पिछले दिनों अप्रतिम कथाकार राजी सेठ हमारे बीच नहीं रहीं। उनके पहले उपन्यास तत्सम पर सुमनिका सेठी का यह लेख उनकी स्मृति को अर्पित है। यह स्त्री दर्पण के ताजा अंक में छपा है। ऊपर दिया गया चित्र भी सुमनिका ने बनाया है - कागज पर जली हुई बाती की कालिख और पेंसिल से।
अन्तर्मन का महाकाव्य : तत्सम
‘तत्सम’ राजी सेठ का पहला उपन्यास है। पढ़ते हुए लगता है कि राजी सेठ कितनी अलग तरह की लेखिका रहीं हैं। एक खास ब्रूडिंग किस्म की कैफियत। पढ़ते हुए उपन्यास की अनुभूति-प्रवणता, गहनता और दृष्टि-संपन्नता जितना विचलित करती है, उतना ही मंत्रमुग्ध भी। तिस पर अमूर्त और निराकार मन को, उसके हज़ारहा संवेदनों को, मूर्त और साकार कर देने की उनकी सहज क्षमता हैरान करती है।
पढ़ते हुए अचानक मोहन राकेश की ‘मिस पाल’ कहानी की याद हो आई। जहां ‘मिस पाल’ कहानी का नैरेटर एक खास दूरी और कुछ नजदीक से उनके जीवन की छोटी-छोटी बातों, चेहरे की आती जाती छायाओं, चेष्टाओं, जुमलों, व्यवहारों को देखता और उनका वर्णन करता है, और उसी से मिस पाल के जीवन के गहरे निर्वासन और एकाकीपन की विडम्बना को उभार देता है। यानी बहिरंग से अंतरंग की उजाड़ता को ध्वनित कर देता है। लेकिन ‘तत्सम’ तो ऐसा लगता है कि जैसे सोच के रग-रेशों से बुना गया उपन्यास है। ऐसा तो नहीं कि उसमें बाह्य जीवन न हो। है तो सब कुछ अंतर्ग्रथित ही, फिर भी इस सब की छाप वसुधा के मन के दर्पण में, चेतना के सरोवर में जिस तरह प्रतिबिम्बित होती है, जैसे वर्तुल बनाती है, अपने ही मन के भावों की जैसी पड़ताल वहाँ अंकित हुई है, वह अप्रतिम है। मन के सुबह-शाम, छाया-प्रकाश, जड़ता-निविड़ता, भीति, हिचक, निर्वेद, निर्वासन, टूटन से लेकर बसंत के फूटते अंखुओं तक, न जाने कितनी मुद्राएँ हैं वहाँ।
यह कहानी वसुधा की है, एक ऐसी सुशिक्षित एवं अत्यंत सवेदनशील स्त्री की, जिसके जीवन में एक बड़ी दुर्घटना, एक्सिडेंट मे पति निखिल की अचानक मृत्यु, उसे जीवन की धुरी से उठा कर परिधि पर ला खड़ा करती है। सोचती थी कि पति के घर में ही रहेगी। पर वहाँ कुछ और सांसारिक चीज़ें और तनाव हैं जो रिश्तों से बड़े होने लगते हैं। तो वह बड़े भाई-भाभी के घर रहना चुनती है। इस घर में पिता की स्मृति है, वैधव्य के पहाड़ को उठाए उनुभवों की उसी पगडंडी पर आगे-आगे चलती अम्मा हैं और भाई-भाभी का परिवार है। वसुधा की होकर भी यह कथा, यह यात्रा, विवेक (पात्र) की भी है, आनंद की भी (पात्र), दुख के तरह तरह के चेहरों की भी, भीतर जलते अलावों की, वसुधा की जीवन परिधि पर खड़े तमाम पात्रों की समवेतता को भी उदग्रता में समेटे हुए है।
