बुधवार, जून 29, 2022

सौंदर्यबोध शास्त्र की परंपरा और रमेश कुंतल मेघ


हमारे चिंतक और सौंदर्यबोध शास्त्री रमेश कुंतल मेघ पर हाल में प्रदीप सक्सेना के संपादन में बनास जन का विशेषांक मेघ:सौंदर्य चिंतन के वातायन प्रकाशित हुआ है। मेरा यह लेख इस अंक में शामिल है।


डॉक्टर कुंतल मेघ का कृतित्व विराट है, एक विराट ज्ञानात्मक अनुसंधान। अनुसंधान किसका? मनुष्य का, मनुष्य के कृतित्व काकृतित्व में समाए उसके संसार का और अपने देश,काल और संसार से मनुष्य के संवाद का।

न तो मनुष्य की धारणा कोई स्थिर धारणा है और न ही मनुष्य की यात्रा कोई छोटी यात्रा है। इस प्रदीर्घ यात्रा के निशान अनंत काल की ज़मीन पर छूटे हुए हैं- जिसकी निशानदेही करने कुंतल मेघ निकले थे - और यों बढ़ते ही चले गए...

जब हम मनुष्य, विभिन्न देश-काल और संस्कृति से संवलित मनुष्य तक पहुँचना चाहते हैं, उसके भीतर उतरना चाहते हैं, उसके मूल्यों, उसके स्वप्नों, उसके संघर्षों और पीड़ाओं तक पहुँचना चाहते हैं, तो उन तक पहुंचने का अगर कोई रास्ता दिख पड़ता है तो वह शायद मनुष्य के कृतित्व से होकर ही तो गुजरता है। समाज एक प्राणी की तरह ही युगों-युगों से जीता रहा है, अपने तमाम विचारों, संवेगों के साथ, एक ही समय में मरता और जीता हुआ। फिर मनुष्य का कृतित्व जो प्रकृति, समाज और ऐतिहासिक यथार्थ के बीचोंबीच, और फिर भी उनके समानांतरमनुष्य का अपना संसार है। कृतित्व यानी जीवन और जगत से मनुष्य के सम्वाद का रूप, उसकी अभिव्यक्ति, उसकी स्वतंत्रता का एक चिलचिलाता क्षण। इस कृतित्व में कितना मनुष्य का अपना हैकितना संसारपरंपरा, विरासत और ऐतिहासिक शक्तियों काइन प्रश्नों के उत्तर भी आसान नहीं हैं। फिर भी मनुष्य की रचनात्मकता में कुछ तो ऐसा है जहां कई विरोधी प्रतीत होने वाली चीजें एक रूप, एक आकार पा जातीं है। अपनी तमाम बद्धताओं में, तमाम सीमाओं में, मनुष्य का कर्म, उसका श्रम, उसका ध्यान, उसका प्रेम एवं कोमलता, करुणा और समानुभूति जिसमें संचित हो जाती है, वह साकार रूप, साधारण हो कर भी साधारण नहीं। इसी कृतित्व का नाम  कला है। एक होकर भी जो एक अनेकता का अभिधान है। द्वंद्व न्यायों  का समन्वय है और मुनष्य की तरह ही समय मे  गतिमान है। 

