रविवार, सितंबर 13, 2026

मुक्तिबोध : विष्णुचंद्र शर्मा की कलम से

 

 सभी रेखांकन:सुमनिका

विष्णुचंद्र शर्मा ने हिन्दी के अन्यतम कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की जीवनी लिखी है। मैंने इस जीवनी पर एक नज़र डाली है, जो आर्यकल्प पत्रिका के विष्णुचंंद्र शर्मा विशेषांक में प्रकाशित हुई है। यहां आपके लिए प्रस्तुत है। 


मुक्तिबोध

एक महाकाव्यात्मक जीवनी


विष्णु चंद्र शर्मा ने मुक्तिबोध की आत्मकथा लिखी है। मैंने बड़ी आसानी से कह दिया था कि मैं इस पर लिखूंगी, क्योंकि इस आत्मकथा को हासिल करने, हाथ में लेने और उसे पढ़ना शुरू करने के पहले तक मुझे यह भ्रम रहा कि मुक्तिबोध के जीवन की कई छवियों को मैंने किसी आत्मकथा में पढ़ा तो जरूर है, जिसमें नागपुर, उज्जैन, राजनंदगांव, इंदौर जैसे शहरों के नाम उभरे थे। उन शहरों के चौराहों, बाजारों और गलियों का उसमें जिक्र था। रात के कर्फ्यू में पुलिस की सीटियों के बीच घर लौटने की आवाजें भी थीं। चाय पीते हुए, बीड़ी जलाते हुए मुक्तिबोध और उनके सहचरों की छायाएँ, सड़कों के लैंप पोस्ट के नीचे, तो कभी नदी किनारे किसी चट्टान पर बैठे हुए। फिर लगा कि शायद वे एक साहित्यिक की डायरी के बिंब रहे हों, जो स्मृति में घुल कर बचे रह गए हैं और आज तक दर्ज हैं; या फिर यह सब स्वयं मुक्तिबोध की कविताओं का ही धड़कता हुआ देश काल और संसार था, जिसमें मुक्तिबोध का 'मैं', उनका नायक, विचरण करता सा था, अंधेरे से जगत में कभी डर से थर्रा कर भागता, कभी सुस्ताने लगता, अपने सिहरते हुए उद्वेलनों को संभाल कर सोचने लगता। चलते हुए चित्र और दृश्यावलियां- जैसे कोई फिल्म रील हो, एक ऐसी काव्य फेंटेसी, एक ऐसा तिलिस्मी जीवन, जहां जीवन-यथार्थ और फैंटेसी का भेद धुंधला कर गायब होने लगता है, जहां स्वप्न और जागृति की सीमाएं कोहरे में खो जाती हैं। बल्कि स्वप्नवत दृश्य में ही यथार्थ के अंतर्तल जाग्रत होकर मूर्त होने लगते हैं- स्वप्न के उन विज़न्स की तरह जो अचानक छुपे पहलुओं को सतह पर ले आते हैं। 

लेकिन धीरे-धीरे इस आत्मकथा के पन्ने पलटने और पढ़ने पर लगा कि मुक्तिबोध के जीवन पर लिखी यह पुस्तक पहली बार ही मेरे हाथ में आई है और यह भी कि मुक्तिबोध के बीहड़ जीवन की बीहड़ यात्रा करने वाली यह आत्मकथा कितनी विषद है, कितनी संजटिल। यहां बृहत्तर संसार भी है, बाहरी घटनाओं के संदर्भ भी हैं, पर मुक्तिबोध के काव्य-संसार के चरित्र की तरह यहां भी मुक्तिबोध की आंतरिकता में अवगाहन की कोशिश ही अधिक है। हालांकि मुक्तिबोध इस भीतर बाहर को एक ही कंटिनुअम के रूप में व्याख्यायित करते आए हैं। फिर भी यह कथा उनके 'आत्म' में उतरती है। वहां जो निरंतर आलोड़न हैं, विचारों की लहरों पर लहरें हैं, संवेदनों के आवर्त पड़ते हैं, मंथन हैं, विभिन्न चेहरों की छायाएं हैं, उन सब का खाका उभरने लगता है। निश्चय ही यह सब बाहरी यथार्थ से नाभिनाल बद्ध ही है- बाहरी जीवन की विकटता, दरिद्रता, विद्रूपता, संबंधों में 'अनबन' और 'बेबनाव' की छायाएं चारों तरफ तो हैं ही। एक तो इस आत्म के व्यापक संदर्भ के रूप में मुक्तिबोध का 'इतिहास पुरुष' खड़ा है, तो दूसरी ओर स्वयं मुक्तिबोध भी व्यक्ति से ऊपर उठकर अपने आत्म संघर्ष में अपने समय के स्वप्नों और दुर्बलताओं का रूप हो गए हैं, उससे तदाकार हो गए हैं। 

यहां एक पूरा युग उभरता है, सन 1917 से 1964 तक के इस व्यक्ति फ्रेम में दो महायुद्धों की विकट और दारुण परिस्थितियां तो हैं ही, अनेक तरह की क्रांतियां और विद्रोह भी समाए हैं। 1760 में यूरोप में औद्योगिक क्रांति की शुरुआत ने ही कई सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तनों का बीजारोपण कर दिया था- इसी ने बाद में समाजवाद और साम्यवाद जै
से 
दर्शनों और विचारों को जन्म दिया था। 1789 में मध्य वर्ग ने फ्रांस में विद्रोह किया था, 1917 में सर्वहारा वर्ग ने रूस में विद्रोह किया, और फिर दो महायुद्धों के बाद के शीत युद्ध के भी संदर्भ इसमें हैं। साम्राज्यवादी युद्ध में अफ्रीका का, दक्षिण पूर्व एशिया का, और भारत का, गुलामी का जुआ उठाए हुए झोंका जाना भी यहाँ है। आजादी के आंदोलन के विविधमुखी जुलूस का अंकन भी है। गांधी, नेहरू,और राजनीतिक प्रतिवाद के प्रतीक तिलक हैं, तो भगत सिंह, आजाद और बिस्मिल भी हैं। अनेक युग पुरुष हैं, अनेक साहित्य आंदोलन, साहित्यकार एवं उनकी रचनाएं हैं, रचनाओं के पात्र और उनकी चेतनाएं हैं, परिस्थितियाँ हैं। 

विष्णु चंद्र शर्मा का मूल उद्देश्य और सरोकार तो मुक्तिबोध को समझना रहा है- बहैसियत एक आदमी के, सीधे-सीधे, बिल्कुल, कतई। इस बीहड़ यात्रा में उनका सबसे प्रधान उपजीव्य बनी हैं स्वयं कवि मुक्तिबोध की रचनाएं- जिनमें उनके आत्म संघर्ष का, बहसों का, विद्रोहों और रूपांतरण के सपनों का इतिहास दर्ज है। काव्य के अलावा इनमें कहानी, लेख, डायरी- प्रसंग और मुक्तिबोध का मित्रों से किया गया पत्र-व्यवहार भी आधार बना है। फिर आते हैं मुक्तिबोध के परिवार के लोग- उनकी पत्नी शांता मुक्तिबोध ,बेटे रमेश मुक्तिबोध, भाई शरद मुक्तिबोध के माध्यम से मुक्तिबोध के जीवन प्रसंगों और रचनाओं के कालक्रम को समझने की कोशिश। फिर व्यक्ति मुक्तिबोध की पहचान का सिलसिला उनके तमाम मित्रों और लोगों से मिलकर भी खुला है, जिनमें दिल्ली के जगत शंखधर और नेमिचंद्र जैन, शमशेर बहादुर सिंह, नागपुर में उनके कवि भाई शरद मुक्तिबोध, भोपाल में त्रिलोचन शास्त्री और अशोक बाजपेई, जबलपुर में परसाई और सृष्टिधर मुखर्जी आदि का सहाय्य खोजा गया था। 

मुक्तिबोध के वैचारिक व्यक्तित्व और मार्क्सवादी सौंदर्य दृष्टि की परख के उपजीव्य बने थे रामविलास शर्मा के ग्रंथ और राहुल जी तथा अन्य कई रूसी और भारतीय चिंतक एवं राजनीतिक विचारक। शैली चुनी थी उन्होंने पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यास 'बाणभट्ट की आत्मकथा' की । जिसमें तीन भुजाएं थीं अर्थात भीतर, बाहर और चेतना से बना एक त्रिभुज। 


विष्णुचंद्र शर्मा लिखते हैं कि काशी में जब वह घूमा करते थे तो मुक्तिबोध की 'हर चीज़/ मुझ पर अपनी एक सपनीली छाँह डालती थी।' यानी एक गहरा सा रोमान था उनके प्रति। उन्हें समझने की, उन्हें जानने की उत्कट जिज्ञासा का बीज बनारस में ही पड़ा था। 

