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सोमवार, जनवरी 23, 2023

कृष्णा सोबती का पहला और अंतिम उपन्यास : चन्ना

 


कृष्णा सोबती का पहला और अंतिम उपन्यास : चन्ना

सापेक्ष के विनोद कुमार शुक्ल विशेषांक के लिए हम दोनों (अनूप सेठी और सुमनिका सेठी) ने उनके उपन्यासों पर परस्पर संवाद किया था। संपादक महावीर अग्रवाल जी की अपेक्षा थी कि कृष्णा सोबती के उपन्यासों पर भी हम वैसे ही संवाद करें। अन्यान्य कारणों से वह उस तरह संभव नहीं हो पाया। फिर तय हुआ कि चन्ना उपन्यास पर यह संवाद हो। मैं उपन्यास पढ़ने में फिर पिछड़ गया। सुमनिका जी ने उपन्यास पढ़कर जब मुझे कहानी सुनाई तो मेरे मन में कई प्रश्न उठे। सुमनिका जी ने उन्हीं के उत्तर यहां दिए हैं। चन्ना को समझने का यह प्रयास प्रस्तुत है।    

अनूप सेठी और सुमनिका सेठी

अनूप: क्या दस पंद्रह पंक्तियों में 'चन्ना' उपन्यास की कहानी कही जा सकती है- ताकि जिसने यह उपन्यास न पढ़ा हो उसे कहानी का कुछ अंदाज़ हो सके?

सुमनिका: दस पंद्रह पंक्तियों में चन्ना की कहानी शायद ही कह पाऊँ। क्योंकि पढ़ने के बाद मुझे लगा कि यह तो कोई महागाथा है। चन्ना की कहानी उसमें है- लेकिन उस कहानी से लिपटा पूरा एक देश है, काल है, वातावरण है, कितने ही पात्र हैं, और हैं उनकी  अन्तरकथाएँ । एक-एक दृश्य की बारीकियों में रम कर लिखा गया यह उपन्यास कृष्णा जी का पहला उपन्यास है- शायद  सन 1950 में लिखा गया, पर पहले  उपन्यास का नौसिखियापन तो कहीं नहीं। वही गहरी, बहती, छलछलाती हुई भाषा का तेवर है। चन्ना केंद्र ज़रूर है, पर उससे जुड़े जितने  भी पात्र हैं- जैसे हर पात्र खुद में एक संसार है। उन सबके आत्मतत्व में लेखिका गहरे प्रवेश कर जाती है, भीतर तक- मन की सारी जटिलताओं में, एक-एक भंगिमा के वर्णन के जरिये- मार्मिक  डिटेल्स से रचा गया यह उपन्यास इसीलिए लगभग 400 पृष्ठों में समय हुआ है।

अनूप: फिर भी कुछ तो कथा का सार होगा..

सुमनिका: अच्छा कोशिश करती हूँ... तो यह कथा विभाजन के बाद लिखी गई, लेकिन जीवन उसमें विभाजन से पहले का समाया हुआ है। अविभाजित पंजाब  के एक  बड़े ज़मींदार शाह जी के घर, उनकी बड़ी हवेली में उनकी नातिन का जन्म होता है।  नाती की जगह एक  नातिन का जन्म। शाहजी का अपना कोई पुत्र नहीं, बस एक लाडली बेटी शीला ही है। तब शाहजी इसे विधि का विधान मान लेते हैं, सिर आंखों  पर लेते हैं। शाह जी किसी राजा से कम नहीं, उनकी ज़मीनों पर काम करने वाले किसान, उनके आसामी उनकी रियाया से कम नहीं...

तो यही बच्ची चन्ना है- लेकिन दस दिन बाद शाहजी की बेटी यानी चन्ना की मां गुज़र जाती है, और घर भर, घर ही क्यों, पूरा गांव मातम में डूब जाता है। और तब कथा पीछे  की तरफ मुड़ती है-

शाह जी और शाहनी की फूलों सी सुकुमार 'शीलो' की कथा, उसके ब्याह की कथा, और विवाह के बाद कारुण्य से भीगी हुई उसकी वैवाहिक विडम्बना की कथा।

अनूप: कैसी विडंबना?

सुमनिका: शीला के श्वसुर लाला दीवानचंद स्यालकोट के बड़े व्यापारी हैं, उनका इकलौता बेटा  धर्मपाल व्यापार के विस्तार के लिए बम्बई जाता है।  इस बीच उनके पिता गुज़र जाते हैं। और धर्मपाल  बम्बई से लौटते हैं, दूसरा विवाह करके, श्यामा नाम की आधुनिका के साथ।


पति अपनी नई पत्नी के आकर्षण और प्रेम में डूबे ऊपरी मंजिल पर रहते हैं। शीला अपने मायके की खास 'चाची' महरी के संग नीचे। कृष्णा जी ने इस विडंबनात्मक स्थिति का जैसा वर्णन किया है- उसे तो बेजोड़ ही कहना चाहिए। इतनी मौन और ठहरी हुई पीड़ा- इतनी बोझिल खामोशी- फिर भी जीवन को चुपचाप न जाने किस आंतरिक गरिमा से जीना...

और फिर एक मोड़ आता है, दूसरी पत्नी की अनुपस्थिति में, धर्मपाल के मन में- वे पश्चाताप, करुणाप्रेम और  आवेग की छलछलाहट में  शीला की ओर मुड़ते हैं और यों  भूमिका बनती है, चन्ना के जन्म की। लेकिन फिर शीला पति के नज़रिए में कुछ ऐसा  पहचान लेती है कि उसका मन बुझ जाता है... यह  तमाम  वर्णन अविस्मरणीय हैं, शीला ही नहीं श्यामा के  मन का अवगाहन भी।

अनूप:  लेकिन फिर चन्ना की कथा?

सुमनिका:  हाँ, उसका जन्म होता है, अपने ननिहाल में, गांव में, और अपनी तमाम सम्पति के वारिस को तरसते शाहजी जी गांव भर में मिठाई की चंगेरें  बंटवाते हैं... कि 'लड़कों सी लड़की आई है...'

अनूप: तो चन्ना गांव में रहती है, एक खेतिहर समाज की परम्पराओं और संस्कारों के बीच?

सुमनिका: गाँव में वह पलती है, गाँव उसके भीतर समय हुआ है, उसका अविभाज्य हिस्सा। लेकिन केवल गांव ही नहीं, अपनी मां को खोजती वह स्यालकोट पिता के साथ भी रहती है, जो गांव नहीं, एक शहर है। चन्ना के जीवन में यह आवाजाही लगी रहती हैगांव से शहर, शहर से फिर गांव... इनके बीच में बहती रहती है चनाब की धारा।

जैसे वह  धारा दोनों के बीच है... दोनों को थामे हुए और  गतिमान। लेकिन आपने सही कहा... चन्ना जिन तंतुओं से बुनी हुई है उनमें गाँव की सादगी और खुलापन ही ज़्यादा है। विदेश से आये हुए युवक  उसे हैरत से देखते हैं। एक तो पूछता भी है कि क्या आप गांधी से प्रभावित हैंक्योंकि चन्ना का गांव  से जैविक लगाव उनके तसव्वुर में ही नहीं।

तो अम्बरवाल, स्यालकोट, श्रीनगर, फिर कॉलेज की पढ़ाई के लिए लाहौर और फिर शिमला... चनाब, झेलम और रावी में जल बहता रहता है, उनके पानियों में सुबह, शाम और सितारों भरी रातें झलकती रहती हैं... और  चन्ना का अलग सा व्यक्तित्व अपनी परिस्थितियों और संस्कारों से निर्मित होता रहता है।

अनूप: अलग  सा किन अर्थों में?

सुमनिका: अलग सा इस तरह कि चन्ना साधारण लड़कियों सी लड़की नहीं है। कहना चाहिए कि जिस तरह की परवरिश आमतौर पर पुत्रियों या लड़कियों की होती है, वैसी चन्ना की नहीं हुई है। चन्ना नाना-नानी की बड़ी सी हवेली में उनकी आंखों का सितारा है- सौ सौ लाड़ों में पली। फिर मां तो है नहीं, शाहनी यानी उसकी नानी उस रोती हुई नवजात बच्ची को सईदा बीबी की गोद मे देती है, और वही ममता की मूरत बन कर उसे पालती है, शायद वैसे ही जैसे शीला के लिए चाची महरी का अस्तित्व है।

अनूप: चाची महरी?

सुमनिका:  सईदा बीबी, चाची महरी... कहने को तो शाह जी के घर की परिचारिकाएँ हैं, पर  इस  घर  में  उनका दर्जा  साधारण है नहीं। कारण, उन्होंने भी इस घर के लिए खुद को भुला ही दिया है।  अद्भुत हैं ये दोनों ही पात्र। 

आपने चाची महरी के बारे में पूछा... तो वह शीला के साथ ससुराल आती है, उसके हर पल की गवाहमाथे की एक एक शिकन पहचानने वाली... अपनी नीतिनिपुणता से, सांसारिक समझ सेवाकपटुता से उस ससुराल के घर में अपनी बच्ची की  छवि को, खुद उसकोहरसंभव बचाने की कोशिशों में जुटी... क्या ही तेज़ नज़र- पर अपनी 'शीलो', अपनी 'बच्चीके लिए अथाह प्रेम से लबालब भरी।

अनूप:  हाँ तो बात चन्ना के स्वभाव या व्यक्तित्व की हो रही थी...