वसुधा अपने नाम की सूक्ष्म अर्थछायाओं जैसी है, घटनाओं, चीजों, अहसासों को अपने भीतर-भीतर मौन जज़्ब करने वाली, अमूर्त को न केवल महसूस करने वाली, वरन पहचान लेने वाली, बेहद आत्म सजग व्यक्तित्व। जिसे लेकर शरत भैया के ममतामयी भर्त्सना के शब्द हैं- ‘‘तू ज़रूर दुख पाएगी… ज़रा ज़मीन पर रहा कर।’’ उसमें कुछ अटपटा तो ज़रूर है जो वह गंधों और ध्वनियों को तितलियों के पंखों की तरह छू लेने को बेचैन हुई रहती है। सूखते कपड़ों में वह धूप की गंध सूंघ लेती है, गीले पत्थरों पर बैठ पानी की शुचिता की गंध पहचानती है। ऐसी भाव-प्रवण वसुधा, नियति ने अपने क्रूर आघात से जिसकी संवेदना के स्रोत मानो कुंठित कर दिये हों, कि भीतर-भीतर जीवन ने पटाक्षेप कर दिया हो और वह किनारे की रेत में लगी एक नाव हो। जीवन और खेल में होकर भी नहीं होने का त्रासद अहसास।
बहिरंग जीवन और अंतरंग के बीच की फांक के इन्हीं विरोधाभासों से राजी सेठ ने वसुधा की जागतिक नियति को सिचुएट किया है। चटख रंगों वाले, कोलाहलमय और प्रगल्भ संसार के बरक्स वसुधा के फीके, उदास रंग और मौन। लेकिन युद्ध के मैदान केवल निजी ही नहीं हैं। वहाँ परिधि के संसार से भी निरंतर जूझना है, जिसमें उसके अपने घर की सावधान हवा से लेकर बाहरी जगत के युद्ध भी हैं।
उपन्यास की शुरुआत ही युवा समारोह की उद्दाम सामूहिकता से होती है। वहाँ मेले जैसा उछाह है, चारों ओर बहता जीवन का आवेग, जिसमें वसुधा अकेलापन और निर्वासन कुछ और उघड़ आता है। लेकिन फिर यहीं से अपने जैसे उस एक व्यक्ति के अंतरंग का साक्षात्कार भी होता है, यानी विवेक के भीतर के जलते हुए अलाव, आत्म, यातना, गहरे अपराधबोध के अनुभव।
निश्चय ही यह विधवा विवाह या पुनर्विवाह की सामाजिक समस्या का उपन्यास तो नहीं ही है, जहां समाज के रूढ़ विधानों से जूझने की, उन्हें भंजित करने की बात हो। यहाँ तो व्यक्ति का अपना स्पेस, अपना चुनाव, अपनी चेतना, अपने विश्वास को पाने की बात है। शायद यह उससे आगे का धरातल और अंतराल है, जहां दूसरों के दिये समाधानों की पराधीनता भी न हो ।
लेकिन दूसरी ओर रूढ़ सांस्कृतिक कंडीशनिंग के सत्य को भी नकारा नहीं गया है। स्वयं वसुधा की माँ में इस तरह के अवरोध अवशिष्ट हैं। लेकिन दूसरी ओर वसुधा को जीवन में जैसे तैसे अकमोडेट करने की भाई-भाभी की कोशिशें भी मानसिक अतिचार बन जाती हैं, वसुधा के स्वत्व का, उसकी आत्मा का हनन ही करती हैं।
विदेशी शोध छात्रा रूथ का एक भिन्न सांस्कृतिक दृष्टिकोण और परिप्रेक्ष्य है। वह खुद भी अनाथ थी पर उसके व्यक्तित्व पर दुर्भाग्य की छायाएँ न थीं, और नहीं थी किन्हीं विश्वासों की जकड़न। बौद्धिक बहस में उसकी आक्रामकता वसुधा को डिफ़ेंसिव बना देती थी। भारतीय संस्कार त्याग और तृष्णा को जीतने को महत मानता है पर रूथ दुख से लड़ने की तैयारी और सामान्यता की बात करती थी। समझौता नहीं वरन संभावनाओं के प्रति खुले रहने की बात।