'बाणभट्ट की आत्मकथा' से विष्णु जी ने प्रथम पुरुष अर्थात 'मैं' की जो शैली अपनाई, उसमें एक जटिलरासायनिक क्रिया घटित हुई। इसे पढ़ते हुए बार बार यह लगता रहा कि यह आत्मकथा किसी भी दृष्टि से सीधी-सादी और इकहरी नहीं है- कारण मुक्तिबोध की हर बात, हर प्रवृत्ति, हर स्वप्न, आशंका, द्वंद्व और अपराधबोध को न केवल विश्व साहित्य के दूसरे साहित्यकारों के समक्ष रख कर खोलने की कोशिश हुई है, बल्कि साहित्यकृतियों के पात्रों और नायकों में भी समान्तरताएँ खोजी गई हैं। ऐसा स्वयम् मुक्तिबोध ने तो नहीं किया होगा- यद्यपि उन्होंने  अपने पत्रों में खुद को नव्य शेक्सपीरियन युग का हैमलेट और दोस्तोयेव्स्की का पात्र 'इडियट' तो बार बार कहा है- पर गोर्की, तोल्स्तोय, तुर्गनेव और बाल्ज़ाक से लेकर प्रेमचन्द और प्रसाद, कबीर और मीरा में भी मुक्तिबोध के अन्तस् के सूत्र तलाशने की प्रविधि श्री विष्णुशर्मा की है। आत्मकथा में व्यक्तित्व के भाष्य का यह एक अनोखा रूप है जिसमे देश काल की सीमाओं के आरपार जाकर मनुष्य को समझने की कोशिश हो रही है। आत्मकथा के कल्पित 'मैं' में मुक्तिबोध तो हैं ही, अजब ढंग से विष्णु का 'मैं' भी इसमें तदाकार हो गया है। मुक्तिबोध तो विश्व साहित्य के अध्येता रहे ही थे ,स्वयं विष्णुचंद्र शर्मा भी विश्वसाहित्य के मर्मज्ञ रहे हैं। इसीलिए मुक्तिबोध  के अंतस् का हर वर्णन दूसरे साहित्य- पात्रों, चरित्रों और साहित्यकारों के दर्पण में प्रतिछायित होता है, खुलता है। इन समानांतर पात्रों में तोल्स्तोय के 'रिजेरेक्शन' के स्वप्नजीवी और बेचैन पात्र (नेख्लदोव) हैं तो दोस्तोएवस्की के अब्नार्मल से लगते आत्मचेतस पात्र भी हैं, प्रसाद की कामायनी के मनु से लेकर, शरद चंद्र के चरित्रहीन, प्रेमचंद के सूरदास और होरी हैं, व्यास की द्रौपदी और आंसुओं से प्रेम की बेल सींचने वाली मीरा की व्यथा है, मायकोव्स्की भी अपने सरोकारों की वजह से यहाँ मौजूद हैं तो पाब्लो पिकासो भी। मुक्तिबोध के व्यक्तित्व के अनेक पक्ष हैं, उनमें तरह-तरह के द्वैत, विभाजन और ध्रुवीकरण हैं, जिनके चलते उनके व्यक्तित्व का भाष्य देश काल की परिधि से परे, इन तमाम साहित्यकारों और उनके पात्रों के जीवन के जरिए भी  खुलता है। 

एक ओर कवि मुक्तिबोध का संपूर्ण काव्य और साहित्य जहां उनकी आत्मा के संघर्ष का गवाह है, वहीं वह साहित्य भारतीय मध्य वर्ग की मन:बाधाओं और रूपांतरण के स्वप्न का भी हलफनामा और इतिहास है। यह कवि मुक्तिबोध का निजी संसार ही नहीं, शायद हम सब का, तमाम उन लोगों का निजी संसार और अंतर जगत है, जो निरंतर द्विधाग्रस्त और विभाजितमना है, कार्यशीलता का स्वप्न देखकर भी जो कुछ कर नहीं पाते, अगतिकता और सुविधापरस्ती और टल्लेनवीसी में जो जकड़ा हुआ है। फिर भी वह शिद्दत से चाहता है कि निजी जीवन और अस्तित्व रक्षा की दीवारों को लांघ व्यापक जीवन का आत्यंतिक हिस्सा हो जाए- इसीलिए विष्णु चंद्र शर्मा ने प्रेमचंद के उपन्यास 'रंगभूमि' के सूरदास के बिंब से इसे तुलनीय माना है।

‘उसके जीवन में नैराश्यपूर्ण दारिद्र्य था। न खाट, न बिस्तर, न बर्तन, न भांडा- लेकिन यह चरित्र महाजनी सभ्यता से लड़ते-लड़ते कैसे अद्भुत ढंग से देशव्यापी चरित्र में तबदील हो जाता है।’ 

विष्णु जी ने फ्रांसीसी जीवनी लेखक हेनरी ट्रायट की जीवनी 'तोल्स्तोय' से भी मुक्तिबोध के व्यक्तित्व के कई सूत्र खोले हैं अर्थात मुक्तिबोध की लक्ष्य के प्रति एकाग्रता और जीवन को बदलने की रचना प्रक्रिया का पाठ पढ़ा है । लेकिन सबसे अधिक समानता तो डच कलाकार विंसेंट वैन गॉग के जीवन से मुक्तिबोध की रही है। उन की जीवनी 'लस्ट फ़ॉर लाइफ' ने मुक्तिबोध के कलाकार की पीड़ाओं और संघर्षों को पहचानने में मदद की है।

विष्णुचंद्र शर्मा मुक्तिबोध के युग की दो इतिहास दृष्टियों  या चिंतन दृष्टियों  में भेद करते हैं। दोनों ही दो तरह की किंचित भिन्न आधुनिकताएँ हैं। एक है विश्व एवं भारत की प्रगतिशील परम्परा और भूमिका जिसे वे स्वस्थ समाजिकता का रूप मानते हैं और दूसरी है द्वितीय विश्वयुद्ध  के बाद योरुप से आयातित आधुनिकता, जिसमें अस्तित्ववादी दर्शन प्रधान था। यह वैचारिक परिदृश्य जीवनीकार की दृष्टि में एक व्यापक संदर्भ की तरह रहा है। हालांकि इन्हें इस तरह नितांत विरोधी मुद्राएँ मानकर अलगाने के अपने खतरे भी हैं- द्वंद्वात्मक भौतिकवादी इतिहास दृष्टि भी आयातित ही है। दोनों के जन्म के अपने सामाजिक कारण और  ठोस आधार हैं- इन्हें एक  वृक्ष की  दो अलग शाखाएँ मान कर विश्लेषण किया जाए तो इकहरे पर्सपेक्टिव के शिकार हो जाने से बचा जा सकता है। बल्कि स्वयं मुक्तिबोध के व्यक्तित्व में ही ये दोनों शाखाएँ समाहित  सी प्रतीत होती हैं। खैर… 

मुक्तिबोध की चिंतन प्रक्रिया के भी उन्होंने दो स्तर माने हैं- एक है अपनी पूरी परंपरा और वैचारिक थाती को स्वीकार करके उसका परिष्कार। मुक्तिबोध की रचनाओं में इतिहास, पुराण और मिथकों के पात्र ही नहीं, उनकी छवियां, आद्यरूप एवं कथाएं भी आती हैं और यों उनकी काव्य चेतना समय के भूत-वर्तमान और भविष्यगत छोरों तक व्याप्त हो जाती है- गूंजने लगती है समय के आर पार। वहां रावण भी आता है, ब्रह्मराक्षस, अजीगर्त और शुन:शेप भी;  वहाँ तिलक, गांधी, नेहरू जैसे नेता भी विचरते दीखते हैं, जिन्हें बिल्कुल युगानुकूल संदर्भ में मुक्तिबोध ने ढाला है।    

दूसरा स्तर आधुनिकता की अस्तित्ववादी आधुनिकता से अलग आधुनिकता की प्रगतिशील भूमिका का है। यह बात मुक्तिबोध की तमाम वैचारिकता को दृष्टि में रखकर सही हो सकती है - है भी, लेकिन फिर भी अस्तित्ववादी अवसाद एवं अलगाव, खालीपन और एकाकीपन मुक्तिबोध के जीवन-अनुभव का बड़ा हिस्सा तो रहा ही है- वह भी उनकी परिस्थितियों और मनुष्य की टकराहटों से ही जन्मा है, थोपा हुआ नहीं है। यह और बात है कि स्वप्न, क्रांति और समाज के आमूल परिवर्तन का देखा जा रहा है। 

विष्णु चंद्र शर्मा खुद को भी आधुनिकता की इसी दूसरी परंपरा से संबद्ध करते हैं। वे बताते हैं की बनारस में उनके साथ रूस की अध्येता नतालिया और चीन के ली घूमा करते थे। यह तीनों ही दुनिया के तीन बड़े देशों में क्रांति की विचारधारा से, समाजवाद से, रूपांतरण से और मानवता के संघर्ष से जुड़े लोग थे।

आत्मकथाकार ने मुक्तिबोध के बचपन की तलाश की है। सतह से कुछ नीचे जाकर खुदाई की है- यहाँ वर्णन और ब्योरे तो हैं पर इन निचली सतहों में कुछ स्मृतियां दर्ज हैं- कुछ पुरानी सी छवियां, कुछ प्रबलअनुभूतियाँ। पूरी आत्मकथा के अनुपात में बीच बीच मे कौंधने वाली बचपन की ये स्मृतियाँ बिखरी बिखरी सी, कदाचित धुंधली और छिटपुट लग सकती हैं, पर इनका महत्व बहुत गहरा है। 

कोई भी मनोवैज्ञानिक बचपन के अनुभवों के महत्व को गहराई से समझता है। आत्मकथाकार ने भी इन्हें मुक्तिबोध के व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों के बीजों के रूप में देखा है। यही बीज, और भावों के संस्कार पल्लवित होते हैं एक जटिल व्यक्तित्व में और फिर मुक्तिबोध के काव्य-व्यक्तित्व में भी। बचपन की इन स्मृति-छवियों के सहारे मुक्तिबोध के लेखन के अनेक अनछुए पहलुओं को खोजने की गुंजायश आज भी बनी हुई है। 

ग्वालियर में पिता की पुलिस की नौकरी की बदौलत हवेलीनुमा घर मे रहना, फिर सरकारी क्वाटरों का जीवन और फिर तो नौकरी के लिए शहर शहर भटकना और गहरे पराजयबोध, चिंताओं और आत्मग्लानि से जूझना यहाँ दर्ज हुआ है। 

बचपन की तमाम स्मृतियों में एक प्रबल अनुभूति इस बात की थी कि बड़े बच्चों के साथ कितना अन्याय करते हैं, क्यों वे बच्चे के सच्चे आवेगों को, प्रश्नों को, जिज्ञासाओं की तीव्रता को, कभी भी समझ नहीं पाते। बच्चा खुद को एक पीड़ित मानता है । 'न समझे जाने का दुख' बच्चे में सदा व्याप्त सा रहता है। इसी दमित और असन्तुष्ट मनोभूमि से ही न जाने कितना कुछ फूटा है, आत्माभिव्यक्ति की बाधाएँ, पृथकता का बोध, आक्रोश और विद्रोह, ज़िद और आत्मग्रस्तता। 