सुमनिका:  हाँतो नाना-नानी के लाड़-प्यार में पली चन्ना  पर कोई बंदिश, कोई रोक-टोक नहीं । वह हवा के  झोंकों  की तरह अपनी मर्ज़ी से इधर-उधर डोला करती है। अपने घोड़े पर सवार  हो वह नाना की तरह ही ज़मीनों  पर घूमती है।  मदरसे में लड़कों के साथ पढ़ती, उनसे खेलती, लड़ती, झगड़ती, दोस्तियाँ करती। और यह सब नाना-नानी, सईदा बीबी और चाची महरी की ठंडी  छाँह तले होता है।

साथ खेलने वाले लड़के  भी  समझ नहीं पाते कि कब चन्ना अचानक किस की तरफ हो जाती है-पाला बदल लेती है। शायद किसी एक की तरफ नहीं, जब जो गलत लगे- उससे दूर चली जाती है-फिर लौट आती है।

सईदा बीबी उसे  डांटती है, समझाती भी है... पर चन्ना  का  दुख, उसकी व्यथा, उसका क्रोध, उसका विद्रोह, कुछ अलग तरह से व्यक्त होता है, जिसे सईदा ही देख पाती  है। बाल मनोविज्ञान की दृष्टि से भी ये वर्णन अनूठे हैं। उसका खिलौनों के लिए मचलना, उसकी  चंचलता, उसकी इच्छाएँ, और  विद्रोह के रूप श्यामा की नज़र में उसके 'बिगड़े' होने के सबूत हैं। लेकिन बात फिर वहीं आ जाती है कि वह शुरु से ही किन्हीं भिन्न सांचों में ढल रही है। मार खा कर रोती नहीं, शायद रोना उसे पसन्द नहीं। बेसाख्ता आँसू उमड़ भी आएँ तो कारण स्वीकार करना नहीं चाहती। स्कूल में लड़कों से उसके बराबरी के सम्बन्ध हैं, लड़कियों से तो दोस्ती ही हो नहीं पाती, लड़कों से हाथा-पाई भी आम बात है।

अनूप: पर यह तो बचपन की बात हुई... युवा होने पर?

सुमनिका: यही खुला, निर्भीक और निःसंकोच व्यवहार युवा होने पर भी दिखाई पड़ता है। अक्सर जो  पुरुष उसके प्रति आकर्षित होते हैं, पूरी तरह उसे या तो समझ नहीं पाते या उन्हे  कुछ तो अजब सा लगता है।  उन्हें लगता है कि वह उन्हें ढील दे रही है, पर फिर वह उन्हें रोक  देती है।

अनूप: तो क्या भावुकता के क्षण  नहीं आते?

सुमनिका: आते हैं, पर जैसे वह  खोज रही होती है थाह लेने  की कोशिश।  कुछ है जो  रेखांकनीय है। पिता धर्मपाल की मृत्यु के बाद श्यामा के भाई जगदीश जिस तरह घर की चीज़ों के बारे में फैसले  करने लगते हैं, फिर वह गाड़ियों का बेचना हो या मुनीम जी को नौकरी से निकालना, उस समय युवा चन्ना का अधिकार पूर्ण हस्तक्षेप अद्भुत है। नाना के घर में भी ऐसी परिस्थितियों से संघर्ष करती है।

अनूप: तो क्या यह अधिकार भावना है- पिता की एकमात्र सन्तान होने  का अहसास?

सुमनिका: अधिकार भी हो सकता है, पर केवल उतना सा नहीं है। मुझे लगता है कि चन्ना में परिस्थिति और चीजों के आकलन की बड़ी संयत दृष्टि है, जो दूसरे के मन्तव्य को परखती है। इंट्यूशन भी हैबारीक ऑब्ज़र्वेशन भी, और सबसे बढ़कर करुणा  भी... जिससे वे फैसले लेती है, या कहिए कि हस्तक्षेप करती है।

अनूप: इसका  कोई प्रमाण यानी  उदाहरण?

सुमनिका: नाना जब अपनी असहायता और एकाकीपन में  अपने टुच्चे रिश्तेदारों को बुला लाते हैं तब जमींदारी के उलझे मामलों में चन्ना जिस तरह नाना के हितों की रक्षा करना चाहती है- वह उसके जमींदारी रक्त से भी जुड़ा है, अपने वातावरण, अपनी ज़मीनों, अपने लोगों, अपने पशुओं से गहरे लगाव और तादात्म्य के कारण भी है। कहीं कोई गहरा स्रोत है, गम्भीरता है- जो उसे शक्ति देती है। यह न केवल तर्क की ताकत है, न केवल भावुकता।

अनूप:  तब तो चन्ना के इस चरित्र के बरक्स उसकी मां  शीला का व्यक्तित्व बहुत अलग लगता है- क्या नहीं?

सुमनिका: हाँ, लगता ही है। उपन्यास के पात्र भी इस अंतर को गाहे बगाहे सोचा करते हैं। मां  के अभाव का भाव पूरे उपन्यास में छाया हुआ है- या  कहें कि इस अभाव की छाया चन्ना पर तो पड़ती ही है, नाना-नानी पर है, पति धर्मपाल पर है, पत्नी श्यामा पर भी है और चाची महरी तो अपनी 'बच्ची' को कभी भुला ही नहीं सकती।

लेकिन शीला के व्यक्तित्व की रेखाएँ भी सीधी-सादी नहीं- खासी जटिल हैं। शाहजी और शाहनी की इकलौती कोमलांगी बेटी शीला... शायद उसका नाम भी अर्थवान है... शील और सौंदर्य की प्रतिमा... पंजाब के उच्च वर्ग की संस्कारशील पुत्रियों का मानो आदर्श रूप- मितभाषिणी-  मृदुभाषिणी लेकिन सबसे महत्व की बात यह है कि वह आत्मतत्व से रहित नहीं। शायद ही कभी किसी ने उसकी ऊंची आवाज सुनी हो- यहां तक कि जब पति दूसरा विवाह करके उससे दामन छुड़ा लेते हैं, तब भी इस अपमान का सामना  एक उदासीनता से करती है। लोग हैरान हैं कि इतनी बड़ी घटना पर कुछ कहा  सुना नहीं- अपने  जायज़ अधिकार के लिए झगड़ा नहीं किया- वापिस लौट जाना चाहा, पर शाहनी ने कुछ सोच कर रोक दिया। इस उदासीन  और एकाकी भाव  की तह में उसका आहत  स्वाभिमान है, या शायद अपने ही संग जी सकने की कोई भीतरी ताकत..

अजब लगता है उसका मनस तत्व- कि वह एक बार भी नई बहू की निंदा में शामिल नहीं होती, उसके प्रति द्वेष नहीं रखती... जो भी शिकायत है शायद पति से है। शायद सोचती है कि वह पति के हृदय में उस तरह जगह नहीं बना पाई, लेकिन दूसरी ओर आत्मदया से ग्रस्त भी नहीं लगती। कुछ है धीर- गम्भीर, बड़प्पन या कोई उदात्त भाव।

अनूप: तो  चन्ना में यह नहीं?

सुमनिका: ऐसा तो नहीं। मां के स्वच्छ, रौशन मानस की छाया चन्ना में भी अवतरित हुई है। बहुत बार जब चंचल बच्ची चन्ना की आंखों में एक  खामोशी उभर आती है, नज़र में कुछ ऐसा भाव जिसे पिता  पहचानते हैं, देखते हैं, कि उन आंखों में से शीला    झांक रही है। चन्ना  अपनी मां को उनके लिखे पत्रों में देख  पाती है, पढ़  पाती है। वह कमल से कहती है, "कभी कभी सोचती हूँ, बड़ी मां अच्छी, बहुत प्यारी होंगी। इसलिए नहीं कहती हूँ कि वह मेरी अपनी मां थीं। उनके पत्रों को पढ़ कर लगता है कि उनका अध्ययन कितना गहरा था और पकड़ कितनी तेज़ थी। केवल जो नहीं था उनके पास, वह अपने अधिकार की मांग नहीं थी। चुपचाप मूक भाव से अपने को पन्नो में लिख जाने का ज्ञान मां में था  तो पिता को एक उलाहना देने की समझ न होगी, यह कैसे कहा जाए। पर अधिकार की डोर कट जाने पर  उसने प्यार और दुलार की दुहाई न दी।

अनूप: क्या शेष स्त्री चरित्रों की रेखाएँ  और रंग भी इतने भास्वर रह पाए हैं, जितने चन्ना और उसकी मां के?

सुमनिका: बहुत से स्त्री चरित्र हैं- चन्ना की सौतेली मां श्यामा, शाहनी, चाची महरी, सईदा बीबी, मिस पाल, लाला जी की दूसरी पत्नी यानी मौसी... सभी को लेखिका ने जैसे अपनी दृष्टि के गहरे फोकस में उतार लिया है- सबके साथ लेखकीय न्याय किया है- सबके दिलों में, दुखों और अहसासों के पानी में कृष्णा जी उतर गई हैं- एक एक चरित्र अपने जीवन के इतिहास, परिस्थितियों और आंतरिकता के प्रकाश वृत्त में खड़ा दिखता है। सभी  अविस्मरणीय हैं- खासकर चाची महरी और सईदा बीबी के ज़मीनी चरित्र तो अपनी ममता में बेजोड़ हैं।

अनूप: और पुरुष चरित्र?