शरत भैया ऐसे ही दृष्टिकोण के भारतीय प्रतिरूप हैं। वे विज्ञापनों के जरिये आधुनिक और उदार विचारों वाला वर खोजने मे लगे हैं, और वसुधा से जड़ता और उदासीनता त्याग कर सहयोग की अपेक्षा रखते हैं। वसुधा को वितृष्णा ही अधिक होती है, क्योंकि निखिल के साथ बीता जीवन उसकी मृत्यु के साथ समाप्त नहीं हुआ है उसके लिए। फिर धूप और पानी की गंध पहचानने वाली वसुधा के लिए दिखावे और लोलुपता की छुपी हुई दुर्गंध पहचानना बिलकुल मुश्किल नहीं। शायद हितचिंतक अपने उद्धारक जोश में यह सब नहीं देख पाते। या फिर उन्हे भी लगता है कि वसुधा को चयन का वैसा अधिकार नहीं। राजी सेठ ने पुरुष प्रत्याशियों की बदनीयती का जैसा चित्रण किया है, उसकी मिसाल कम ही मिलेगी। यहां कड़वे यथार्थ की परतें खुलने लगती हैं।
“अखरती है उसे आत्ममुग्ध श्रेष्ठ भाव की खास मर्दानी गंध। उद्धार करने की जोश-खरोश भरी आर्यसमाजी शिद्दत … अखरता है वयस्कता की चौखट पर खड़े लड़कपन का फूहड़ दिखावा। भरी पूरी जिंदगी जी लेने के बाद भी लार टपकती तृष्णा। बच्चों की ज़रूरत की आड़ में देह की हवस को आज़मा लेने की भूख। अपने से बाहर इस तरह छलकते जाने की कोशिश।” (तत्सम पृष्ठ 45)
यहां पुरुष समाज की मंशाओं की रेंज प्रकट होती है। एक आए थे जिन्हें बच्चों की माँ चाहिए थी, किसी को कमाऊ औरत, किसी को निवृत्ति के बाद समय काटू जिंस की जरूरत, तो किसी को अपनी देह की चुप्पी को आज़मा लेने की हौंस।
इन सबके बीच बड़े प्रखर पैने विचारजीवी का किंचित दीर्घ और क्रमिक वर्णन तो वाकई अचूक है। उनकी आत्म प्रभुता की आंच में सिके पत्र, बाहरी मुखौटों और उपाधियों के भीतर वही भुक्खड़ लंपटता ....। वे विवाहित हैं पर गुप्त रूप से दूसरा विवाह करना चाहते हैं, क्योंकि वे सार्त्र के समान हैं, विचार के लिए ही जीते हैं- ‘‘यू केन होल्ड वेल … माइ बॉडी एंड माइंड’’।
ऐसे ही तमाम लोगों की भीड़ से परे जब एक दिन राजीव के साथ विवेक घर आता है … इतना सहज और आत्मीय, सभ्य सी मृदुलता … न मुद्रा में कोई उत्तेजना, न हाथों पैरों में बेवजह हरकत। आँखों मे कुछ ऐसा है जो उन्हें चेहरे से अलगा देता है। और फिर ''नहीं'' शब्द के प्रयोग का यह दोहरा इस्तेमाल खासा रोचक है। ‘‘उछाल उबाल नहीं, अभद्र जिज्ञासा नहीं, कोई बहुत निजी बात नहीं, एकांत का आग्रह नहीं, प्रश्नों की कुल्हाड़ी हाथ में नहीं ।”
राजी सेठ की भाषा बहुत सक्षम है, भीतर बाहर हर जगह विचरण करती सी। बिम्बों और बेहद नए सादृश्यों से भरपूर, सांगरूपकों वाला काव्यात्मक गद्य। उनके वर्णन, उनके बिम्ब कब गहरी अर्थ ध्वनियों में गूंज उठते हैं, पता नहीं चलता। कारण वे इतने ऑर्गेनिक और स्वाभाविक होते हैं कि कई प्रतीतियाँ साथ-साथ होती हैं, बुझी हुई पर्वाग्नि का बिम्ब हो या लकड़ी उठा के उसको छेड़ देना हो, तम्बू का अंधेरा अंतरन्ग हो, मुसाफिर खाना, खिड़की, घर, आरामकुर्सी की खोज। राजी सेठ रुदन शब्द नहीं लिखतीं। पाठक मुद्रा और संकेत को पकड़ लें तो उसके सामने रुदन साकार हो जाएगा। वह छवियाँ गढ़ती हैं। साहचर्यों में भूदृश्य, शहरों के भाग, वास्तु खंड यों ही चले आते हैं। खैर।