'इसी ने विद्रोह और प्रतिकार के साथ साथ ज़िद के बीज भी डाल दिए थे । और इस जिद में अपनी बात पूरी करवाने के लिए मैं रोया करता। बालक के प्रश्न पर कोई हंस देता, कोप्यार से पुचकार या सहला देता, कोई फटकार देता, कोई टाल देता- जवाब कोई न देता।' आखिर क्योंकर जिज्ञासाओं का दमन किया जाता है। आगे चल कर भी आत्माभिव्यक्ति कभी सहज नहीं रही- सदा बाधित ही रही।    

'घर में इधर अपनों के चेहरे गम्भीरता में डूबे लगते हैं, बाहर की बातें भी घिर-घिर कर मेरे अन्तर्प्रवाह में आती हैं- वही मेरे मन की सहजता को रोक देती हैं- मन के भावों पर पाबंदी से लगाते शब्द- मानों लाल झंडी दिखा रहे हों।'

'मैं जो लिखना चाहता हूँ, वह लिखा नहीं जाता है। जो भीतर है वह प्राणों का संवेदन है, जो बाहर है वह निषेध है।' 

बचपन में प्रतिकार का भाव भी जम गया था अंदर,  … कोई किसी को मारे और मैं  केवल दर्शक बना रहूँ.. मुझे मंजूर न था।

वे कहते हैं कि जिज्ञासा के शिकार हम दोनों भाई थे। घर की चीज़ों को तोड़ के देखना - समझना चाहते थे। उज्जैन की हवेली की छत पर चढ़ कर मैं चारों ओर देखता, वैज्ञानिक विचारों की प्रयोगशाला कहीं भी खुल जाती थी। आगे चलकर यही सतह के नीचे जाकर विचारों और तंत्र की पहचान की प्रयोगशाला बन गई थी। यहाँ तक कि खुद अपने भावों और विचारों की टोह  लेता, उन्हें टटोला करता।

 'मैं' जिज्ञासावश विभिन्न देशों के इतिहासों को पढ़ चुके था।' 

 'अपने इर्द गिर्द के चेहरों की ऐयारी करता रहता हूँ। खुद की भी छानबीन करता हूँ।'

'चरित्र का विस्तार से अध्ययन एक वयस्क धंधा है।'

और यहीं (बचपन में) जन्मी थी किसी दूसरे रहस्यलोक में जाने और घूमने की माइग्रटेरी वृत्ति। याद आता है कि उनकी नानी उन्हें गोद में लेकर घण्टों डुलाती, झूमतीं और झूम-झूम कर गीत गाया करतीं। ‘ये गीत मुझे रहस्य की दुनिया में ले जाते, मैं चुप-चुप रहस्य में खोया रहता।’ यही कल्पनालोक, रहस्यलोक या एक समानांतर आंतर लोक ही तो लेखन का प्रतिसंसार बनता है, रचनाशीलता का लोक।

 'मन्दसौर में नदी है, घाट पर बैठ कर मैं उड़ा करता। मन्दिर के घण्टे, दरगाहें… शाही किले में ऐसे घूमता जैसे शाहज़ादा होऊं।'

विष्णुशर्मा एक छोटे बालक की अंतर्मुख प्रवृत्ति की भी व्याख्या करते हैं- 'जब मां मेरे सवालों का जवाब न दे पातीं तो मैं भीतर ही भीतर उनके हल खोजा करता। खोजते खोजते मैं एकदम आत्मकेन्द्रित और तल्लीन हो जाता। इसी आत्मकेंद्रित एकांत में मैंने अत्यंत भावुक सपने देखे हैं। सपनों की दुनिया में पहुंच कर मैं एक बड़े अनुराग में डोलने लगता।'

क्या यही मुक्तिबोध की काव्य फंतासी की मनोभूमिका नहीं है?  तीव्र अनुभव क्षण में सब कुछ भूल कर खो जाना -इसे ही उन्होंने मन का एक से दो हो जाना भी कहा है।

'मन विलग होकर क्षिप्रा के किनारे किनारे उड़ चला।'

इसी बचपन मे अंधेरे में कंदील का मन्द प्रकाश भी छाया हुआ है। यही घुप्प अंधेरा और फिर नीम उजाला उन की कविताओं का भी तो वातावरण है, भौतिक और मनोवैज्ञानिक ।

बचपन की एक और स्वप्नछवि है कि 'कोई लगातार 'मेरा' पीछा कर रहा है, मैं भाग रहा हूँ।'

मुक्तिबोध के आगामी जीवन के तमाम पलायन बोध, परसीक्यूशन, भय और चिंताएँ इस एक स्वप्नबिम्ब मे समाई हुई हैं। फिर यह पलायन चाहे अपनों और परिवार से हो, अपने अपराध बोधों और चिंताओं से हो, उदर भरण की जद्दोजहद हो या फिर सत्ता की शिकारी नज़रों से बच कर भागना हो।

एक स्वप्न बिम्ब में 'मैं' खुद को पुरानी सी पुस्तस्क पढ़ते हुए देखता है। फिर यह भी की उसके हाथ में कोई अमोलक हीरा है जो पता नहीं कहां गिर कर खो गया है। इन सपनो में बहुत सा भय, बहुत आक्रोश और बहुत बेबसी की भावनाएँ हुआ करतीं। जीवन एक गूढ़ रहस्य सा प्रतीत होता। और फिर यहीं आत्मान्वेषण और आत्महनन की प्रवृत्तियां भी हैं, जो अन्त तक उनके साथ रूप बदल बदल कर चलती रहीं। वे एक ही साथ विद्रोह और निर्वासन के ध्रुवों पर जीते रहे।

विष्णुचंद्र शर्मा मुक्तिबोध की एक त्रिमूर्ति गढ़ते हैं। जिसमें एक चेहरा है जिज्ञासु बालक का, दूसरा है वैज्ञानिक युवक का और तीसरा है अनुभवपूर्ण मत बनाने वाले वृद्ध का। यह तीनों जीवन के क्रम में धीरे धीरे प्रकट हुए हैं और फिर उनमें तीनों समाहित से भी हो गए हैं। बचपन के वर्णनों के भीतर प्रबल जिज्ञासा और सम्वेदन धड़क रहे हैं। इस स्तर की छवियाँ कुछ ऐसी हैं जैसे मानवता के शैशव की प्रागैतिहासिक अंधेरी गुफाओं में उकेरे गए आदिम और इकहरे चित्र हों।      

इस आत्मकथा में  यौवन के वर्णनों के रंग बड़े भास्वर और दीप्त हैं। वे न केवल भावुकता के रंग में रँगे हैं, बल्कि बचपन के इकहरे और स्थिर चित्रों के बरक्स उनमें ऐन्द्रीयता, दैहिकता, अस्थिरता और गहन नैतिक द्वंद्व के आयाम भी हैं।  यौवन के प्रेम-उद्वेगों और तनावों का जैसा ईमानदार आत्मसाक्षात्कार यहां मिलता है, वह कम ही  देखा गया है। आवेग जितना तीव्र  होता गया है, आत्म संघर्ष और द्वैत भी उतना प्रबल होता गया है।  शांता का युवा मुक्तिबोध के जीवन में गहरे आकर्षण की तरह प्रकट होना दर्ज है। शर्मीले मुक्तिबोध से वह बात करने लगी थी और निकट चली आयी थी। यह दुर्दम आकर्षण पतझर के पीले पत्तों के जग में अचानक वसन्त सा छा जाता है और झंझावात सा बहने लगता है। यहां मुक्तिबोध खुद को तोल्स्तोय के 'रेज़रेक्शन' के पन्नों पर अपने सपनों और विचारों की दुनिया में जीने वाले नेख्लोदोव  के रूप में पहचानते हैं। शांता उन्हें आधी नौकरानी और आधी कुलीन कात्यूशा सी लगती।

इसी स्तर पर मुक्तिबोध की आत्मा की 'दुइ' का भी प्रतिफलन हुआ है- आकर्षण-विकर्षण, आवेग-कायरता और कल्पना और यथार्थ के धरातल पर। शांताबाई के समानांतर एक काल्पनिक प्रेमिका का अस्तित्व भी तनाव पैदा करता है। 'मैं' दैहिक आवेशों को लेकर नैतिक दुविधा से भी परेशान होता है।

'वह मेरी कल्पना और 19-20 साल की युवावस्था के बीच एक समस्या सी बन गई थी….।'

'मैं' कल्पना और ठोस वास्तविकता में तालमेल नहीं बैठा पाता है और डिस्टर्ब हो जाता है। 

अर्थात यौवन का चिह्न बनता है अस्थिर मानस, मन की कई कई दिशाओं में विभक्ति और गति। 'जैसे एक ही समय में 'मैं' कई आदमियों में रूपांतरित हो जाता। एक सुख स्वप्न देखता, दूसरा सुनहरी यादों में डूबता, तीसरा परिवर्तन चाहता, 'मैं' तिनके सा धूल के सिर पर उड़ता- कभी तरल अवसाद के आंसू बहाता, कभी मरुभूमि सा जलता तो कभी पीले उदास पत्तों सा बिखरता।' 

 मुक्तिबोध के कवि व्यक्तित्व की रचना के मूल में उनकी अंतर्मुखता और उनकी आत्मछवियां, सामान्य जीवन से उनकी पार्थक्य भावना, उनकी आत्मलीनता और कल्पनाशीलता और आत्मान्वेषण की खोज और व्याख्या हुई है। वहीं उनके मित्र संसार में पैठकर उनकी चर्चाओं, उनकी साहित्यिक रीडिंग्ज़, उनके प्रभाव, विभिन्न काव्यादर्शों और काव्यान्दोलनों पर चर्चाएँ , वैचारिक मंथन और बहसें भी भास्वरता से उभरती हैं। शायद एक रचनाकार की आत्मकथा में उसकी रचनात्मक मनोभूमियों की तलाश  कर पाना सबसे बड़ी उपलब्धि होती है। और उससे भी बड़ी बात है एक तरफ भोगे गए जीवन के अनुभव और दूसरी तरफ उसके साहित्य एवं कला जीवन में संबंधों की तलाश कर पाना। यहाँ कवि लेखक मुक्तिबोध के साथ-साथ उनके समकालीनों का संसार भी उभरता है और उस समय के साहित्य-सांस्कृतिक माहौल से भी पाठक  का साक्षात्कार  होता है। 