सुमनिका:  हाँ कई पीढ़ियों के पात्र हैंकई वर्गों के, शहरी- ग्रामीण। रोबीले नाना  शाहजी, चन्ना के पिता धर्मपाल, चन्ना के दादा लाला दीवानचंद (जिन्हें चन्ना ने देखा नहीं) फिर नाना की ज़मीनों के किसान, उनके मित्र, धर्मपाल के मित्र, और फिर उन मित्रों के युवा पुत्र-सुरेश, बलवंत, कमल और भी कई युवा छात्र...

कृष्णा जी की  मर्मभेदी कलम स्त्री पुरुष में भेद नहीं करती- लेकिन जो प्रतिबिम्बित होता है, फलित होता है- उसमें पुरुष की फिसलन फलित होती है, मन की अस्थिरता भी। धर्मपाल बम्बई जाकर शीला को भूल जाते हैं, स्वयं उनके पिता दीवानचंद की एक दूसरी पत्नी भी अवतरित होती हैं। सईदा बीबी का पति आले खाँ उसे छोड़ कर चला गया है। और चन्ना बच्चों के मुख से गाये टप्पों में इस दुख को सुनती है... "ओ बागों की ओट में खड़ी मेरी मां, तू मुझे देख कर न रो। लड़कियों के दुख ही ऐसे हैं।"

अनूप: तो देश-काल का प्रतिनिधित्व कितना हो पाया है?

सुमनिका: पहले देश की बात करूँहालांकि काल उससे लिपटा ही होता है। 'चन्ना' की कथा में  अविभाजित पंजाब के गांवों की शक्ल उभर आती है- गांव की ज़मीनें, कुएँ, मीठी हवा में झूमती फसलें,   उनपर काम करते जाट किसान और उन  ज़मीनों के मालिक शाह और ज़मींदार।

मिट्टी से पुते घर, घरों में सरसों के तेल के दियों की मद्धिम रोशनी, मदरसा, मसीत, ठाकुरद्वारे और गुरुद्वारे। पूरे उपन्यास में पंजाब के गांवों के नक्श दर्ज हैं, अपनी खास बोली-बानी के साथ, वेशभूषा के साथ। साथ साथ तमाम शहर भी उभरते हैं। शाह जी के गांव का नाम शायद अम्बरवाल है, लेकिन दूर दूर तक उनकी ज़मीनें पसरी हैं, ज़मीनों में कुएं हैं। और इन ज़मीनों पर हिन्दू मुसलमान असामियाँ एक पारस्परिक जीवन जीती हैं।

शीला के ससुर स्यालकोट के बड़े व्यापारी हैं, स्याल कोट जैसा शहर, दीवानचंद का वैभवशाली घर, गाड़ियाँ, नौकर चाकर, चन्ना का स्कूल। फिर  उपन्यास के नक्शे पर उभरता है लाहौर, जहां होस्टल में रहकर चन्ना कॉलेज की पढ़ाई करती है। छुट्टियों में श्रीनगर और गुलमर्ग का वास। इसी तरह शिमला भी  अपने पूरे नयन- नक्श  सहित नमूदार होता है- रात के वक्त  बर्फीले सफेद पहाड़ी रास्तों पर  घोड़ा दौड़ाती चन्ना का अक्स नहीं भूलता।

अनूप: क्या विभाजन पूर्व पंजाब की राजनीतिक हलचल की आहट भी सुन पड़ती है?

सुमनिका:  हाँ, मैं बात करने ही वाली थी, पर आपके स्थान के प्रश्न में एक बात जोड़ना भूल गई हूं- वह है इस वर्णित भूमि में नदियों का अस्तित्व। यह कुछ खास है- शीला और चन्ना के गांव और स्यालकोट के बीच चनाब बहती है, और उसमें अल्लाहरक्खे की बेड़ी (नाव) है। इस नदी से  शीला का जैसे कोई रूहानी रिश्ता है- नन्ही चन्ना का भी ।

इस पानी मे तैरती बेड़ी- रात में तैरते चाँद का  बिम्ब- जैसे चन्ना का ही प्रतिरूप हो। नदी में कभी  जाता है, लहरें और चक्कर (भंवर) पड़ने लगते हैं, लेकिन चन्ना है कि नदी से ही जाएगी।

फिर लाहौर जाती है तो वहाँ  रावी है। चन्ना लाहौर के  सुंदर बाजारों में नहीं दिखती- दिखती है तो तांगे की सवारी करती  हुई रावी के  तट पर।  फिर काश्मीर में जेहलम है- वहां  जेहलम के जल से भीगी भूमि से सईदा बीबी की आत्मा जुड़ी है। रात के वक्त पानी को देख, मोटर गाड़ी से उतर कर चन्ना पानी में उतर जाती है, कपड़ों समेत...

अनूप: तो फिर पूछना चाहूंगा की विभाजनपूर्व राजनीतिक सुगबुगाहट के  कुछ संकेत हैं क्या?

सुमनिका:  हैं... गांव में शाह जी सरकार के एक काले बिल या कानून की चर्चा करते हैं- जहां ज़मींदारों  के हक छीन लिए गए हैं और ज़मीनों  के  लगान के पीढ़ियों के लम्बे-चौड़े  हिसाब पर हमेशा के लिए लीक फिर गई है। शाह जी भीतर से टूट जाते हैं- उन्होंने अपनी असामियों की ब्याह-शादी-गमी में सरपरस्ती की है। वे कहते हैं इतना उल्टा कानून रब्ब का भी नहीं- इसमें अंग्रेज़ की चाल है, जो अंदर ही अंदर जमीदारों को कमज़ोर और जाटों को बढ़ावा देना चाहता है।

जाटों की जगह वह  कुछ और (शायद मुसलमान) कहते कहते रुक जाते हैं। दूसरी ओर अंग्रेजों ने 'छापों' (अखबारों) में धर्म में भेद करना शुरू कर दिया है।  चरखा जो सदियों से गांवों में घर-घर चलता रहा है, आज गांधी से जोड़ कर हिंदुओं का करार दिया जा रहा है।  लाहौर से छपने वाला छापा कुछ नई नई  बातें छापता है... वह मोटे मोटे तारों का सूत, वही जुलाहे का बुना खद्दर। फिर खद्दर किसका है? चन्ना सोचती है कि उसके चौधरी चाचा, आँशा  बीबी, राबयां, और सब से बढ़ कर  जिसे उसने मां की तरह जाना- सईदा बीबी। इन सब के बारे में अखबारों की क्या राय है?

चन्ना समझ नहीं पाती कि यह भाषण देना क्यों जरूरी है कि तुम सब एक हो- क्योंकि खंड खंड तो कुछ है ही नहीं- तो इन बिखरी बातों का मतलब? उसे हिन्दू- मुस्लिम एकता के भाषण कृत्रिम लगते हैं, उसने तो सदा इन्हें एक साथ ही देखा है- शहर में यह हवा चलने लगी है।

अनूप: अच्छा, एक और बात... क्या चन्ना के व्यक्तित्व में कृष्णा सोबती के परवर्ती स्त्री चरित्रों के बीज हैं- जैसे मित्रो मरजानी, डार से बिछुड़ी वगैरह के?

सुमनिका: ठीक कहा। चन्ना कृष्णा सोबती की प्रथम बेहद आज़ाद ख्याल, बेहद ओरिजनल स्त्री है- जो न केवल पुरुष की तरह तार्किक है न स्त्री की तरह कोरी भावुक। वह नारी है, पर नारी से कुछ अधिक- बड़ी बारीकी से  व्यक्तित्व के इन  तारों को  लेखिका ने खोला है । व्यक्तिगत लगाव या द्वेष  उसके लिए सत्य के आकलन के बीच नहीं आने पाते। नाना को वह नाना  की तरह प्यार करती है तो जमींदार के रूप में भी देख  पाती है- श्यामा को अपनी न जान कर भी वह कभी हल्केपन से उसके बारे में नहीं सोचती- उसे लगता है कि उसने पिता की दुर्बलता को अपने हाथ से थाम रखा था- और उसकी अपनी माँ  पिता को लेकर अधिकार के मोह में सावधान न रह पाई होगी। यही उसकी विशिष्ट नज़र है। जिस तरह वह बड़े गुरुतर सत्यों को देखती है, पहचानने की कोशिश करती है, उसमें  सबसे अधिक प्रतिबिंब तो खुद कृष्णा सोबती  का ही झलकता है।  उन्होंने कहा भी है कि अगर यह उपन्यास छप जाता तो ज़िंदगीनामा न लिखा जाता।

अनूप:  अब एक अन्तिम बात...

चन्ना भाषा के इलाकाई प्रयोग  के मुद्दे की वजह  से छापने से  रोक दिया गया था। सत्तर साल बाद मूल रूप में ही छपा।  क्या यह पंजाबी आंचलिकता का उपन्यास है? क्या  इसे और फणीश्वरनाथ रेणु के 'मैला आँचल' को आमने सामने रखा जाना चाहिए?