तो विवेक से मिलने के बाद एक अचंभा सा उदित होता है। चेतना में जैसे कोई आँधी तूफान धीरे-धीरे थमने लगे और आकाश निराछन्न होने लगे। जैसे ‘प्रगल्भ’ शब्द बीच बीच में प्रकट होता है (नकारात्मक अर्थों में), वैसे निराछन्न भी ‘तत्सम’ में प्रकट होता है। वसुधा हैरान है अपने मन की सुगबुगाहट पर … कठिन कठोर घाटियों में नर्म फाहों से बादल कब कैसे घुस आए पता नहीं, कब अशरीरी जिजीविषा ने देह पा ली।
लेकिन दूसरी तरफ तो ऐसा कोई भाव नहीं। जब वसुधा के सान्निध्य में विवेक के भीतर छुपा दुख बाहर आता है, तो एक सा होकर भी वह किंचित भिन्न भी है। शीरीन की रक्षा न कर पाने का गहरा अपराधबोध। ऐसा दुख जहां अपने लिए न कोई क्षमा है न मुक्ति चाहने की ज़रा भी छूट। पैरों के ठीक नीचे जैसे कोई कब्र हो और उसी में जीवन की इच्छा और जज़्बा भी। वसुधा उसे इस आत्म-प्रताड़ना से बाहर लाना चाहती है। ऐसा भी नहीं कि विवेक उसकी ओर खिंचता न हो, पर उस नैतिक स्थायी भाव के दबाव से मुक्त होना विवेक को दुष्कर लगता है। न तो छोड़ पाना, न स्वीकार भाव। सपने में दिखता है वसुधा को, रेतीले विस्तार मे बस एक बंद दरवाजा। जिसके आर-पार का शून्य तो दिखता है, तेज़ हवाओं में दरवाजा कांपता है, उसे थामने वाली दीवारें गिर जाती हैं पर दरवाजा झूलता रहता है।
विवेक में है गहरी आत्मीयता, वसुधा की चिंता और संवाद की कोशिश… पर ऐन मौके पर पलायन। विवेक उसकी नहीं अपनी अवहेलना कर रहा है, इतना वह समझ चुकी है, पर बार-बार का आघात उसे तोड़ डालता है। उसका स्वत्व छिन्न-भिन्न हो गया है। और वह अपने जीवन में लौट आती है, भीतर से पूरी तरह अवसन्न और आत्मग्लानि की लज्जा में आकंठ डूबी हुई।
लाइब्रेरी से घर लौटने में जो रिक्शा मिला वह ‘भी’ कुछ अधिक खड़खड़ा रहा था। जैसे उसका पूरा अस्तित्व। दीखता हुआ आगे का रास्ता… सब कुछ जहां परिचित और पूर्व अनुमानित है, कदम-कदम, चप्पा-चप्पा। एक दुःसह किस्म की निश्चितता..... वह इस सब से कहीं दूर निकल जाना चाहती है, रिश्तों और घर की कारा से दूर, अकेलेपन से परे, पहचान से परे, अपेक्षाओं से परे।
इस अलांघ अलाव को कूद कर पार जाने को वह दक्षिण की यात्रा पर निकल जाती है अकेली। जैसे विराट में आत्म को विसर्जित कर देना चाहती हो। यह कोई पड़ाव है उसकी भीतरी यात्रा का .... जहां खो कर शायद खुद को पा सके। और सचमुच अचानक काले पत्थर की विवेकानंद की छवि को निहारते एकाएक आत्म रहित होकर बहने लगती है भीतर सोयी हुई पीड़ा। क्या ऐसे होते हैं विराट के अदृश्य हाथ?