रचना की मनोभूमि में आत्मकथाकार ने कवि की आत्मा के द्वैत या दुई की चर्चा बार-बार की है - 'मैं ऐसे समय में एक नहीं रह पाता, एक 'मैं' नायक बना उड़ा करता, दूसरा 'मैं' गंभीर बना अलगाव बनाए रखता। एक आंतरिक काल्पनिक जीवन था जो फैलता रहने वाला था, उड़ता रहने वाला, दूसरी तरफ बाहर का मन और अभिव्यक्ति सिमटती जाती, सिकुड़ती रहती।' 

तोलस्तोय से लेकर दोस्तोएव्स्की और शेक्सपीयर और प्रसाद से लेकर प्रेमचंद तक में खुद की छायाएं देखने वाला कवि-व्यक्तित्व संसार से गहरे पार्थक्य की चेतना से भी ग्रस्त रहा है। दोस्तोएव्स्की का ईडियट पढ़कर उसे लगता, 'इस सभ्य दुनिया में मूर्ख, महामूर्ख मैं ही हूं।' तोलस्तोय के नेख्लदोव के दर्पण में खुद से उनका साक्षात्कार होता है। 

आंतरिक रूप से बहुत गहरे जुड़े होकर भी एक धरातल पर पृथकता का अनुभव या बोध परिवार के प्रिय जनों, मित्रों तक ही नहीं, वरन अपने ख्यालों, विचारों के संदर्भ में भी है। 'मैं अपने कमरे में सबसे पृथक् हूं। भीतर आने का कोई साहस नहीं करता। …विचार भी अलग-थलग खड़े होकर मानो दरवाजे से झांकते हैं, मेरे भीतर दाखिल नहीं हो पाते।' 

व्यक्ति और व्यक्ति के बीच की भी दूरियाँ और चिलचिलाते फासलों की बात उनकी कविताओं में बार-बार आती है। यहाँ तक कि मित्रों के बीच भी यह एहसास जब-तब उभर आता है, खटकता रहता है, पीड़ित करता है। भाषा में भी यह प्रतिफलित होता है -    

'एक ही भाषा, एक ही अभिधार्थ होते हुए भी ध्वन्यार्थ अलग अलग हो जाते हैं ।'

लेकिन कवि का दूसरा मन इन दूरियों का अतिक्रमण करना चाहता है । बचपन में मां की थपकियों में जो दूरियां विलीन हो जाती थीं- इतिहास की दूरियाँ भी माँ की कही कहानियों में पट जाती थीं, कुछ वैसे ही मनुष्य और मनुष्य के बीच फासलों को पाट देने वाला एक मन था, जो अपनी अगतिकता और अस्तित्व रक्षा की कैद से ऊपर उठ जाना चाहता था।      

मुक्तिबोध के संबंधों का एक नितांत भीतरी दायरा है, जहां धर्मनिष्ठ और नेक पिता का हार्दिक अधिकार है, वात्सल्यमूर्ति मां का चमत्कारी ममत्व है। मुक्तिबोध को प्रेमचंद का संस्कार देने वाली मां रंगभूमि के किसान सी है, छोटा भाई शरद वान गॉग और उसके भाई थियो के अटूट रिश्ते में बंधा सा है। पत्नी शांता और बच्चों की दुर्दशा मुक्तिबोध को बार बार आत्मग्लानि के कुएं में धकेल देती है।     

मुक्तिबोध के मित्र संसार और उनके बीच के संवादों का अंकन जिस तरह  और जितने विस्तार, जीवन्तता और गहनता से हुआ है, वह वास्तव में ही अप्रतिम है। नेमिचन्द्र जैन तो मुक्तिबोध की आत्मा के सबसे करीबी सहचर मित्र रहे। दूर रह कर  भी  उनसे  निरंतर पत्रव्यवहार  में मुक्तिबोध की सबसे आंतरिक वेदनाएँ वाणी पाती हैं। घोर दरिद्रता, आत्मग्लानि और व्यर्थता बोध, कर्ज़ से लेकर तमाम  तरह की अंतरंग स्वीकारोक्तियाँ इन पत्रों की इबारत में खुल खुल जाती हैं। मुक्तिबोध लिखते हैं कि नेमि जी ही उनका सम्बन्ध जीवन की ठोस वास्तविकता से कराते थे।

'मुझे बाहर की वृहत्तर दुनिया से जोड़ते हैं- ठोस सच्चाइयों से मेरा नाता जोड़ते हैं।'

उन्ही की बदौलत मुक्तिबोध मार्क्सवादी बने अर्थात मुक्तिबोध को भावी क्रांति का सपना दिखाने वाले, उनकी विचारधारा को निर्मित करने का श्रेय भी उन्हें ही प्राप्त है।

'मैंने दुनिया भर का साहित्य पढ़ा था, भौतिकवाद की ओर रुझान भी था, पर था मैं कोरा कलाकार ही, बौद्धिक और मानसिक उहापोह से ग्रस्त, अपने भोले भाव में पूरा रोमांटिक।'

यहीं मराठी भाषी हिंदी कवि प्रभाकर माचवे  हैं, शमशेर बहादुर सिंह  हैं, बनारस में  त्रिलोचन हैं, नरेश मेहता हैं। और सबसे खूबसूरत और महत्वपूर्ण वर्णन हैं जहाँ गहरी रोमानी और मृदुल चेतन के कवि वीरेंद्र जैन के सानिध्य में मुक्तिबोध का भिन्न किस्म का काव्य एस्थेटिक्स आकार ग्रहण करता हैउज्जैन के होल्कर कॉलेज में पढ़ते हुए रवींद्र जैन जैसे कोमल, स्वप्नजीवी और अतिअभिजात कलाकार के माध्यम से मुक्तिबोध रवीन्द्र के छायालोक में ही नहीं, कालिदास, कीट्स, बायरन,  येट्स और टॉमस हार्डी  के मनोलोक में प्रवेश  करते हैं, छायावादी चेतना और काव्यादर्श के दर्शन करते हैं। आत्मकथा के ये अंश खासे दिलचस्प हैं, जहाँ दो भिन्न तरह के लोग एक दूसरे से आकर्षित विकर्षित होते रहते हैं। वीरेंद्र मुक्तिबोध की कविता में पीले रंग के बाहुल्य, मराठी भाषी होकर भी हिंदी के संस्कार और शिल्प के प्रशंसक थे। वे खुद वीतराग से दिखते, मृत्यु और प्रकृति की सौन्दर्यगाहों पर लिखते, जबकि मुक्तिबोध हर प्रवृत्ति, हर चीज़  हर पात्र की सामाजिक व्याख्याएँ करते। उनकी कविता विविधता के गहरे बोध को तलाशा करती। वे खुद को अजीब रहस्यलोकों का नागरिक कहते।

 'मेरी कविता-यात्रा ध्वंसावशेषों और पुरातत्व से अपने रूपक और बिम्ब तलाश किया करती।'

 आत्मप्रदर्शन से बिल्कुल शून्य, बल्कि बेसलीका जीवन जीने वाले मुक्तिबोध का काव्य बोध खुरदुरा, लापरवाह और रगेडनेस लिए हुए था। 

इन मित्रों की चर्चाओं में एक ओर अरविंद, रवीन्द्र, परमहँस और विवेकानंद उभरते तो दूसरी ओर लेनिन, मार्क्स और स्तालिन। इन युगपुरुषों के साथ साथ मन के अवचेतन के गहरे तलों में प्रवेश करने वाले फ्रॉयड, एडलर, और बर्गसां भी उपस्थित रहते। वेदांत पर, पातंजल योग और समाधि पर, मित्र व्यास से गहरी चर्चाएँ होतीं, सायकोएनालिसिस की दुनिया में प्रवेश होता। 

यों कवि और कविता तो आकार ग्रहण करती रही, निखरती गई, पर जीवन यथार्थ की विद्रूपता और विकटता कम होने के बजाय बढ़ती ही चली गई । चित्रकार विंसेंट वैन गॉग की ही तरह मुक्तिबोध को एक त्रासदीय नायक बनाने में उसने शायद ही कोई कसर छोड़ी हो। संसार और उनके बीच बेबनाव और अनबन का अहसास बढ़ता ही गया। परिवार के भीतर, जगह जगह की नौकरियों में, वैचारिकताओं में। वर्तमान और भविष्य के कई कई डरावने चेहरे और रूप उनकी आत्मा को दबोच लेते।

'मैं उनसे लड़ता हूँ। जीवन मे सहज दिखने की कोशिश करता हूँ … '

'क्योंकि जीवन की विडम्बनाओं में जीने का आदी हो गया हूँ । .. लेकिन एक मन्द ध्वनि, सतह के नीचे गहरी अंतर्व्यथा की एक नदी की धीमी आवाज़ मुझे जगाए रहती है। मैं मूर्ख नहीं, उत्पीड़ित और संतप्त हूँ।'

बस एक मात्र प्राप्ति यह है 'भीतर का तमाम दुख और पीड़ा काव्य के, साहित्य के, बिंदु में विलीन होने लगते हैं।' 'मेरा लेखन ही ही मेरा सुरक्षा गृह है।' 

जिस तरह दोस्तोएव्स्की ने अपने अजीब जीवन के अनुभवों को रचनाओं में बदला था, दार्शनिक धुन्ध के बीच आत्म संघर्ष किया था, उसी तरह मुक्तिबोध भी दुखों और संघर्ष भरे जीवन को निरंतर अपनी लेखकीय मानसिकता में ढालते रहे, अपने आसुंओं से प्रेम बेल सींचते रहे। 