डॉ. मेघ के अनेक ग्रंथों के नाम याद आते हैं, ‘तुलसी आधुनिक वातायन से’, ‘क्योंकि समय एक शब्द है’, ‘अथातो सौन्दर्य जिज्ञासा’, ‘साक्षी है सौंदर्य प्राश्निक’, ‘आधुनिकता और आधुनिक बोध’, ‘मिथक और स्वप्न’, ‘वाग्मी हो लौ’, ‘मनखंजन किनके.... साहित्य कृतियों और कृतिकारों पर उनका कार्यमूर्ति कला, चित्र और वास्तु, और फिर देशकाल और कलाओं के आर-पार उनका चिंतन। यानी उनकी ज्ञानमीमांसा का दायरा सुदूर अतीत से वर्तमान तक, बल्कि कहना चाहिए भविष्य के स्वप्नों तक पसरा हुआ है। सुदूर अतीत वह प्रागेतिहासिक समय है, जो चेतना की गोधूलि वेला है जहां वास्तविकता आर्केटाइपल प्रतीकों में ढल जाती है। ये बिंबन मनुष्य बल्कि मानवता की शैशव अवस्था के (आदिम अवस्था) अनुभव पुंज हैं, प्राथमिक अनुभव हैं, जो सामूहिक अवचेतन में सुरक्षित हो गए हैं, बिंबों और रूपकों और रूपांतरणों से बने मिथकों के रूप में। इनके कूटों को खोलने को फायरबाख ने अवमिथकीयकरण कहा, जहां समाजशास्त्र और नृतत्व के सहारे मनुष्य के अंतर्लोक और मानस के आयाम खोले जा सकते हैं।[1] डॉ मेघ यह कार्य करते रहे हैं और अपने विश्वमिथक सरित्सागर नामक वृहत् ग्रंथ में तो वे इनके माध्यम से विश्व (यूनिवर्सल) मनुष्य की धारणा की स्थापना करते हैं। मिथकों से ढके प्रतीकों को खोलते हुए उनका मानना है कि प्रतीकों के रूप (फॉर्म्स) तो राष्ट्रीय होते हैं, किन्तु अंतर्वस्तु (कंटेंट) वैश्वक।

तो सुदूर अतीत से लेकर आज तक मनुष्य की अभिव्यंजना के रूप और प्रतीक ही तो हैं जिनके निकट पहुँचने के लिए डॉ मेघ देश और कालों के आर-पार भटकते रहें हैं। इन अभिव्यंजनाओं के शरीर क्या केवल शाब्दी या ‘भाषिक होते है? शायद नहीं। शब्द भी है जब वह साहित्य कृतियों में ढलता है, संवेग, स्वर एवं ताल में ढल कर वह सांगीतिक रचना हो जाता है, रंग-रेखाओं और स्थान संयोजन में ढलकर चित्रकृति और ठोस पदार्थ में दो आयामों से आगे बढ़ कर मूर्ति। जहां देह ही अभिव्यंजना का माध्यम बन मुद्राओं और गतियों में बात करने लगे तो अभिव्यंजना नृत्य हो जाती है। इन कलाओं की विशिष्टता के बावजूद इनका एक संश्लेष बनता है, सौंदर्य-अनुभव और अभिव्यंजना इन सभी की धुरी है। अनेक हो कर भी कहीं उनकी एकता के कुछ मूल बिंदु हैं। सौंदर्यबोध शास्त्र इन्हीं से मुखातिब होने वाला शास्त्र है। सौंदर्यबोध शास्त्र की परिभाषा करना सरल नहीं रहाफिर भी यह विभिन्न कोणों से कलाओं की अन्वीक्षा करने वाला शास्त्र है।

कहने को तो एक स्वतंत्र ज्ञानानुशासन के रूप में यह एक नया शास्त्र है पर वास्तव में इसका इतिहास पुरातन है- और कालक्रम में इससे जुड़े प्रश्न, विषय और उद्देश्य भी कमोबेश बदलते रहे। इसके  विराट दायरे में दर्शन, विज्ञान और मानविकी का समाहार था और यह खासा अमूर्त और फ्लूइड भी रहा। यूनानी दार्शनिकों और पायथागॉरियन चिंतकों ने इसे दर्शन का अंग माना जो जीवन का एक पूर्ण चित्र देफिर यह कलाओं के अनुभव से जुड़ कर काव्यशास्त्र और सौंदर्य की प्रकृति से जुड़ गया (अरस्तू)। कभी यह नैतिकता के करीब था (सुकरात)। कभी प्रकृति और कला के संबंधों की परख कर रहा था (लियोनार्डो डा विंची) या कला की कसौटियां रच रहा था (बॉयल्यू Boileau) या संसार की ऐन्द्रीयिक समझ और संज्ञान का विश्लेषण था (बॉमगार्टन) या फिर कला और कला में सुंदर की तलाश।