बंदीपुर का गेस्ट हाउस, जहां भोजन विष बन गया है, वसुधा वमन कर रही है, और मरणासन्न है, निढाल, कि फिर कुछ हाथ हैं जो उसे उबारने को बढ़ आते हैं। वही हाथ उसे अपनी गाड़ी में लेकर हस्पताल पहुँचाते हैं। ये हाथ आनंद के हैं।
देह, मन, प्राण सब जैसे खाली से, पर फिर सलाइन और ग्लूकोस की बूंद-बूंद की तरह कोई उसे, उसकी जिजीविषा को जिलाने की कोशिशों में जुटा है। लेकिन वसुधा डरी हुई है। आनंद उस पर कुछ थोप नहीं रहा, पर उसका कहना है कि वसुधा को देखते ही वह पहचान गया था। “एक सुपर कांशेस होती है जो बताती रहती है .... तुम्हें देखकर … हालांकि तुम्हें जब देखा था यू वर इन हॉरिबल शेप। हेल्प, केयर, अटेंडेंस सब चाहिए था तुम्हें। पहचान की उस एक्सटेसी की भागीदार तुम नहीं हो सकती थी….’’
और फिर आनंद से लंबे संवाद, वसुधा को हैरत है उसके जीवन के निष्कर्षों पर, जो अधिकतर सिद्धान्त नहीं अनुभव से उपजे हैं। आनंद का अभय, उसका ठहराव, उसकी वत्सलता, सीधे कनफेशंस और दुख से परे जाने का ढब…। सब वसुधा में भी ठहर जा रहें हैं। कोई निर्णय, कोई चुनाव जन्म ले रहा है, पहचान से उपजा भाव।
वह घर लौटी है, कुछ भिन्न भाव से इस बार। पर अब विवेक के पत्र उसकी बाट जोह रहे हैं। उनमें पुकार है, पुकार के प्रत्युत्तर की प्रबल चाह है।
लेकिन अपने चैतन्य तक पहुंची वसुधा निखिल के बाद अब विवेक से जुड़े अतीत का भी अतिक्रमण करती हुई यहाँ तक आई है। वह कृतज्ञ है विवेक की, जिसके कारण जिजीविषा का संस्पर्श आत्म को मिल पाया और शाप-मुक्ति हो सकी।
‘तत्सम’ इसीलिए एक महाकाव्यत्मक उपन्यास बन जाता है कि इसमें न जाने कितने आयाम
समाहित हैं। समाज के अनेक कोण, अनेक पात्र, हर पात्र के अपने निजी वृत्त, अपने-अपने
दुख, अपनी जटिल गतियाँ और लय। फिर भी किसी एक धरातल पर, अनुभव के धरातल के शिखरों पर
पहुँच कर, वे एक दूसरे के जैसे होने लगते हैं। मानवीय अनुभव की यात्रा समाजशास्त्र
और दर्शन के सिद्धांतों की मोहताज नहीं। यद्यपि यहाँ उपन्यास में वे सब अंग-रूप में
समाए हुए हैं। साहित्य-कृति दर्शन और समाजशास्त्र का उपनिवेश बनने से बच गई है।
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