मुक्तिबोध की आत्मकथा, विष्णुचंद्र शर्मा,
संवाद प्रकाशन, मेरठ

शनिवार, मार्च 21, 2026

अन्तर्मन का महाकाव्य : तत्सम

 


पिछले दिनों अप्रतिम कथाकार राजी सेठ हमारे बीच नहीं रहीं। उनके पहले उपन्यास तत्सम पर सुमनिका सेठी का यह लेख उनकी स्मृति को अर्पित है। यह स्त्री दर्पण के ताजा अंक में छपा है। ऊपर दिया गया चित्र भी सुमनिका ने बनाया है - कागज पर जली हुई बाती की कालिख और पेंसिल से।  

अन्तर्मन का महाकाव्य : तत्सम

‘तत्सम’ राजी सेठ का पहला उपन्यास है। पढ़ते हुए लगता है कि राजी सेठ कितनी अलग तरह की लेखिका रहीं हैं। एक खास ब्रूडिंग किस्म की कैफियत। पढ़ते हुए उपन्यास की अनुभूति-प्रवणता, गहनता और दृष्टि-संपन्नता जितना विचलित करती है, उतना ही मंत्रमुग्ध भी। तिस पर अमूर्त और निराकार मन को, उसके हज़ारहा संवेदनों को, मूर्त और साकार कर देने की उनकी सहज क्षमता हैरान करती है। 

पढ़ते हुए अचानक मोहन राकेश की ‘मिस पाल’ कहानी की याद हो आई। जहां ‘मिस पाल’ कहानी का नैरेटर एक खास दूरी और कुछ नजदीक से उनके जीवन की  छोटी-छोटी बातों, चेहरे की आती जाती छायाओं, चेष्टाओं,  जुमलों, व्यवहारों को देखता और उनका वर्णन करता है, और उसी से मिस पाल के जीवन के गहरे निर्वासन और एकाकीपन की विडम्बना को उभार देता है। यानी  बहिरंग से अंतरंग की उजाड़ता को ध्वनित कर देता है। लेकिन ‘तत्सम’ तो ऐसा लगता है कि जैसे सोच के रग-रेशों से बुना गया उपन्यास है। ऐसा तो नहीं कि उसमें बाह्य जीवन न हो।  है तो सब कुछ अंतर्ग्रथित ही, फिर भी इस सब की छाप वसुधा के मन के दर्पण में, चेतना के सरोवर में जिस तरह प्रतिबिम्बित होती है, जैसे वर्तुल बनाती है, अपने ही मन के भावों की जैसी पड़ताल वहाँ अंकित हुई है, वह अप्रतिम है। मन के सुबह-शाम, छाया-प्रकाश, जड़ता-निविड़ता,  भीति, हिचक,  निर्वेद, निर्वासन, टूटन से लेकर बसंत के फूटते अंखुओं तक, न जाने कितनी मुद्राएँ हैं वहाँ।   

यह कहानी वसुधा की है, एक ऐसी सुशिक्षित एवं अत्यंत सवेदनशील स्त्री की, जिसके जीवन में एक बड़ी दुर्घटना, एक्सिडेंट मे पति निखिल की अचानक मृत्यु, उसे जीवन की धुरी से उठा कर परिधि पर ला खड़ा करती है। सोचती थी कि पति के घर में ही रहेगी। पर वहाँ कुछ और सांसारिक चीज़ें और तनाव हैं जो रिश्तों से बड़े होने लगते हैं। तो वह बड़े भाई-भाभी के घर रहना चुनती है। इस घर में पिता की स्मृति है, वैधव्य के पहाड़ को उठाए उनुभवों की उसी पगडंडी पर आगे-आगे चलती अम्मा हैं और भाई-भाभी का परिवार है। वसुधा की होकर भी यह कथा, यह यात्रा, विवेक (पात्र) की भी है, आनंद की भी (पात्र), दुख के तरह तरह के चेहरों  की भी, भीतर जलते अलावों की, वसुधा की जीवन परिधि पर खड़े तमाम  पात्रों की समवेतता को भी उदग्रता में  समेटे हुए है। 

वसुधा अपने नाम की सूक्ष्म अर्थछायाओं जैसी है, घटनाओं, चीजों, अहसासों को अपने भीतर-भीतर मौन जज़्ब करने वाली, अमूर्त को न केवल महसूस करने वाली, वरन पहचान लेने वाली, बेहद आत्म सजग व्यक्तित्व। जिसे लेकर शरत भैया के ममतामयी भर्त्सना के शब्द हैं- ‘‘तू ज़रूर दुख पाएगी… ज़रा ज़मीन पर रहा कर।’’ उसमें कुछ अटपटा तो ज़रूर है जो वह गंधों और ध्वनियों को तितलियों के पंखों की तरह छू लेने को बेचैन हुई रहती है।  सूखते कपड़ों में वह धूप की गंध सूंघ लेती है, गीले पत्थरों पर बैठ पानी की शुचिता की गंध पहचानती है। ऐसी भाव-प्रवण वसुधा, नियति ने अपने क्रूर आघात से जिसकी संवेदना के स्रोत मानो कुंठित कर दिये हों, कि भीतर-भीतर जीवन ने पटाक्षेप कर दिया हो और वह किनारे की रेत में लगी एक नाव हो। जीवन और खेल में होकर भी नहीं होने का त्रासद अहसास। 

बहिरंग जीवन और अंतरंग के बीच की फांक के इन्हीं विरोधाभासों से राजी सेठ ने वसुधा की जागतिक नियति को सिचुएट किया है। चटख रंगों वाले, कोलाहलमय और प्रगल्भ संसार के बरक्स वसुधा के फीके, उदास रंग और मौन। लेकिन युद्ध के मैदान केवल निजी ही नहीं हैं। वहाँ परिधि के संसार से भी निरंतर जूझना है, जिसमें उसके अपने घर की सावधान हवा से लेकर बाहरी जगत के युद्ध भी हैं। 

उपन्यास की शुरुआत ही युवा समारोह की उद्दाम सामूहिकता से होती है। वहाँ मेले जैसा उछाह है, चारों ओर बहता जीवन का आवेग, जिसमें वसुधा अकेलापन और निर्वासन कुछ और उघड़ आता है। लेकिन फिर यहीं से अपने जैसे उस एक व्यक्ति के अंतरंग का साक्षात्कार भी होता है, यानी विवेक के भीतर के जलते हुए अलाव, आत्म, यातना, गहरे अपराधबोध के अनुभव। 

निश्चय ही यह विधवा विवाह या पुनर्विवाह की सामाजिक समस्या का उपन्यास तो नहीं ही है, जहां समाज के रूढ़ विधानों से जूझने की, उन्हें भंजित करने की बात हो। यहाँ तो व्यक्ति का अपना स्पेस, अपना चुनाव, अपनी चेतना, अपने विश्वास को पाने की बात है। शायद यह उससे आगे का धरातल और अंतराल है, जहां दूसरों के दिये समाधानों की पराधीनता भी न हो । 

लेकिन दूसरी ओर रूढ़ सांस्कृतिक कंडीशनिंग के सत्य को भी नकारा नहीं गया है। स्वयं वसुधा की माँ में इस तरह के अवरोध अवशिष्ट हैं। लेकिन दूसरी ओर वसुधा को जीवन में जैसे तैसे अकमोडेट करने की भाई-भाभी की कोशिशें भी मानसिक अतिचार बन जाती हैं, वसुधा के स्वत्व का, उसकी आत्मा का हनन ही करती हैं। 

विदेशी शोध छात्रा रूथ का एक भिन्न सांस्कृतिक दृष्टिकोण और परिप्रेक्ष्य है। वह खुद भी अनाथ थी पर उसके व्यक्तित्व पर दुर्भाग्य की छायाएँ न थीं, और नहीं थी किन्हीं विश्वासों की जकड़न। बौद्धिक बहस में उसकी आक्रामकता वसुधा को डिफ़ेंसिव बना देती थी। भारतीय संस्कार त्याग और तृष्णा को जीतने को महत मानता है पर रूथ दुख से लड़ने की तैयारी और सामान्यता की बात करती थी। समझौता नहीं वरन संभावनाओं के प्रति खुले रहने की बात। 

शरत भैया ऐसे ही दृष्टिकोण के भारतीय प्रतिरूप हैं। वे विज्ञापनों के जरिये आधुनिक और उदार विचारों वाला वर खोजने मे लगे हैं, और वसुधा से जड़ता और उदासीनता त्याग कर सहयोग की अपेक्षा रखते हैं। वसुधा को वितृष्णा ही अधिक होती है, क्योंकि निखिल के साथ बीता जीवन उसकी मृत्यु के साथ समाप्त नहीं हुआ है उसके लिए। फिर धूप और  पानी की गंध पहचानने वाली वसुधा के लिए दिखावे और  लोलुपता की  छुपी हुई दुर्गंध पहचानना  बिलकुल मुश्किल नहीं। शायद हितचिंतक अपने उद्धारक जोश में यह सब नहीं देख पाते। या फिर उन्हे भी लगता है कि वसुधा को चयन का वैसा अधिकार नहीं। राजी सेठ ने पुरुष प्रत्याशियों की बदनीयती का जैसा चित्रण किया है, उसकी मिसाल कम ही मिलेगी। यहां कड़वे यथार्थ की परतें खुलने लगती हैं।  

“अखरती है उसे आत्ममुग्ध श्रेष्ठ भाव की खास मर्दानी गंध। उद्धार करने की जोश-खरोश भरी आर्यसमाजी शिद्दत … अखरता है वयस्कता की चौखट पर खड़े लड़कपन का फूहड़ दिखावा। भरी पूरी जिंदगी जी लेने के बाद भी लार टपकती तृष्णा। बच्चों की ज़रूरत की आड़ में देह की हवस को आज़मा लेने की भूख। अपने से बाहर इस तरह छलकते जाने की कोशिश।” (तत्सम पृष्ठ 45) 