डॉ मेघ के शब्दों में- यह विषय व्यापक तौर पर साहित्यशास्त्र और काव्यशास्त्र से आगे सौन्दर्यबोधशास्त्र कहलाया जिसमें अनेक प्रकार की कलाएँ और कौशल, विधाएँ और विलास शामिल हो गए। इस संश्लेष में नेत्रों, कानों, नासिका, जिह्वा, त्वचा की संवेदनाएँ और आवेश भी शामिल हो गए। अतः पंचेन्द्रियों के उत्सवों से युक्त नाना कलाओं – विधाओं -  सहित्यरूपों का महाशास्त्र ही सौन्दर्यबोधशास्त्र की संज्ञा पा गया।[2]

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अब आइये, ज़रा भारतीय परिदृश्य में सौंदर्य या कला चिन्तन का जायज़ा लें। ईसा की दूसरी या तीसरी शताब्दी में भरत का नाट्यशास्त्र, जिसे नाट्यवेद कहा गया था, भारतीय कला-चिंतन की बुनियाद है- क्योंकि इसमें नाट्य ही नहीं, काव्य, संगीतभाषणकला, तथा मुरली वादन जैसी लिरिकल कलाओं की भी सूक्ष्म मीमांसा हुई थी। (डॉ मेघ) उसके बाद ईसा की छठी सदी में भामह, आठवीं सदी में दंडी, फिर रुद्रट और वामन आते हैं, जिसे कला की देहवादी परंपरा माना जाता है। इसी दौरान शिल्प पर विष्णुधर्मोत्तर पुराण, एवं अग्नि पुराण में चित्र एवं अन्य कलाओं की भी चर्चा थी। वात्स्यायन के कामसूत्र में भी नागरक के संदर्भ में कला और कौशलों की सूचियां थीं। कामसूत्र की टीका लिखने वाले यशोधर ने चित्र कला के षडंगों की चर्चा की थी- रूपभेद, प्रमाण, भाव, लावण्य, सादृश्य एवं वर्णिकाभंग। संगीत और वास्तु विषयक शास्त्र भी थे ।

इन अलंकार शास्त्रीय ग्रंथों की दूसरी परंपरा में (8वीं से 11वीं सदी) जिन्हें मध्यकालीन शास्त्रीय चिंतन कह सकते हैंभट्ट लोल्लट, श्रीशंकुकभट्टनायकआनंदवर्धन एवं अभिनवगुप्त के ग्रंथ आते हैं। इनमें काव्य के सारत्व या आत्मा की चर्चा होने लगती है। यह थे तो काव्य शास्त्रीय ग्रंथ लेकिन इन सिद्धांतों को दृश्य कलाओं पर भी लागू किया जा सकता था। इनमें आनंदवर्धन और अभिनवगुप्त थे, जिन्होंने कला की दैहिक, शास्त्रीय और व्यावहारिक चर्चा को लगभग दार्शनिक बना दिया। लेकिन फिर भी था यह सब कुछ भरत की बनाई नींव पर ही। कलाकृति के वस्तुगत रूपों का विश्लेषण एक बात है, लेकिन जब विश्लेषण सौन्दर्यानुभव का होने लगा तो अनुमानों और कल्पनाओं का बढ़ना स्वाभाविक ही था।

 आधुनिक समय में पदार्पण करने पर दृश्य खासा बदला हुआ है। हमारी स्वयं और पूरे विश्व की भी भारतीय कला के विषय में जो धारणा बनी- वह अतीत के उन कला अवशेषों के पुनरुद्धार के कारण ही बनी, जो कि सदियों तक भूमि की गहराइयों में सुप्त पड़े रहे। या फिर साहित्य ग्रंथों में अनदेखे पड़े रहे। कुछ सामंतकाल और अर्धसामंत काल के दरबारों का बचा पर वह भी धुंधलके में ग़ुम गया। ग्राम एवं कबीलाई रूप एवं कलाएँ भी पश्चिमी व्यापारिक अर्थव्यवस्था की मार से प्रभावित हुईं।[3] 