सुमनिका:  यह बात वाकई विचारणीय है कि किसी बड़े लेखक की कोई कृति, वह भी पहली कृतिसत्तर साल तक बक्स में बंद रहे, केवल इस वजह से कि लेखक और प्रकाशक में इसकी भाषा को लेकर मतभेद  था। और जब छपे तो जीवन का अंतिम चरण हो।

जिस खास समाज की महाकाव्यात्मक झलक इस उपन्यास में हैवह केवल भाषा ही नहीं, उस समाज के रक्त में बसी तमाम रवायतों, शब्दों की ध्वनियों, वाक्यों  की गढ़न, वेशभूषा, बोली-बानी, वातावरण के बिना कैसे आकार पा सकता था? यही तो इसकी ताकत है... कि उपन्यास हवा में नहीं लिखा गया -अपनी ज़मीन, अपनी संस्कृतिवहां का लोक मन और  नागर संस्कृतिसभी कुछ उसमें है-

सलवार कमीज, दुपट्टों से सर ढके स्त्रियाँ, किसान  जाटों के तहमद, पुरुषों के साफे और शमले (तुर्रे), हाथ के बने मोटे गाढ़े कपड़ों के साथ साथ रेशमी वस्त्र भी हैं बारीक सलमे जड़े, शीला के पाँवों की  तिल्लेदार जूतियाँ हैं। आपस  में मिलने पर स्त्रियों का रामसत कहना और पुरुषों का पैरीपौना। और बड़ों  की छोटों को  सुंदर आशीषें।

उत्सवों में 'सिरवारनासगुण डालना, नज़र उतारना, और यहां तक कि मृत्यु और मृत्यु के बाद के हृदयविदारक दृश्य और वर्णनों में नाइन द्वारा संचालित 'बैणों' का भी वर्णन है।

पीढ़ी पर बैठ नानी और चाची महरी का रंगीला चरखा चलाते, सूत कातते हाथ चन्ना बचपन से देखती  है। दूध दहीं की मिट्टी की  'चाटियाँ' (मिट्टी की हंडिया) देखती आई है- उन्हें धो-धो कर दही बिलोती, मक्खन निकालती स्त्रियां हैं, मक्की की  रोटियां हैं जो चाची महरी फैजू के हाथ कनालियों (लकड़ी की परातनुमा ट्रे) में बांध कर चन्ना के लिए  लाहौर होस्टेल तक पहुंच देती  है। न जाने कितने शब्द हैं-  पैड़ियाँ, औंसिया डालना, चंगेरधीयानी, शाहनी, लाढा... तांगे वालों की व्यंग्य भरी बोलियां और गुहारें हैं, हुक्कों की गुड़ गुड़ है।  जिन पाठकों में पंजाब का भाषा संस्कार है- वे समझ जाएंगे कि कुछ खास वाक्य कहाँ से उपजे हैं।

अनूप: तो  इसकी भाषा को आंचलिक कहा जाए?

सुमनिका: इसकी भाषा में अंचल  तो झांकता ही हैलेकिन सम्पूर्ण भाषा ही आंचलिक है, या उतनी आंचलिक है जितनी मैला आँचल  की भाषा... ऐसा  शायद नही कहा जा सकता। कृष्णा सोबती ने इसकी भाषा को लेकर सन 1950 में जो स्टैंड लिया था- वह सही था। उन्होंने अपनी भूमिका में  फणीश्वर नाथ रेणु के प्रति  कृतज्ञता भी जताई है कि उन्होंने देश के खेतिहर संवाद को मैला आँचल में प्रस्तुत किया।

अनूप: मेरी एक और जिज्ञासा है जो कृष्णा सोबती जी के इस कथन से पैदा हुई है कि चन्ना न छपने की वजह से जिंदगीनामा लिखा गया। इन दोनों उपन्यासों को भी आमने-सामने रख कर पढ़ना दिलचस्प होगा।

सुमनिका: हां, यह जरूरी भी है। यह काम अलग से करना ही ठीक रहेगा।  

शुक्रवार, अगस्त 23, 2013

अप्रतिम दीठ




विनोद कुमार शुक्ल के नौकर की कमीज, खिलेगा तो देखेंगे और दीवार में खिड़की रहती थी उपन्यासों पर
सुमनिका सेठी और अनूप सेठी के बीच संवाद। कुछ साल पहले यह संवाद किस्तों में दिया गया था ताकि धीरे-धीरे पढ़ने का आनंद लिया जाए। यहां पूरा संवाद एक साथ दिया जा रहा है ताकि एक साथ पढ़ा जा सके। 

अनूप : मुझे लगता है हम विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों पर तीन हिस्सों में बात करें - ये उपन्यास क्या कहते हैं?, कैसे कहते हैंऔर विनोद कुमार शुक्ल का देखना। क्या कहते हैं में कथा-कथ्य और कैसे कहते हैं में शिल्प की बात करेंगेपर किसी भी संपूर्ण रचना की तरह यहां शिल्प कथ्य से अलग नहीं है। और तीसरा हिस्सा है उपन्यासकार का देखना यानी वे अपने जीवन-जगतपात्रों-स्थितियों और प्रकृति को कैसे देखते हैं। यह हिस्सा पहले दो हिस्सों का विस्तार तो है हीउससे अलग भी इस देखने की इयत्ता है जो कथा कथ्य को और विस्तार देती है और उनकी कहनी को नवीनता और गहराई

सुमनिका : क्या इनके तीनों उपन्यासों में कथ्य की दृष्टि से एक निरंतरता या समानता बनती हैतीनों उपन्यासों की दुनिया में झांक के देखा जाए -

 

उपन्यास क्या कहते हैं?

अनूप : उपन्यास क्या कहते हैंतीनों उपन्यासों में निम्न मध्यवर्गीय परिवारों की कहानियां हैं। ये कहानियां ज्यादातर घर के इर्द गिर्द सिमटी हुई हैं। नौकर की कमीज तो शुरू ही इन पंक्तियों से होता है - 'कितना सुख था कि हर बार घर लौट कर आने के लिए मैं बार बार घर से बाहर निकलूंगा '

सुमनिका : यह ठीक है कि घर उनके तीनों उपन्यासों का एक बहुत बड़ा और खूबसूरत हिस्सा हैलेकिन और भी तो हिस्से हैं इस दुनिया के। क्यों न बात इस तरह की जाए कि नौकर की कमीज की पृष्ठभूमि में एक छोटा शहर उभरता है जहां सरकारी दफ्तरडॉक्टर की बगीचे वाली बड़ी कोठीबाजार इत्यादि हैं जबकि दीवार में खिड़की रहती थी में एक छोटा कस्बा उभरता है जहां साइकिल स्कूटर और टेम्पो चलते हैं। और खिलेगा तो देखेंगे में तो एक बहुत छोटा सा गांव उभरता हैझोंपड़ियों वाले घरों वाला और जहां पक्के मकान केवल दो हैंएक थाना और दूसरा ग्राम सेवक का घर।

अनूपः हां, तुमने कथ्‍य को लॉन्‍ग शॉट से देखा, मैं क्‍लोज अप से देख रहा था। तो नौकर की कमीज में नायक संतू बाबू अपनी नई नई गृहस्‍थी में पत्‍नी को छोड़कर पहली बार घर से बाहर जाते हैं, अपने पुराने शहर मां को लाने के लिए ताकि जचगी में पत्‍नी को सहारा हो जाए। पर भाई की बांह टूट जाने के कारण मां उनके साथ नहीं आ पाती है और वह उसी रात लौट आते हैं। बसें सब निकल चुकी हैं। बदमाश से दिखने वाले एक ड्राइवर ने उन्हें लिफ्ट दी। वह ड्राइवर खुद कई कई दिन घर नहीं पहुंच पाता था। पहले लड़के के पैदा होने के वक्त वह घर से आठ सौ किलोमीटर दूर था। लड़की के वक्त तीन सौ और तीसरी बच्ची के वक्त तो बस दस ही किलामीटर दूर था। पर हर बार घर की तरफ ही लौट रहा था।

सुमनिका : हां, घर के दृश्‍य तो बाकी दोनों उपन्‍यासों में भी बेहद मार्मिक और सुंदर, एक साथ हैं। खिलेगा तो देखेंगे में तो बाहर की दुनिया को भी घर के बाहरी कमरे की तरह देखा गया है। और अपने कमरे का दरवाजा बंद करना मानो बाहर की दुनिया को बाहर कैद कर देना है।

अनूप : घर के प्रति उपन्यासकार का जबरदस्त आकर्षण है। नौकर की कमीज में संतू बाबू एक दफ्तर में नौकर हैं। नवविवाहित हैं। एक डाक्टर के बंगले के आहाते में किराए पर रहते हैं। निम्नमध्यवित्त के कारण घर में सामान बहुत कम है। गिनती की चीजें हैं‎‎। हरेक चीज का अस्तित्व है। बहुत कम वस्तुओं से इनका घर बन जाता है। दीवार में खिड़की रहती थी में भी नवदम्पति एक कमरे के डेरे में रहता है‎‎। नायक रघुवर प्रसाद ने यह कमरा किराए पर लिया है। गौने के बाद बहू इसी घर में आती है। यही सोने का कमरा हैयही रसोई और यही बैठक।

सुमनिका : खिलेगा तो देखेंगे में तो गुरू जी को एक त्यक्त थाने में आकर शरण लेनी पड़ती है जो न पूरी तरह घर है न थानालेकिन इस गृहस्थी का भी अपना संगीतअपना नाट्य और अपनी कविता है। घड़ाखाटसींखचों वाला दरवाजाएक फूटी बाल्टीगिलास जिसमें गृहस्थी की चाय ढलती है

अनूप : हांविनोद कुमार शुक्ल के पात्र बहुत कम सामान के साथ सुखी लोग हैं। सब्जी लानाखाना बनानाखाट की आड़ बनाना जैसे नित्यक्रम धीमी गति से चलते हैं। नौकर की कमीज में पानी चूने का क्लेश है