यहां पुरुष समाज की मंशाओं की रेंज प्रकट होती है। एक आए थे जिन्हें बच्चों की माँ चाहिए थी, किसी को कमाऊ औरत, किसी को निवृत्ति के बाद समय काटू जिंस की जरूरत, तो किसी को अपनी देह की चुप्पी को आज़मा लेने की हौंस।  

इन सबके बीच बड़े प्रखर पैने विचारजीवी का किंचित दीर्घ और क्रमिक वर्णन तो वाकई अचूक है। उनकी आत्म प्रभुता की आंच में सिके पत्र, बाहरी मुखौटों और उपाधियों के भीतर वही भुक्खड़ लंपटता ....। वे विवाहित हैं पर गुप्त रूप से दूसरा विवाह करना चाहते हैं, क्योंकि वे सार्त्र के समान हैं, विचार के लिए ही जीते हैं- ‘‘यू केन होल्ड वेल … माइ बॉडी एंड माइंड’’।

ऐसे ही तमाम लोगों की भीड़ से परे जब एक दिन राजीव के साथ विवेक घर आता है … इतना सहज और आत्मीय, सभ्य सी मृदुलता … न मुद्रा में कोई उत्तेजना, न हाथों पैरों में बेवजह हरकत। आँखों मे कुछ ऐसा है जो उन्हें चेहरे से अलगा देता है। और फिर ''नहीं'' शब्द के प्रयोग का यह दोहरा इस्तेमाल खासा रोचक है। ‘‘उछाल उबाल नहीं, अभद्र जिज्ञासा नहीं, कोई बहुत निजी बात नहीं, एकांत का आग्रह नहीं, प्रश्नों की कुल्हाड़ी हाथ में नहीं ।” 

राजी सेठ की भाषा बहुत सक्षम  है, भीतर बाहर हर जगह विचरण करती सी। बिम्बों और बेहद नए सादृश्यों से भरपूर, सांगरूपकों वाला काव्यात्मक गद्य। उनके वर्णन, उनके बिम्ब कब गहरी अर्थ ध्वनियों में गूंज उठते हैं, पता नहीं चलता। कारण वे इतने ऑर्गेनिक और स्वाभाविक होते हैं कि कई प्रतीतियाँ साथ-साथ होती हैं,  बुझी हुई पर्वाग्नि का बिम्ब हो या लकड़ी उठा के उसको छेड़ देना हो, तम्बू का अंधेरा अंतरन्ग हो,  मुसाफिर खाना,  खिड़की, घर, आरामकुर्सी की खोज। राजी सेठ  रुदन शब्द नहीं लिखतीं। पाठक मुद्रा और संकेत को पकड़ लें तो उसके सामने रुदन साकार हो जाएगा। वह छवियाँ गढ़ती हैं। साहचर्यों में भूदृश्य, शहरों के भाग, वास्तु खंड यों ही चले आते हैं। खैर। 

तो विवेक से मिलने के बाद एक अचंभा सा उदित होता है। चेतना में जैसे कोई आँधी तूफान धीरे-धीरे थमने लगे और आकाश निराछन्न होने लगे। जैसे ‘प्रगल्भ’ शब्द बीच बीच में प्रकट होता है (नकारात्मक अर्थों में), वैसे निराछन्न भी ‘तत्सम’ में प्रकट होता है। वसुधा हैरान है अपने मन की सुगबुगाहट पर … कठिन कठोर घाटियों में नर्म फाहों से बादल कब कैसे घुस आए पता नहीं, कब अशरीरी जिजीविषा ने देह पा ली।     

लेकिन दूसरी तरफ तो ऐसा कोई भाव नहीं। जब वसुधा के सान्निध्य में विवेक के भीतर छुपा दुख बाहर आता है, तो एक सा होकर भी वह किंचित भिन्न भी है। शीरीन की रक्षा न कर पाने का गहरा अपराधबोध। ऐसा दुख जहां अपने लिए न कोई क्षमा है न मुक्ति चाहने  की ज़रा भी छूट। पैरों के ठीक नीचे जैसे कोई कब्र हो और उसी में जीवन की इच्छा और जज़्बा  भी। वसुधा उसे इस आत्म-प्रताड़ना से बाहर लाना चाहती है। ऐसा भी नहीं कि विवेक उसकी ओर खिंचता न हो, पर उस नैतिक स्थायी भाव के दबाव से मुक्त होना विवेक को  दुष्कर लगता है। न तो छोड़ पाना, न स्वीकार भाव। सपने में दिखता है वसुधा को, रेतीले विस्तार मे बस एक बंद दरवाजा। जिसके आर-पार का शून्य तो दिखता है, तेज़ हवाओं में दरवाजा कांपता है, उसे थामने वाली दीवारें गिर जाती हैं पर दरवाजा झूलता रहता है। 

विवेक में है गहरी आत्मीयता, वसुधा की चिंता और संवाद की कोशिश…  पर ऐन मौके पर पलायन। विवेक उसकी नहीं अपनी अवहेलना कर रहा है, इतना वह समझ चुकी है, पर बार-बार का आघात उसे तोड़ डालता है। उसका स्वत्व छिन्न-भिन्न हो गया है। और वह अपने जीवन में लौट आती है, भीतर से पूरी तरह अवसन्न और आत्मग्लानि की लज्जा में आकंठ डूबी हुई। 

लाइब्रेरी से घर लौटने में जो रिक्शा मिला वह ‘भी’ कुछ अधिक खड़खड़ा रहा था। जैसे उसका पूरा अस्तित्व। दीखता हुआ आगे का रास्ता… सब कुछ जहां परिचित और पूर्व अनुमानित है, कदम-कदम, चप्पा-चप्पा। एक दुःसह किस्म की निश्चितता..... वह इस सब से कहीं दूर निकल जाना चाहती है, रिश्तों और घर की कारा से दूर, अकेलेपन से परे, पहचान से परे, अपेक्षाओं से परे। 

इस अलांघ अलाव को कूद कर पार जाने को वह दक्षिण की यात्रा पर निकल जाती है अकेली। जैसे विराट में आत्म को विसर्जित कर देना चाहती हो। यह कोई पड़ाव है उसकी भीतरी यात्रा का .... जहां खो कर शायद खुद को पा सके। और सचमुच अचानक काले पत्थर की विवेकानंद की छवि को निहारते एकाएक आत्म रहित होकर बहने लगती है भीतर सोयी हुई पीड़ा। क्या ऐसे होते हैं विराट के अदृश्य हाथ? 

बंदीपुर का गेस्ट हाउस, जहां भोजन विष बन गया है, वसुधा वमन कर रही है, और मरणासन्न है, निढाल, कि फिर कुछ हाथ हैं जो उसे उबारने को बढ़ आते हैं। वही हाथ उसे अपनी गाड़ी में लेकर हस्पताल पहुँचाते हैं। ये हाथ आनंद के हैं। 

देह, मन, प्राण सब जैसे खाली से, पर फिर सलाइन और ग्लूकोस की बूंद-बूंद की तरह कोई उसे, उसकी जिजीविषा को जिलाने की कोशिशों में जुटा है। लेकिन वसुधा डरी हुई है। आनंद उस पर कुछ थोप नहीं रहा, पर उसका कहना है कि वसुधा को देखते ही वह पहचान गया था। “एक सुपर कांशेस होती है जो बताती रहती है .... तुम्हें देखकर … हालांकि तुम्हें जब देखा था यू वर इन हॉरिबल शेप। हेल्प, केयर, अटेंडेंस सब चाहिए था तुम्हें। पहचान की उस एक्सटेसी की भागीदार तुम नहीं हो सकती थी….’’ 

और फिर आनंद से लंबे संवाद, वसुधा को हैरत है उसके जीवन के निष्कर्षों पर, जो अधिकतर सिद्धान्त नहीं अनुभव से उपजे हैं। आनंद का अभय, उसका ठहराव, उसकी वत्सलता, सीधे कनफेशंस और दुख से परे जाने का ढब…। सब वसुधा में भी ठहर जा रहें हैं। कोई निर्णय, कोई चुनाव जन्म ले रहा है, पहचान से उपजा भाव।  

वह घर लौटी है, कुछ भिन्न भाव से इस बार। पर अब विवेक के पत्र उसकी बाट जोह रहे हैं। उनमें पुकार है, पुकार के प्रत्युत्तर की प्रबल चाह है। 

लेकिन अपने चैतन्य तक पहुंची वसुधा निखिल के बाद अब विवेक से जुड़े अतीत का भी अतिक्रमण करती हुई यहाँ तक आई है। वह कृतज्ञ है विवेक की, जिसके कारण जिजीविषा का संस्पर्श आत्म को मिल पाया और शाप-मुक्ति हो सकी। 


‘तत्सम’ इसीलिए एक महाकाव्यत्मक उपन्यास बन जाता है कि इसमें न जाने कितने आयाम समाहित हैं। समाज के अनेक कोण, अनेक पात्र, हर पात्र के अपने निजी वृत्त, अपने-अपने दुख, अपनी जटिल गतियाँ और लय। फिर भी किसी एक धरातल पर, अनुभव के धरातल के शिखरों पर पहुँच कर, वे एक दूसरे के जैसे होने लगते हैं। मानवीय अनुभव की यात्रा समाजशास्त्र और दर्शन के सिद्धांतों की मोहताज नहीं। यद्यपि यहाँ उपन्यास में वे सब अंग-रूप में समाए हुए हैं। साहित्य-कृति दर्शन और समाजशास्त्र का उपनिवेश बनने से बच गई है।
 

सुमनिका सेठी 

बुधवार, मई 07, 2025

शिल्प और काव्यकला : परस्पर संवाद

 

 


शिल्प और काव्यकला : परस्पर संवाद

शिल्प और काव्यकला के बीच परस्पर संवाद करता हुआ यह पत्र पिछले वर्ष यानी 2024 में कविता मुंबई की संगोष्ठी में प्रस्तुत किया गया था। यह उनकी पत्रिका में भी प्रकाशित हुआ है।  


