... रुत जागी वसले यार की...

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अनेक भाव और उनके उनके शेड्ज़ हैं, मंद से उद्दाम तक उनकी अनेक डिग्रियां हैं। दु:ख के भाव अंधेरों, सपनों के टूटने, दियों के बुझने के मोटिफ़ बन गए हैं। घनीभूत दु:ख का भाव कहीं धीमे, उदास निश्वासपूर्ण कथन के रूप में आता है (हेमन्त ) तो कहीं ऊंची ऊंची तानों के क्रंदन में बदल जाता है (मुहम्मद रफ़ी)। कैफ़ी आज़मी के लिखे और रफ़ी के गाए 'हकीकत' के गीत में तो वियुक्त होने की पूरी प्रक्रिया ही संगीत के प्रकथन में ढली है। आकांक्षा धीरे धीरे हताशा में पर्यवसित होती है और फिर हताशा भी गहन से गहनतर होती जाती है। एकांतिक आत्मकथन के रूप में नीचे स्वर धीमे धीमे उभरते हैं --

मैं यह सोचकर उसके दर से चला था --

पैर आगे बढ़ते थे, पर आकांक्षा थी कि पीछे की ओर लहराती थी। ''हवाओं में लहराता आता था दामन'' यहां स्वर लहरी भी पीड़ा से मानों दामन ही की तरह लहरा गई है। शब्द एवं संगीत और रूप और अर्न्तवस्तु एक हो गए हैं । आहिस्ता- आहिस्ता बढ़ना और अंत में 'जुदा हो जाना' -- भांति भांति से इस 'चरम वाक्य' का सांगीतिक रूप उभरता है।

धीरोदात्तता के चरित्र गुण को व्यक्ति के संपूर्ण व्यवहार में पढ़ने के बाद, व्यक्ति की आंख और दृष्टि में पढ़ा जा सकता है, आवाज़ और संगीत में भी उसे सुना जा सकता है। हेमंत कुमार की आवाज़ की शायद यह खासियत थी कि पीड़ा से भरा होकर भी भाव एक प्रशांत मुद्रा में बाहर आता था।
जीवन से किया गया एक शिकवा या एक सवाल, गीता दत्त की मांसल आवाज़ और पियानों की मधुरता के बीच मंद होकर भी गहन है।

कैसे कोई जिए... ज़हर है ज़िंदगी... उठा तूफ़ान जो... रात के... सब बुझ गए दिए....

इसी प्रकार मानवीय आकांक्षाओं की ऊंचाई मापता, राग भीम पिलासी के स्वरों में बंधा रफ़ी का गीत --

मैंने चांद और सितारों की तमन्ना की थी / मुझको रातों की सियाही के सिवा कुछ मिला....

इसी तरह तलत महमूद पर ही फिल्माया और उन्हीं की आवाज़ में एक गीत था। अंधेरा, एकांत, बग्घी में लौटता नायक, चेहरे पर आती जाती छाया और प्रकाश में, भागती बग्घी की तीव्र एकरस घुड़चाल में बंधा उदास गीत --

रात ने क्या क्या ख्वाब दिखाए / रंग भरे सौ जाल बिछाए / आंख खुली तो सपने टूटे / रह गए गम के काले साये....

प्रेम की अभिव्यक्तियों पर बात शुरू करेंगे तो एक अलग संसार ही खुल पड़ेगा। क्योंकि प्रेम गीतों की रेंज तो ऐन्द्रिक से लेकर सूक्ष्म रोमांतिक तक है। एक गीत में 'गीत' ही प्रेम की संपूर्ण कोमलता और स्वप्नमयता का स्थानापन्न बन गया है। ये वो 'गीत' है जिसके लिए आंखों के दिए जलते हैं, जो गीत फूलों से भी कोमल है, शीशे से भी नाज़ुक है और जिसे केवल दिल में रख लेना होगा।

जलते हैं जिसके लिए / मेरी आंखों के दिए / ढूंढ लाया हूं वही / गीत मैं तेरे लिए....

गीतों में 'प्रतीक्षा' और 'प्यास' की अनेक भंगिमाएं हैं। पंछी भी एक मोटिफ़ है जो कभी कबीर का 'प्राण' एवं 'जीव' बनकर आता है तो कभी स्वच्छन्द वृत्ति का। 'मौन' भी गीत में ढला है।

बस यों .. चुपसी लगी है / नहीं, उदास नहीं...
या दिल की सुनो दुनिया वालो / या मुझको अभी चुप रहने दो......

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फिल्म बीसवीं सदी की तकनॉलोजी प्रधान विधा है। सुखद संयोग है कि इस कला विधा का विकास हमारे देश में भी दुनिया के दूसरे देशों के समकक्ष ही हुआ है। यह एक लोकप्रिय कला माध्यम है जो अपना सार लोक से ही ग्रहण करता है। फिल्मी गीत तो मानो आधुनिक लोकगीत ही हैं। इनकी संगीत रचना में भी भारतीय शास्त्रीय और लोक संगीत का घुलाव है। फिल्मी गीत संगीत एक तरह से भारतीय मानस का आईना है। इसलिए इसमें वो सब मिल जाता हे जो लोक में व्याप्त है।