सुमनिका : हां यह अपने आप में चूते हुए जीवन का बिंब है

अनूप : धीरे धीरे वह बड़े कष्ट में बदल जाता है। लेखक सामाजिक समस्या की तरह उससे निबटता है। यह कष्ट समाज में अर्थ-आधारित संस्तरों का है। संतू को खुद को और पत्नी को घरेलू नौकर में बदल दिए जाने का गहन मानसिक असंतोष और त्रास है। सारा उपन्यास उसी दिशा में आगे बढ़ता है। जबकि दीवार में खिड़की रहती थी में लगभग घर के गिर्द ही कथा और कथ्य का वृत्त बनता है

सुमनिका : क्या ऐसा कहा जा सकता है कि केवल घर के गिर्द घूमता है वृत्तमुझे लगता है कि यह उस जीवन के गिर्द घूमता है जिसमें घर और बाहर की दुनियाएं कहीं न कहीं जुड़ी हैं

अनूप: बिल्कुल। घर को लेकर नौकर की कमीज के संतू बाबू के मन में अजीब तरह के संशय हैं। घर में दाखिल होने के दो दरवाजे हैं। वह दूसरे दरवाजे के लिए एक ताला भी ले आता है। एक तरफ वह ताला लगाता हैदूसरी तरफ पत्नी लगाएगीक्योंकि अब वह भी डाक्टरनी के घर जाती है। ज्यादा देर तक अपने घर से बाहर रहती है। यह दूसरा ताला उन दोनों के मन में बड़ी उलझन पैदा करता है। संतू कहता है अपना अपना ताला लगाएं। मतलब दोनों की अपनी अपनी स्वतंत्रता बनी रहे। पत्नी को ज्यादा उलझन है। पति आगे से ताला लगा कर चला जाए पत्नी पीछे सेवो तो ठीक हैलेकिन पत्नी घर में पीछे से आ भी जाए तो भी लोग आगे का ताला देखकर यही समझेंगे कि घर में कोई नहीं है। यह उन घरों की उलझन है जहां की स्त्रियां कामकाजी स्त्रियां बनने लगी हैं। सीधे सादे आदमी का तर्क होगा कि दो ताले क्योंएक ताले की दो चाबियों से भी काम चल जाएगा। पर संतू की तर्क पद्धति अपनी तरह की है। वह किसी से मेल नहीं खाती। वे दूसरा ताला ही हटा देना चाहते हैं। असल में वे घर को खुला ही रखना चाहते हैं

सुमनिका : घर के दो हिस्से खिलेगा तो देखेंगे में भी हैंछोटा लॉक अप और बड़ा लॉक अप। इसके पात्र भी दीवालों से आगे और तालों से परे जाना चाहते हैंप्रकृति की दुनिया में। लेकिन यहां एक अलीगढ़ी ताला है जो ग्राम सेवक के दरवाजे पर सदा लटका दीखता है

अनूप: ताले की उलझन दीवार में खिड़की रहती थी में भी है। वहां रघुवर प्रसाद टट्टी के लिए एक अलग ताला लेता है‎‎। उसका किराया भी अलग देता है। असल में वह प्राइवेसी हासिल करने का किराया देता है‎‎। यह बात उसके पिता की समझ में नहीं आती। जिस समाज में शौचालयों की कभी जरूरत ही महसूस न की गई होखुला खलिहान निर्भय निर्मल आनंद देता होजंगल पानी जाने का मतलब ही शौच निवृत्ति हो वहां 'एक्सक्लूसिवटट्टी का होना किस पिता को समझ में आएगा। यह तो शहराती जीवन का नागर बोध है। जिस वर्ग में खरीदारी रोजमर्रा का काम न हो और कोई वस्तु जरूरत के लंबा खिंचे चले आने के बाद खरीदी जाती होवहां ताले की फिजूलखर्ची नहीं होने दी जाएगी। दूसरे ताले को पिता अपने साथ ले जाते हैं

सुमनिका: सभी उपन्यासों में बाहर की दुनिया में ताकत की सत्ता वाला समाज है जिसमें कमजोर का जीना बहुत दारुण है। खिलेगा तो देखेंगे में इसके बहुत से बिंब हैं। थाने से लेकर जीवराखन की दुकानसिपाही और राउत हैं। पति पत्नी के बीच भी सत्ता के संबंध डेरहिन और जीवराखन की कथा में उभरते हैं। इसमें शुरू का दृश्य तो भीतर तक हिला देता है जब कोटवार का बेटा घासीराम जीवराखन को गालियां देता है और पुलीस उसे पकड़ लेती है। वो अपने तीन महीने के बच्चे को अपनी सुरक्षा के लिए गोद में उठा लेता हैछोड़ता नहीं। मार पीट में न जाने कैसे बच्चे की नाक से खून गिरता है और उसकी मृत्यु हो जाती है। इन दृश्यों को पढ़ना भी मुश्किल हो जाता है। जो सबसे कमजोर है वही सबसे पहले शिकार हो जाता है। जैसे खिलेगा तो देखेंगे में बच्चा और नौकर की कमीज में मंगतू

अनूप: घर से बाहर की दुनिया में नौकर की कमीज में दफ्तर है जहां बड़े बाबू और साहब हैं और इनके बीच कई स्तरों के कर्मचारी हैं। किसी छोटे शहर के दफ्तर का बड़ा धूसर चित्र उकेरा गया है। संतू बाबू (नायक) सबसे ज्यादा तकलीफ में हैं क्योंकि वे नौकर में तब्दील नहीं होना चाहते। भरपूर जोर लगाने के बावजूद उन्हें नौकर की कमीज पहना ही दी जाती है। यह नौकर की कमीज एक रूपक की तरह है। संतू आदर्श नौकर मान लिया जाता है। दूसरी तरफ उसकी पत्नी डाक्टरनी की सहायिका बन जाती है। उसे धीरे धीरे इस भूमिका में सधाया जाता है। संतू यह देखकर परेशान हो उठता है कि वह साहब के बगीचे का घास छीलने वाला नौकर बन गया है। और उसकी पत्नी डाक्टर के यहां खाना बनाने वाली। इस जाल को तोड़ने की हिम्मत उसमें नहीं है। वह बुखार की बेहोशी में डाक्टर को गालियां बकता है। दफ्तर में कटहल के पेड़ पर चढ़कर कटहल तोड़कर कायदे कानून को धता बताता है। नौकर की कमीज में कोई परिवर्तनकारी कदम नहीं उठाया जाता। लेकिन जो रूपक नौकर की कमीज से बनाया गया है उसे जरूर अंत तक पहुंचाया जाता है। दफ्तर के बाबू लोगों ने कमीज को चिंदी चिंदी करके रखा है। अंत में वे सब मिलकर उसे जला देते हैं। इस तरह वे नौकरशाही में होने वाले शोषण का प्रतीकात्मक अंत करते हैं

सुमनिका : खिलेगा तो देखेंगे में तो दबाव के अनेक रूप हैं। वे अप्रत्यक्ष ही सहीपर पूरे जीवन पर प्रेतात्मा की तरह छाए हैं। न जाने कितने हैं जो भूख से लड़ रहे हैं। यह ऐसी दुनिया है जहां चार जलेबी का स्वाद तीन चार दिन तक रहता है या कई बार तीन चार महीनों तक। इस उपन्यास में पिता अपने बेटे को भूखे रहते हुए जीना सिखाता है। डेरहिन जीवराखन के चंगुल से भाग जाती है और ताकतवर की हिंसा और प्रहारों को कमजोर लोग एक जादुई ढंग से रोक देते हैं यानी एक जादुई पत्ती पान में खिलाकर उनको गूंगा बना देते हैं। क्योंकि उनकी जबान ही गोली और बंदूक थी। और फिर एक स्वप्न सृष्टि का बिंब है

अनूप: दीवार में खिड़की रहती थी इसकी तुलना में अधिक रोमांटिक कहानी है। जीवन या परिस्थितियों से वैसी सीधी टकराहट यहां नहीं दिखती। नायक रघुवर प्रसाद गणित का प्राध्यापक है। उसका बॉस विभागाध्यक्ष है और दोनों का बॉस प्राचार्य है। एक ढर्रे पर जीवन चलता रहता है। प्रत्यक्षत: किसी को कोई कष्ट नहीं है

सुमनिका : लेकिन यहां भी विभागाध्यक्ष का दबाव कम नहीं है। और काम पर वक्त से पहुंचने का संघर्ष ही तो खासा बड़ा है और कष्टसाध्य है

अनूप : हांलेकिन फिर भी लगता है न जीवन में कोई कमी है न जीवन से कोई शिकायत। उपन्यासकार की यह खूबी है कि वह अपनी तरफ से पात्रों में कुछ नहीं डालता। ठेठ गंवई जीवन है। पात्रों में जीवन जीने की तन्मयता है। सादगी है। इस सब में सादगी और सरलता उभरती है। प्रोफैसर को सवारी के रूप में हाथी मिल जाता है जो उसे महाविद्यालय लाता-ले जाता है। नवविवाहित प्रोफैसर की अपनी रोमांटिक दुनिया है। इस अर्थ में हाथी की सवारी मिलने से वह यथार्थ से थोड़ा ऊपर उठ गया है। उसे अब टेम्पो और साइकिल की जरूरत नहीं रही। खिड़की से बाहर जाने में तो वह मन का राजा है हीकालेज भी राजा की तरह हाथी पर सवार होकर जाता है