कभी सोच के देखें कि तरह तरह की कलाओं का अस्तित्व आखिर है ही क्यों। क्यों नहीं कोई एक ही कला सब कुछ समेट ले । लेकिन यह सम्भव नहीं दिखता। विभिन्न कलाओं के होने का कारण ही शायद यह है कि यह जीवन इतना परिपूर्ण, इतना समग्र है, उसमें इतने आयाम हैं, इतने पक्ष हैं कि हर कला अपने विलक्षण अंदाज़ में जीवन की व्याख्या अपने निजी ढंग से करती है। जीवन के सार तत्व को अपनी अपनी विशिष्ट भाषा, निजी व्याकरण में ढालती है। यह दुनिया तो एक ही है पर उसी एक दुनिया में संगीतज्ञ संगीत के संयोजन सुना करता है, चित्रकार रंग-वर्णों के संयोजन देखा करता है, रेखाओं के साथ बहता रहता है। हर कला  इसीलिए बेहद ज़रूरी है कि वह ऐसा कुछ मौलिक अनुभव देती है, जीवन का विशिष्ट सौन्दर्यबोधात्मक दर्शन कराती है, संज्ञान कराती है, और कल्पना को उद्भुद्ध करती है जो उस रूप में दूसरी कला नहीं कर सकती। और यों सब कलाएँ मिल कर ही इस जीवन की समृद्धि और जटिल सौंदर्य को प्रतीकित करती हैं, रचती हैं।

लेकिन फिर इन कलाओं  में आपसी रिश्ते भी हैं, साम्यताएँ भी हैं, इनमें परस्पर सम्वाद भी होता है, आपसी आकर्षण और प्रतिस्पर्धाएँ भी हैं, आंतरिक नज़दीकियाँ और दूरियाँ भी हैं। भारतीय कला-परंपरा में भी अक्सर कुछ कला युग्म मिलते हैं जैसे काव्य-चित्र, काव्य-संगीत, काव्य-नाट्य, शिल्प और वास्तु, चित्र एवं शिल्प इत्यादि।  यानी हर कला किसी न किसी बिंदु पर दूसरी में प्रवाहित हो जाती है। कब कोई इम्प्रेश्निस्ट चित्र अपने वर्णों के सामंजस्य में, हारमनी में, संगीत हो जाता है, और फिर कितनी भी मूर्त कला हो, शायद हर कला संगीत की तरह अमूर्त होने की कामना रखती ही है। शिल्पकला को शायद इसीलिए ‘फ्रोजेन म्यूजिक’ कहा जाता है।

तो जब मैंने अपना प्रदत्त विषय पढ़ा, अर्थात मूर्ति और काव्य के सम्बंध.. तो मैं एकबारगी अचकचा गई। पहली नज़र में यह लगा कि ये दो कलाएँ तो ललित कलाओं के स्पेक्ट्रम में, उनके विस्तार में काफी दूर दूर हैं- लगभग दो सिरों पर, बल्कि ध्रुवों पर खड़ी हैं। लेकिन जब सोचना शुरू किया तो लगा कि यद्यपि दूरी हो सकती है पर दोनों में परस्पर संवाद तो होता आया है, तरह तरह से।

                                                                                  *

मूर्तिकला और चित्रकला जैसी दृश्यकलाएँ प्राचीनतम कलाएँ मानी जाती हैं, शिल्पकला तो प्रागैतिहासिक काल की है। पाषाणकाल में जब मनुष्य ने पत्थर घिस घिस कर औज़ार बनाए थे तब वह शिल्पकला के अन्तराल में प्रविष्ट हो चुका था।

मूर्तिकला या शिल्पकला का माध्यम भी पाँचों ललित कलाओं में सबसे अधिक कठोर है, कठिन है, श्रम एवं कौशल साध्य है। माध्यम की प्रकृति के अनुरूप ही उसके औज़ार (टूल्स) भी हैं जैसे हथौड़ी, छेनी, विभिन्न तरह के चाकू इत्यादि। और फिर माध्यम में तरह तरह की प्रकृति और रंग वर्ण के पाषाण, धातुएँ, काष्ठ, मिट्टी इस फिर मोम.... 

दूसरी ओर साहित्य या काव्यकला का माध्यम  बेहद नमनीय है- अर्थात शब्द एवं भाषा जो  कदापि अपरिष्कृत या ‘रॉ’ नहीं है। वह तो पहले ही से अर्थवान है, एक  रचित व्यवस्था है, संकेतों की, रेडियम की तरह रेडियोएक्टिव, जीवित, सप्राण, निरन्तर आकार लेती, बदलती, जेनेरेटिव प्रकृति वाली। शब्द और भाषा की उत्पत्ति सामाजिक तहों से होती है अतः  उसकी प्रकृति सामाजिक है।  कवि उस पर  एक स्वर्णकार की तरह काम करता है। शब्द के संयोजनों, बिम्बों, प्रतीकों , वाक्यों को रचता है।  शब्द जिसमे पहले ही से कमसकम तीन आयाम तो होते ही हैं -शब्द का अभिधात्मक अर्थ, उसका नाद गुण और  फिर उसके साथ अर्थ की मनोवैज्ञानिक छायाएँ भी शब्द में ही समाई होती हैं। कभी काव्य को श्रव्य कलाओं में गिना जाता था लेकिन दीर्घ समयक्रम ने  इसे पाठ्य बना दिया है, और  पुस्तक के पृष्ठ पर छपी हुई कविता का एक भौतिक रूप या  स्ट्रक्चर  भी होता है। 

फिर शिल्पकला और काव्यकला का एक बड़ा भेद स्थानिक और कालिक कला का भेद भी है। शिल्पकला को  स्थानिक या (spatial) कला कहा जाता  है, क्योंकि यह एक स्थान में आकार लेती है, स्थान को घेरती या भरती है, बल्कि कहना चाहिए कि एक स्थान को अपने रूपाकार से परिभाषित कर देती है। और वही क्यों वरन उस स्थान के चहुंओर के स्पेस को भी जीवंत बना देती है।  चित्र कला की तरह यह नयनों का विषय तो है ही, अतः यह  दृश्यकला है और प्लास्टिक आर्ट अर्थात सुनम्य कला भी है, यानी जीवन के अनेक रूपों को  त्रिआयामी छवियों में ढालने वाली, आयतन  या  वॉल्यूम में ढलने वाली कला। शायद इसीलिए जीवन रूपों के यह सबसे अधिक निकट भी तो है। 

 दूसरी ओर काव्य, संगीत, नृत्य और नाट्य आदि कलाएँ कालिक या (टेम्पोरल) कलाएँ कहलाती हैं- यानी समय में गतिमान, आशंसक के सम्मुख क्रमशः प्रकट होती हुईं, आकार ग्रहण करती हुईं, अनुक्रम में (सीक्वेंस), शब्द दर शब्द, पंक्ति दर पंक्ति, सम्वाद दर सम्वाद …..

यानी एक साथ या सहक्रम में प्रकट न होकर धीरे धीरे प्रकट होती हैं।

शिल्पकला  की अपील भाषा-भेद की दीवारों से परे बेहद आद्य (आदिम) और वैश्विक है, बहुत हद तक उम्र और संस्कृतियों के विभाजनों से भी परे… क्योंकि उस के पास चित्रभाषा है, देह भाषा है, मुद्रा और भंगिमा की भाषा है। ऐसे तो  जीवन-जगत का हर रूप शिल्पकला का विषय है पर सब से केंद्रीय विषय तो मनुष्य ही है। मनुष्य  रूप शिल्पकला का इकलौता विषय नहीं पर फिर भी नाभिक तो ज़रूर रहा आया है, यों वहां पशु रूप हैं, वानस्पतिक रूप हैं, अनेक दैनिक उपादान या फिर काल्पनिक और मिथकीय रूप भी अपनी विशिष्ट भंगिमाएँ लिए खड़े मिलते हैं- हमारी तमाम इंद्रियों के सम्मुख। नयन तो नयन, हमारी स्पर्श सम्वेदनाओं के सम्मुख भी। शायद इसीलिए शिल्प कृतियों को देख कर उन्हें स्पर्श करने की लालसा होती है, और शायद  इस स्पर्श सम्वेदना  के  कारण ही इम्प्रेशनिस्ट चित्रकार एडगर डेगास ने इसे ‘ब्लाइंड मैन’स आर्ट’ कहा था। अर्थात यहाँ हमारा सामना एक भौतिक, ‘लगभग’ जीवित उपस्थिति से होता है, जिसे अनदेखा करना संभव नहीं हो पाता।

शिल्पकला जीवन के एक अचल क्षण  को मूर्तिमान करती है, लेकिन  इस स्तब्ध क्षण में सदा गति अंतर्निहित होती है, अभिव्यंजित होती है। अर्थात यह एक  क्षण, अचल क्षण, अपने में बेहद प्रातिनिधिक, बेहद नाटकीय क्षण हो सकता है या फिर इस मूर्ति में ढलते ही नाटकीय हो जाता है। यह कंप्रेस्ड क्षण  किसी वृत्तांत का एक बिंदु हो सकता है, जीवन -प्रवाह की श्रृंखला का एक ऐसा क्षण जिसमें भूत और भविष्य की छाप भी है। तो एक रूप में स्पेशियल (स्थानिक) होकर भी  समय यहाँ निबद्ध है। फिर एक रूप (फॉर्म)  तमाम तरह की दैहिक और मानसिक गतियों और मुद्राओं का भी धारक तो  होता ही है।  आधुनिक शिल्पकला के जनक कहे  जाने वाले  फ्रांसीसी शिल्पकार अगस्ट रोदां (1840-1917) मनुष्य के भीतरी, अबूझ, अदृश्य भावनात्मक संसार तक  शिल्प के माध्यम से पहुंचना चाहते थे।  अपने जगत प्रसिद्ध  शाहकार ‘थिंकर’ शिल्प कृति के बारे में उनका कहना था कि उनका चिंतक केवल मस्तिष्क से,  माथे की आपस मे गुथी भवों से, अपने कसे हुए होठों से ही नहीं सोच रहा वरन अपनी बाहों, पीठ  और पैरों  की तमाम  पेशियों से और अपनी भिंची मुट्ठी और  पैर के अंगूठों तक से सोच  रहा है। देह का कोई भी हिस्सा भावनात्मक अभिव्यंजना से शून्य नहीं, वरन सम्पूर्ण  का प्रतिनिधित्व कर सकता है। इसीलिए रोदां  ने मनुष्य के हाथों की  विभिन्न भंगिमाओं से  मनुष्य के आंतर  संसार को अभिव्यक्त किया है।