सुमनिका : हाथी का मिल जाना आपको सिंड्रेला को परी द्वारा दिए गए जीवन सा नहीं लगताशीशे के जूतों जैसा और कुम्हड़े के रथ जैसायह हाथी जो एक बारगी उसे सारी दयनीयता और अपमान से ऊपर उठा देता हैपेड़ों की फुनगियों का दृश्य दिखा देता है। सब पीछे रह जाते हैं। रघुवर राजा हो जाता है।

अनूप : इस तरह हाथी को सवारी के रूप में लाकर उपन्यासकार सभ्यता के उपभोक्तावादी विकास को धता बताते हैं। यह विमर्श का एक अनूठा रूप है‎।

सुमनिका : यह बहुत महत्वपूर्ण टिप्पणी है। आप कहना चाहते हैं कि इन सभी उपन्यासों में मुक्ति का एक समानांतर दर्शन दिया गया है। जहां सबके पास जरूरत भर का जीवन हो और जो प्रकृति में रचा बसा हो‎‎। यहां गरीबी का वर्णन तो हैलेकिन उसका महिमा मंडन नहीं। और महत्वपूर्ण यह है कि उसका जबाव अमीरी में नहीं खोजा गया है। मुझे तो लगता है कि विनोद कुमार शुक्ल का कथ्यउनके नायकउनका जीवनउनकी भाषाउनका सारा शिल्प प्रचलित शैलियों का बरक्स रचता है

अनूप : दीवार में खिड़की रहती थी के रघुवर प्रसाद साइकिल के पैडल मारने वाले परिवार से हैं। नौकर की कमीज के संतू बाबू भी साइकिल से आगे नहीं सोचते। उन्हें दफ्तर के बड़े बाबू माल गोदाम से एक नई साइकिल निकलवा देते हैं। रघुवर प्रसाद को उसके पिता अपनी साइकिल भेज देते हैं। विभागाध्यक्ष स्कूटर वाले हैं। रघुवर को स्कूटर या कार खरीदने या उनकी सवारी करने की इच्छा नहीं है। हाथी पर भी वे डरते डरते ही चढ़ते हैं। हालांकि बाद में उस भारी भरकम पशु के मोह में भी पड़ जाते हैं। पर अंतत: उसकी जंजीर खोल कर उसे मुक्त कर देते हैं। हाथी को मुक्त करने की उन्हें बड़ी खुशी है‎।

सुमनिका : खिलेगा तो देखेंगे के अंतिम हिस्से में पहाड़ी से जो आदमी कांवर लिए उतरता है उसमें कंदधान के बीज और शहद भरा है। ये कंद भी जमीन से निकले हैं। विनोद कुमार शुक्ल लिखते हैं, 'धान के मोटे बीज थे जिससे पेट भरता था। .. ये धान तेज आंधी में भी खेत में गिर नहीं जाता थालहलहाता था। लहलहाने से बांस की धुन सुनाई देती थी।'

अनूप : अगर नौकर की कमीज में कमीज के जरिए विरोध का रूपक रचा गया है तो दीवार में खिड़की रहती थी में उपभोक्तवादी सभ्यता का एक बेहद रोमानी और मासूम प्रतिपक्ष रचा गया है। रघुवर प्रसाद की खिड़की एक स्वप्न लोक में खुलती है। सुबह-सवेरेशाम-रातसोते-जागते वे कभी भी उस खिड़की से बाहर प्रकृति की गोद में जा रमते हैं। यहां तक कि नहाना-धोनाकपड़े धोना जैसी नेमि क्रियाएं भी वहीं पूरी हो जाती हैं। रघुवर के माता पिता और विभागाध्यक्ष भी उस खिड़की से नीचे उतर चुके हैं। विभागाध्यक्ष के भीतर उस जगह के यथार्थ को जानने की छटपटाहट है। खिड़की से खुलने वाला यह संसार बड़ा सुरम्य है। वहां एक बूढ़ी अम्मा है जिसने सोनसी को सोने के कड़े दिए हैं। मजेदार बात यह है कि यह दुनिया भौतिकवादी दुनिया से बिल्कुल अलग है। यहां स्वच्छ जल वाले तालाब हैं। हरे-भरे पेड़ हैं। बंदर हैंमछलियां हैं। हवा हैबादल हैं। लाभ-लोभ से परे का स्वच्छ निर्मल संसार है। ऐसा लगता है कि उपन्यासकार नौकर की कमीज और खिलेगा तो देखेंगे के खुरदुरे लेकिन बेहद देशज यथार्थ के बरक्स उतना ही देशजलोककथाओं वाला रोमानी स्वप्न-संसार खड़ा करना चाहता है। यहां समृध्दिसुख और तृप्ति के अर्थ ही भिन्न हैं। शायद इसीलिए यह वर्णन हमें अलग तरह का लगता है और अचम्भे में डालता है‎।

सुमनिका : शायद वे आदमी के भीतर उस दृष्टि को जगाना चाहते होंउस खिड़की को खोलना चाहते होंजहां से कल्पना लोक दिखता है और जो चीजों में सौंदर्य देख पाती है। कल्पना के रेशे बुनने वाली बुढ़िया से हमें मिलाना चाहते हों जो इस भौतिकवादी दुनिया में कहीं खो गई है

अनूप : नौकर की कमीज और दीवार में खिड़की रहती थी में पारिवारिक रिश्तों की एक टीस भरी कड़ी पिता-पुत्र के संबंध के रूप में आती है। बड़े बाबू का बेटा घर से भाग गया है। उन्हें लगता है वह उनके पीछे से घर में आता है। सामने नहीं पड़ता। एक स्वप्न जैसे प्रसंग में संतू मूंगफलीवाले को एक बच्चे के डूबने का किस्सा सुनाता है। बड़े बाबू को पता चलता है तो वे सच्चाई जानने मूंगफली वाले के पास पहुंच जाते हैंयह जानते हुए भी कि यह सच्ची घटना नहीं है। सारे किस्से में उन्हें अपना पुत्र दिखता रहता है। इसी तरह दीवार में खिड़की रहती थी में दस ग्यारह साल का एक लड़का रघुवर के घर के सामने एक पेड़ पर चढ़कर बैठा रहता है। वह पिता की मार से डरता है और यहां छिपकर बीड़ी पीता है। पिता घर में होने न होने को अपने डंडे से जतलाते हैं। बाहर डंडा रखा हो तो पिता घर में हैडंडा नहीं है तो पिता घर में नहीं हैं। डंडा बाहर न होने पर ही पुत्र घर में घुसता है। सोनसी कभी कभार इस लड़के को कुछ खाने को भी दे देती है। रघुवर और सोनसी इन पिता-पुत्र का मेल करा देते हैं। विधुर पिता का पुत्र पर स्नेह अपने हिस्से की जलेबी देने से प्रकट होता है.

सुमनिका : खिलेगा तो देखेंगे में संबंधों की बड़ी प्रामाणिक और साथ ही बड़ी काव्यमय छवियां हैं। बेटी जिसके जन्म पर माता पिता एक चिड़िया की सीटी सुनते हैं और उसका नाम बेटी चिड़िया रख देते हैं। बेटा मुन्ना जो भूख को सहता रहता है फिर अचानक अवश होकर गिर पड़ता है और पूरा परिवार भूख की इस जंजीर से बंधे बच्चे की रक्षा का उपाय सोचा करता है.

अनूप : ये प्रसंग बहुत करुण और निष्कलुष हैं। असल में विनोद कुमार शुक्ल के सारे ही आख्यान में करुणा जीवन जल की तरह व्याप्त है। यथार्थ बहुत सच्चा और अकृत्रिम है। समाज का यह तबका कथा-साहित्य में कम ही आया है। बिना किसी तामझाम के आने की वजह से पाठक को हतप्रभ भी करता है। सच्चाईनिष्कलुषता और करुणा मिलकर सारे आख्यान को बेहद भावालोड़न से भर देते हैं

 

उपन्यास कैसे कहते हैं ?

अनूप: विनोद कुमार शुक्ल की कहनी अलग तरह की है। कुछ बिंदु हैं जिनकी मदद से उनके कथा लेखन को समझने में मदद मिल सकती है और उससे उपन्यास क्या कहते हैंइसे जानने में और भी मदद मिल सकती है। उपन्यासकार कथा को रंग-संकेतों की तरह कहता है। वह कथा वर्णित नहीं करता। वह दृश्य का वर्णन करता है। दृश्य के अतिरिक्त कम ही बोलता है। इसमें दो शैलियां मिश्रित हो रही हैं। एक तो नाटक के रंग संकेत लिखने की शैलीदूसरे चित्रकला की तरह चित्र रचने की शैली

सुमनिका : चित्र तो हैं। लेकिन जितनी छोटी छोटी डिटेल इनके चित्रों में दिखती है वैसी तो किसी चित्रकृति में दिखाई नहीं देती। उसमें ऐसे छुपे हुए हिस्से तक प्रकट होते हैं जो एक दो आयामी चित्र में नहीं समा सकते। और फिर एक चित्र कई कई एसोसिएशन और इम्प्रेशन पैदा करता है। और वे कई समानांतरताएं सामने रखते जाते हैं। इससे अर्थ का दायरा भी विस्तृत होता जाता है।

अनूप : लेखक मन:स्थितियों को भी लगभग इसी चतुराई से वर्णित कर देता है। हिंदी में इस पद्धति से धारा-प्रवाह लेखन शायद कम ही हुआ है। इसलिए इसका प्रभाव भी अलग तरह से पड़ता है। संयोग से तीनों उपन्यासों में इसे शैली की तरह उन्होंने विकसित किया है। उनका लेखन समय लगभग बीस सालों तक फैला है। नौकर की कमीज 1979 में आया था। खिलेगा तो देखेंगे और दीवार में खिड़की रहती थी 1994 से 1996 के बीच लिखे गए हैं। जगदीश चंद्र की उपन्यास त्रयी की भी बहुत जमीनी हकीकत की कथा हैपर उसकी कहनी पारंपरिक गद्य लेखन की शैली है.

सुमनिका : उनका पूरा लेखन मुख्यधारा से अलग एक वैकल्पिक संसार रचता है। जिसमें शैली और शिल्प तक में भी उनकी सबाल्टर्न दृष्टि प्रकट होती है। लोक कथाएं और परिकथाएं और मिथक कथाएंबच्चों के खेल और संवाद पूरी हकीकत को बेहद मासूमियत से उकेरते हैं

अनूप: विनोद कुमार शुक्ल के पात्र एक खास तरह की भाषा बोलते हैं। उनका अंदाज भी खास है। कई बार वह एक जैसा भी लगता है

सुमनिका : खास का मतलब है कि इतनी ज्यादा आम बल्कि कहें वास्तविक और ठेठ.. कि जहां कुछ भी अतिरेक नहीं होता। पर जिस तरह से विनोद कुमार शुक्ल अपने बड़े खास दृश्यों के बीच उन्हें रख देते हैंउससे वे कविता के शब्दों की तरह उद्भासित हो जाते हैं

अनूप : नौकर की कमीज के बड़े बाबू और नायक संतू बाबू के संवाद कई जगह विसंगत (एब्सर्ड) नाटकों की याद ताजा करवा देते हैं। दीवार में खिड़की रहती थी के विभागाध्यक्ष भी कई बार तर्क से कुतर्क पर उतर आते हैं। ये लोग बेमतलब की बात करने लग जाते हैं। कई जगह उससे हास्य विनोद पैदा होता हैकहीं वह यूं ही ऊलजलूल संवाद बन के रह जाता हैएब्सर्ड नाटकों के संवाद की तरह

सुमनिका : मुझे बार बार कुछ ऐसा भी लगता है कि उपन्यासकार का कथ्य जो घनघोर यथार्थ और जीवन हैक्रूर और सुंदर भी हैउसे व्यक्त करने में लेखक उसे बच्चों के खेल संसार जैसा मासूम बना देता है। उनके संवादशिल्पउछाहसब जैसे शिशुता की रंगत से रंगे हैं। शायद इसीलिए उनमें लोककथाओं के संवादों सी पुनरावृत्तिशैलीबद्धता और लय मिलती है। खिलेगा तो देखेंगे के कुछ दृश्य तो कार्टून फिल्म की याद दिलाते हैं। जब बस गुरूजी के परिवार को लेने आती है और उनके पीछे पड़ जाती है। वे उससे बचने के लिए पतली गली में जाते हैं। बस भी पतली हो के उस गली में घुस जाती है। वे सीढ़ियां चढ़ जाते हैं तो बस भी चढ़ जाती है। इसी तरह इसी उपन्यास में नवजात को सेकने का प्रसंग है। या चिरौंजी के चार बीजों से पेट भरने का प्रसंग है। ऐसा लगता है कि बच्चा अपनी अटपटी सरल रेखाओं में दुनिया को अंकित कर रहा हैदुख को और सुख को। क्योंकि बच्चे ही हैं जो नाट्य और झूठमूठ में भी सचमुच का मजा लेते हैं।.

अनूप : नौकर की कमीज में तो दफ्तर के बाबू लोगों ने एक जगह बाकायदा नाटक की दृश्य रचना की है। जैसे वे उसमें अभिनय करने वाले हों। हालांकि विसंगत नाटक बाहरी तौर पर अर्थहीन से होते हैं। वे सिर्फ एक माहौल की रचना करते हैं। यही माहौल नाट्यानुभव में बदलता है। जबकि इन उपन्यासों की वर्णन शैली में कथा भी आगे बढ़ती है। विषय-वस्तु सामाजिक जीवन से गहरे जुड़ी हुई है। नौकर की कमीज और खिलेगा तो देखेंगे उदास कथा कहते हैंवहीं दीवार में खिड़की रहती थी उल्लास से परिपूर्ण आख्यान है।

सुमनिका : यह नाट्य सुख उनके तीनों उपन्यासों में है। क्योंकि जीवन में जो कष्ट है वो सचमुच का है तो उसको झूठमूठ के सुख से ही मात दी जा सकती है। जैसे कोटवार पूरे यथार्थ भाव से झूठमूठ की बीड़ी पीने का सुख उठाता है। और गुरूजी झूठमूढ की बीड़ी न पीने को बजिद्द हैं कि उससे भी तो लत लग जाएगी। उपन्यासकार कहता भी है कि यह झूठमूठ धोखा देना नहीं है बल्कि खेल है और इसका सुतंलन जीवन में हो तो जीवन जीया जा सकता है

अनूप: उपन्यासकार चूंकि दृश्य का वर्णन करके ही कथा और चरित्र को आगे बढ़ाता हैइसलिए उसकी अपनी कोई भाषा या भंगिमा नहीं है। वर्णन की भाषा भी पात्रों की ही भाषा है। इस पर स्थानीयता का रंग काफी गहरा है। इसमें खास तरह की अनौपचारिकताआत्मीयता और अकृत्रिमता है‎‎। यही उपन्यासकार की भाषा शैली बन जाती है। यह हमारे आंचलिक कथा साहित्य की भाषा से अलग है। विनोद कुमार शुक्ल की भाषा की यह खूबी है

सुमनिका: और उनका वाक्य विन्यास?

अनूप: विनोद कुमार शुक्ल की भाषा का वाक्य-विन्यास भी भिन्न है। इनके वाक्य छोटे होते हैं। आधुनिक पत्रकारिता में छोटे वाक्य लिखना अच्छा माना जाता है। वे किसी दृश्य या घटना का छोटा छोटा ब्योरा छोटे छोटे वाक्यों में देते हैं। इससे एक तरह का लोक कथा वाचन का रंग भी आता है। पर शुक्ल की कहानी में नाटकीय भंगिमा बिल्कुल नहीं है। बल्कि भंगिमा ही नहीं है। यही इसकी खूबी है। यह खूबी पात्रों के साथ मेल खाती है। क्योंकि पात्रों की भी कोई भंगिमा नहीं है। सीधे सादे जमीनी पात्र। गरीबी का गर्वोन्नत भाल लिए। यहां गरीबी या अभाव का रोना नहीं है। आत्मदया की मांग नहीं है। उससे बाहर आने के क्रांतिकारी तेवर भी नहीं हैं। असल में वे जैसे हैंवैसे ही उपन्यासों में हैं। हां फ यह है कि ये वैसे नहीं हैं जैसा हम लोगों के बारे में सोचते हैं। विनोद कुमार शुक्ल का सारा गद्य ही वैसा नहीं है जैसा हम प्राय: पढ़ते हैं। यह अपनी ही तरह का गद्य है। इसने गद्य की रूढ़ि को तोड़ दिया है। हमें रूढ़ गद्य पढ़ने की आदत है। शायद इसीलिए विनोद कुमार शुक्ल पर उबाऊ गद्य लिखने की तोहमत लगती है‎।

सुमनिका : ऊब का कारण शायद पाठक की हड़बड़ी में छिपा हैकि वो उनकी चाल से दृश्य में नहीं रम पाता। वैसे विनोद कुमार शुक्ल के शिल्प में कदम कदम पर आभास एक दूसरे में बदल जाते हैं। जैसे गाड़ी का डिब्बा जीवन की गाड़ी का डिब्बा हो जाता है जिसमें परिवार के साथ गुरूजी बैठे हैं और टिकट जेब में है। जैसे बुखार की गाड़ी तीन दिन तक जिस्म के स्टेशन पर रुकी रह जाती है। पैरों में चप्पल नहीं होती लेकिन माहुर का लाल रंग हवा पे छूट जाता है। वैसे विसंगत नाटक वाली बात भी पते की है।

 

विनोद कुमार शुक्ल का देखना

 

अनूप : आम तौर पर रचना में दो पहलुओं की छानबीन कर लेने से काफी कुछ पता चल जाता है कि उसमें क्या कहा है और कैसे कहा गया है। शुक्ल जी के संदर्भ में उनके देखने के अंदाज को देखना जरूरी लगता है। जैसे किसी भी घटनापात्रस्थितिविचारवस्तु को जानने के लिए यह जरूरी होता है कि हम उसे कहां से देखते हैं। दूर सेपास सेऊंचे सेनीचे सेकरुणा सेउदासीनता सेसंलग्नता से या निर्लिप्तता या निर्ममता से। रचनाकार क्या पोजीशन लेता हैउससे उसके सरोकार तय हो जाते हैं