देखिए…



शिल्प में गति के कितने रूप हो सकते हैं, उसके अनेक उदाहरण लिए जा सकते हैं।

        रोम से प्राप्त लोआकून एवं उसके पुत्रों की विश्वविख्यात प्राचीन शिल्पकृति में एक ट्रोजन पुरोहित लोआकून और उसके बेटों को  दो बड़े समुद्री सर्प अपनी कुंडली में कसते जा रहें हैं और वे तीनों प्राणपण से मृत्यु की जकड़न  से जूझ रहे हैं। देखिए उनकी संघर्षरत, भीति से जकड़ी - कसमसाती देहें, आसन्न मृत्यु की यंत्रणा…


       इसी तरह माइकलएंजेलो की कृति ‘पिटी’ या ‘पीएटा’ (इतालवी) में कुमारी मेरी की गोद में पुत्र ईसा का  मृत शरीर,  गति के एक बिल्कुल अलग तरह के  आयाम  की अभिव्यंजना है।  मेरी  का झुका माथा, हर नक्श  दुख में जम सा गया  है, उसकी गोद मे बेटे की मृत देह  जैसे अभी अपनी प्राणहीनता  के भार से धरती पर फिसल जाएगी। मृत देह  के अंग-उपांग ही नहीं, रग रग  मरण को दृश्य बना रही है। ठहरी हुई ऐसी व्यथा की अभिव्यंजना कला की दुनिया में  दुर्लभ  ही है।


        गति का एक और रूपाकार स्मृति में है, लगभग हाथ भर का एक छोटा मानवाकार, बस कंडक्टर का रूप। न वहां बस अंकित हुई थी न सीट इत्यादि। बस कंडक्टर खड़ा था, मानो चलती बस में अपने दो पैरों को जमाए, स्थिर रह पाने, सन्तुलन साधने की देह मुद्रा में, अपना काम करता हुआ।

        और अगर यह कहें किशेषशायी विष्णु या समाधिस्थ शिव और  बुद्ध की ध्यान मुद्रा में गति का पूर्ण शमन है तो यह भी सच नहीं होगा, क्योंकि ध्यान और विश्रांति भी गति का एक पड़ाव है।

अब शिल्प और काव्य के संवाद की बात की जाए। कला इतिहास को पीछे मुड़ कर देखें तो रेनेसां पुरुष महान शिल्पकार मायकलेंजलो कवि भी थे। अगर दृष्यकलाओं का वे ऐसा चमकता सितारा न होते तो शायद हम उन्हें एक सोनेटकार के रूप में याद रखते। लेओनार्दो द विंची भी ऐसे ही थे।

और फिर यह सम्वाद एक ही व्यक्ति आत्मा से भिन्न, दो कलाकारों के बीच भी तो घटित होता आया है। जर्मन कवि रेने मारिया रिल्के और फ्रेंच शिल्पकार रोदां के सम्बंध भी विख्यात हैं। युवा रिल्के ने लगभग एक शिष्य की सी भक्ति और निष्ठा से ‘हीरो वरशिप ‘करते हुए शिल्पकार के सानिध्य में वक्त गुज़ारा। वे रोदां को काम में तल्लीन क्षणों में निहारा करते, कारण दोनों ही मनुष्य के भीतरी संसार तक अपने अपने ढंग से पहुंचना चाहते थे, उसे अभिव्यंजित करना चाहते थे।

रिल्के, रोदां की मानवीय हाथों वाली कला शृंखला से बेहद प्रभावित हुए थे। एक पियानो बजाने वाले का हाथ, सोते मनुष्य का हाथ, कुछ चुराता हुआ हाथ, अपनी भावनाओं को भींचे हुए एक हाथ…  न जाने कितनी भंगिमाएँ। यह हाथ ईश्वर और कलाकार का भी हाथ था और कलम थामने वाले कवि का भी।

रोदां के करीब रहते हुए युवा रिल्के ने पांच वर्ष लगा कर रोदां पर एक विनिबन्ध लिखा जिसमें उनकी रचना प्रकिया और कला पर अद्भुत अंतर्दृष्टियां हैं। उन्होंने रोदां पर एक के बाद एक अध्याय लिखे और आज यह विनिबंध रोदां के अलावा स्वयं रिल्के की सौन्दर्यबोधात्मक दृष्टि का परिचायक भी है।

रिल्के ने  ‘आर्केक टोरसो ऑफ अपोलो’ नाम की कविता लिखी थी जिसमें अपोलो के  भंजित धड़ का अनूठा वर्णन  था। शब्दों  या काव्य  में किसी दूसरी दृश्यकला या  दृश्यकृति का वर्णन  ekphrasis कहलाता  है। इसी का  एक और उम्दा उदाहरण अंग्रेज़ कवि शैले की कविता Ozimandias  है जिसमें  वे रेगिस्तान की रेत में पड़े एक भग्न  मनुष्य- रूप  का  वर्णन  करते हैं जिसके विशाल पैर तो हैं पर ऊपर का धड़ गिर चुका है। लेकिन रेत में धँसा एक मुख अभी तक अलग पड़ा है। इसके  माथे पर के बल, एक मुड़ा हुआ ओठ अहंकार और सत्ता के मद का बयान कर रहा है।  यानी उस  राजा का भीतरी चरित्र  पत्थर में अंकित  हो उतर आया है, और आज भी उस भग्नावशेष में बचा  हुआ है।

इसी तरह हिंदी कवि विनय कुमार ने दीदारगंज की यक्षिणी पर एक लंबी कविता लिखी है और उसमें मौर्य काल से आज तक का समय और वातावरण समाया हुआ है।

आइए अब देखते हैं एक कला के दूसरी में प्रवाहित होने की अनूठी प्रक्रिया। इसे शिल्पकला में कविता का  क्षण भी कहा जा सकता है। शिल्पकला की सबसे बड़ी विलक्षणता उसकी अचलता और मौन है तो काव्य में गतिमान शब्दाधारित अनुभव या व्यंजना है। तो इसे ही आधार बना कर इस संवाद को समझते हैं। 

अचल प्रतीत होने वाली शिल्पकृति में जब हम अंतर्निहित गति का अनुभव करते  हैं, और अपनी देह में उसे  महसूस करते हैं, धीरे धीरे शिल्पकृति के गिर्द घूमते हुए, अनेक कोणों से उसे निहारते हैं, तो  हमारे प्रतिबोध और सम्वेदनाएँ भी किंचित बदलती जाती हैं। उदाहरण के तौर पर माइकलएंजेलो की शिल्पकृति ‘डाईंग स्लेव’ (मरता हुआ दास) को देखें। एक कोण से लगता है कि वह निष्प्राण हो चुका है, दूसरे कोण पर एक आशा जगती है कि अभी भी उठने की कोशिश कर रहा है, अगले कोण यह आशा  टूटने  लगती है, और यह क्रम चलता रहता है- निरन्तर एक संघर्ष… जीवित रहने का,  न रह  पाने का, सदियों से। यह मूर्ति में काव्य का क्षण है। 

फिर किसी भी शिल्पकृति के पाठ में आशंसक का अनुभव भी पहले इंद्रियों से शुरू होता है, फिर धीरे धीरे हम उसके मनोवैज्ञानिक आशयों के प्रति सचेत होने लगते हैं, और अन्ततः इद्रियों, मन, बुद्धि, विचार और चेतना का सहकार मिलकर जो सौंदर्यबोध कराते हैं, वह क्रमिक ‘रीडिंग’ या पाठ शिल्प में कविता के पाठ  जैसा ही  है। 


फिर मूर्ति भी तो काव्य की तरह साहचर्यों (असोसिएशन्स), प्रतीकों, उपमानों की भाषा का इस्तेमाल करती है। भारत की तमाम प्राचीन और क्लासिकी शिल्पकला शरीररचनापरक (anatomical) न होकर उपमानधर्मी और लिरिकल है- वहाँ नयन कमलदल जैसे हैं, खंजन नयन हैं, जंघाएँ कदली स्तंभ सी हैं, सिंह कटि है। गंधर्व और किन्नर हवा में बादलों की तरह भारहीन हैं। केश निचोड़ती सद्यस्नाता के बालों से टपकती बूंदों को एक  हंस मोती समझ कर पी रहा है।  क्या यह सब काव्य नहीं है?

दूसरी ओर कविता का तो आरम्भ ही शायद कवि के मानस में तब होता है जब बहते हुए जीवन प्रवाह का कोई एक क्षण, कोई पात्र, कोई पक्ष, कोई छवि या बिम्ब चेतना में ठहर जाता है, स्थिर हो जाता है, तस्वीर सा उतर आता है। तब यही मार्मिक क्षण, कलाकार (कवि) के लिए सौन्दर्यबोधानुभव का क्षण होता है, कविता के आरम्भ का बीज क्षण होता है। 

और यों अपने इस बीज के गिर्द,  कवि बिम्बों का एक वितान तानता है, बिम्बों की एक पाँत रचता है, धीरे धीरे।  या कहें कि एक मूल बिम्ब के पहलू दर पहलू खोलता है, और यों एक काव्यकृति बुनता है। 

दूसरी ओर कविता के पाठक या श्रोता (आशंसक) के लिए कविता को पढ़ते/सुनते  हुए एक बिंदु ऐसा ज़रूर आता है, जहां अर्थ या अनुभव संघनित सा होने लगता है, स्थिर सा हो जाता है, स्थापित होकर अचल हो जाता है, यानी अर्थ के अनुभव का एक उच्चतम बिंदु (अपैक्स पॉइंट) । वही मेरे लिए कविता में मूर्ति का क्षण है।