विनोद कुमार शुक्ल की दृष्टि अद्भुत है। वे अपने पात्र को मचान पर बैठकर या गर्त में गिराकर नहीं देखते। उनके पात्र न तो ऊंचाई से दिखने वाले खिलौने हैंन ही नीचे से दिखने वाले भव्य महापुरुष‎‎। रचनाकार समस्तर पर रहकर देखता है। उसके पास पात्र को रंगने या बदरंग करने की कोई कूची भी नहीं है। जैसे रचनाकार को किसी चीज को जैसी है वैसा ही कहना बड़ा पसंद है। जैसे दिन की तरह का दिन थाया रात की तरह की रात थी। इसी तरह उसके पात्र जहां और जैसे हैं वे वास्तव में ही वहां और वैसे ही हैं। रचनाकार बस उनके अंग संग बना रहता है‎।

सुमनिका : पर वो एक स्थिति को कोण बदल बदल के भी देखता है।

अनूप : इस देखने में मजे की बात है कि सिर्फ पात्र ही नहींपूरा जीवन-जगत ही उसके अंग संग है। उसमें व्यक्तिप्राणि जगत और प्रकृति सब समाहित है। यहां व्यक्ति का मन भी उसी पारदर्शिता से दिखाता है जितनी स्फटिक दृष्टि से प्रकृति और वनस्पति जगत को देखा गया है

सुमनिका : हां। सम्पूर्ण जीवन के प्रति ऐसी समानुभूति कि एक हिलता हुआ पत्ता भी मानवीय स्थिति का हिस्सा ही होता हैसंवादरत होता है। पेड़ की छाया भीचींटी भीचिड़िया भीआलू प्याज और तोते का पिंजरा भी। सचमुच मुझे यह बचपन की नजर का अवतरण लगता है। जब कुछ भी निर्जीव नहीं होता। न ही अपने संसार से बाहर होता है। यह अद्भुत लौटना है। मैं इस नजर पर अभिभूत हूं

अनूप : विनोद कुमार शुक्ल के देखने में भावुकता नहीं है। निर्ममता और उदासीनता की कोई जगह नहीं है। पूरी तरह से संलिप्तता भी नहीं है। उस पर निर्लिप्तता की छाया प्रतीत होती है।

सुमनिका : हांदृश्य पहली नजर में निर्लिप्त लगते हैं..

अनूप : हांपर शायद इन्हीं दोनों के संतुलन से करुण दृष्टि का जन्म होता है। रचनाकार का देखना करुणा से डबडबाया हुआ है। यह एक दुर्लभ गुण है। इस तरह उपन्यासकार जीवन-जगत के सम-स्तर पर रहते हुए उसे करुणा-आप्लावित नजर से देखता है। इस वजह से उनका गद्य अनूठा बनता है। करुणा से देखे जाने के कारण ही रचना श्रेष्ठ होती हैइसमें कोई शक नहीं है। यहां रचनाकार प्रकृति और प्राणि जगत को भी उसी सजल नजर से देखता है। चाहे वे पेड़ पौधे होंहाथी होचाहे बादल आकाश प्रकाश और अंधेरा हो।

सुमनिका : हांयह उनकी बहुत बड़ी शक्ति है। और यह करुणा सपाट बयानी की तरह नहीं आती। करुणा पर वो एक झीना परदा डालते हैं। यह उनके खास शिल्प का पर्दा है जिसमें लोक कथाएंबच्चों के खेल और परी कथाओं का शिल्प है। सच और झठमूठ के खेल का एक निराला संतुलन बनता है

अनूप : विनोद कुमार शुक्ल की नजर में एक और गुण हैउनकी आर पार देखने की शक्ति। इसी नजर से वे आकाश को देखते हैं और उसमें अंधेरे उजाले को देखते हैं। इसी दृष्टि के कारण वे हाथी की खाली होती जगह देखते हैं और लिखते हैं 'हाथी आगे आगे निकलता जाता था और पीछे हाथी की खाली जगह छूटती जाती थी यह पंक्ति दीवार में खिड़की रहती थी के पहले अध्याय का शीर्षक बनती है। यथार्थ को रूढ़िबद्ध ढंग से देखने का आदी पाठक इस पंक्ति को निरर्थक पाता है। रूढ़ि में नवीनता देखने वाला पाठक इस पंक्ति में चमत्कार देखता है। लेकिन अगर आप ध्यान से पढ़ें और देखने लगें तो हाथी की जगह आपको दिखने लगेगी

सुमनिका : हम कह सकते हैं कि एक दृश्य के गतिशील तत्वों को वे देखते हैं तो रुके हुए तत्वों को भी। फोरग्राउंड को देखते हैं तो बैकग्राउंड को भी। और उन्हें इंटरचेंज भी कर देते हैं। कभी अग्रभूमि का आकार देखते हैं तो कभी पृष्ठभूमि का। जैसे अंधेरा और हाथी। फिर अंधेरे के हाथी। पानी के भीतर और पानी के ऊपर का अंधेरा। मनोविज्ञान में यह परसेप्शन का खेल होता है

अनूप : असल में विनोद कुमार शुक्ल को हड़बड़ी में नहीं पढ़ा जा सकता। धीरज से पढ़ने पर ही अनूठी दुनिया खुलती है। जाते हुए हाथी से हाथी की विशालताकालेपन और मंद चाल का एहसास होता है। लेखक उसे दत्तचित होकर जाता देखता है। रघुवर प्रसादसोनसी और छोटू हाथी को इसी नजर से देखते हैं

सुमनिका : हांवो दृश्य में इतने गहरे उतरते जाते हैं .. क्षण क्षण के विकास के साथ। और हम से भी उसी चाल की मांग करते हैं। और शायद ऊब की तोहमत इसी कारण लगती है कि हमारी नजर ऐसी विलंबित और दृश्य में डूबी हुई नहीं होती।

अनूप : इसी तरह रचनाकार प्रकाश और अंधेरे की छटाओं की विलक्षणता को देख और दिखाकर पाठक को आह्लाद से भर देता है। खिड़की से बाहर जाता या अंदर आता अंधेरा या प्रकाश वास्तव में ही दिखने लगता है। गहन अंधेरे के बाद अत्यधिक उजाले को वे दो सूर्यों का उजाला कहते हैं। विरह के अंधेरे में पड़े रघुवर को दिन का उजाला इतना ज्यादा चुभता है मानो वह दो सूर्यों का उजाला हो। हाथी को स्वतंत्र करने का सुख रघुवर प्रसाद को इतना ज्यादा है कि उन्हें आगे पीछे अंधेरे का स्वतंत्र हुए हाथियों का जूलूस निकला हुआ महसूस होता है। इससे एक तरफ अंधेरे की सघनता का बिंब बनता हैदूसरी तरफ हाथी को आजाद करने का उल्लास सारे वातावरण में घुल जाता है। एक अन्य प्रसंग में बिजली के उजाले में गिरती हुई पानी की बूंदें दिखती हैं जो पतंगों की जरह जीवित दिखती हैं‎।

इसी में सोनसी का अपने घर जाने और रघुवर प्रसाद के विरह का प्रसंग भी बहुत मार्मिक है। यहां 'नहीं हैशब्दों की ध्वनि मानो कई दिन तक हवा में अटकी रहती है। रचनाकार मानो ध्वनि को भी देख रहा है। रघुवर प्रसाद हाथी को खोलने के लिए जा रहे हैं। जाते जाते सोनसी पेड़ पर बैठे रहने वाले लड़के के बारे में पूछती है। वे धीरे से चिल्ला कर कहते हैं 'नहीं है'। रात के सन्नाटे में यह आवाज आगे तक चली गई। एक और आदमी जो अपने घर के सामने बैठा थाउसने भी यह आवाज सुनी। वह सहज बोल उठा, 'कौन नहीं है' इसके बाद सोनसी के जाने का प्रसंग है। रघुवर प्रसाद को लगता है कि बस इस तरह रवाना हुई जैसे सोनसी को छीन कर ले गई। जो रघुवर खिड़की से बाहर अपने मन के लोक में रमे रहते थेवे अचानक यांत्रिक हो जाते हैं। नवविवाहित का पत्नी के बिना मन नहीं लग रहा। रात को नींद खुलने पर वे सड़क पर आ जाते हैं। वे रात के सन्नाटे में 'नहीं हैशब्द बोलना चाहते हैं। उन्हें लगा 'नहीं हैजैसा वातावरण गहराया हुआ है। वे दृश्य की कल्पना सी करते रहते हैं जिसमें कोई आदमी फिर पूछता है 'कौन नहीं है भाई'। रघुवर कातर मन से कहते हैं 'सोनसी नहीं है'‎‎। यह ध्वनि मानों कई दिन तक अटकी रही आती है‎‎। यह रघुवर की अटकी हुई मन:स्थिति ही है

सुमनिका : कदम कदम पर उनके वर्णन करुण-हास्य या ब्लैक कामेडी के जीवित उदाहरण हैं

अनूप : हां। इस तरह हम कह सकते हैं कि विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों की विषय-वस्तु और शिल्प का आस्वाद तभी लिया जा सकता है जब हम उनके देखने को भी तनिक समझ लें। अगर उनकी तरह के देखने से हम तदाकार नहीं होते हैं तो हमें कथाकथ्यविषय-वस्तु बहुत साधारण लगेगा। उनके कहने का तरीका चामत्कारिक लगेगा। तब उपन्यासों को रूपवाद की तरफ ठेल दिया जाएगा। ऐसा करना इन उपन्यासों के साथ अन्याय होगा। इसका अर्थ है कि उपन्यासों के क्या और कैसे को उनकी अप्रतिम दीठ के जरिए समझने में मदद मिलती है

(विनोद जी की छवि हिन्दवी से साभार)