अवनींद्रनाथ टैगोर

उन्नीसवीं सदी में ब्रिटिश एवं यूरोपीय प्राच्यवादियों की एक पांत है जिन्होंने वारेन हेस्टिंग्स और सर विलियम जोन्स की परम्परा में भारतीय धर्म, दर्शन एवं साहित्य पर तो बात की पर दृश्य कलाओं के संदर्भ में वे निरुत्साहित ही रहे। भारतीय कला कभी उन्हें विकृत, कभी  ग्रोटेस्ककभी विचित्र प्रतीत हुई। अनेक हाथों और सरों वाले देव और देवियां उनके लिए अजब थे। (रोजर फ्राईक्लाइव बेल, विन्सेन्ट स्मिथ) उनका ख्याल था कि भारतीय कला मानवीय भावों को व्यक्त कर ही नहीं सकती। गर उन्हें कहीं सार दिखा भी तो केवल ग्रेको-रोमन कला में ही।

भारतीय परंपराओं, उसके उद्देश्यों, उसके स्वभाव और चरित्र से उनकी पूर्ण अनभिज्ञता ही इसकी वजह थी। 19वीं सदी के मध्य तक आते-आते भारतीय रचनात्मकता जड़ होने लगी थी। अग्रेज़ी भाषा, साहित्यविचारों और संस्थाओं के कारण आए बदलावों के कारण भारतीय भद्रलोक की अभिरुचियाँ और दृष्टिकोण बदल रहे थे। जिसे हम नागर अभिजन कहें-वह काफी कुछ बदल गया था, क्योंकि अतीत के जो अवशेष उनके सामने थे भी, उन्हें भी उनकी आंखें देख नहीं पा रहीं थी।[4] 

रवींद्रनाथ टैगोर

और जो गरीब जनता आदतवश इनसे जुड़ी थी उनके पास तो उस के संरक्षण के कोई साधन कभी थे नहीं। अतःप्राच्यवादियों ने धर्म, दर्शन साहित्य को टटोला और कलकत्ता में एशीयाटिक सोसाइटी की स्थापना हुई, अभिज्ञान शाकुन्तल के अनुवाद हुए जिस पर गोएथे दिलोजान से फिदा थे। कोई एक-आध रोडिन जैसा था जो नटराज की प्रतिमा देख कर स्तब्ध हुआ था। फिर भी अगर भारतीय दर्शन की प्रशंसा हुई भी  तो उसकी कल्पना की ऊंचाई, सौंदर्य प्रभाव, और मानव मूल्यों के लिए नहीं हुई।

राष्ट्रवाद के क्रमिक विकास के साथ राष्ट्र की कला-विरासत का भी पुनर्मूल्यांकन शुरू हुआ। बंगाल कला निकाय के अवनींद्र नाथ टैगोर और नंदलाल बोस इससे जुड़े थे। दूसरी ओर भारतीय बुद्धिजीवी का मानस निरंतर पश्चिमी विचारों से आकार पा रहा था। और यों इन्हीं दो विरोधी दिशाओं की जोड़ाई से पुनर्मूल्यांकन घट रहा था।

ई बी हैवेल

भारत की जो छवियाँ बनाई जा रहीं थीं वह एक, रहस्यवादी, भाववादी, पारलौकिकता में विचरते भारत की थी। दूसरी आकर्षक छवि थी भारत की अकूत धन सम्पदा और रोमानीपन की, तीसरी छवि सीधे-सादे धर्म प्राण ग्रामश्री वाले भारत की थी और चौथी छवि उन साधुओं-संन्यासियों, फकीरों दरवेशों की थी जो समाज से कटकर, लौकिक जीवन से अलग-थलग खड़े थे। यह छवियाँ पूरी तरह गलत नहीं थीं तो पूरा सच भी नहीं थीं। वे अंश को ही पूर्ण मान लेने की भ्रांति से ग्रस्त थीं।[5] भारत तब भी अनेकताओं का देश था। दर्शन का आधार भी लें तो भी भारत में केवल वेदान्त या अद्वैत दर्शन ही न था, दूसरे भी थे (षड्दर्शन)।

लेकिन भारतीय बुद्धिजीवी अपनी जड़ों से कट चुका था अतः उसे ये विचार इतने बुरे न लग रहे थे- वे इस पर गर्वित होने लगा था। उसने अध्यात्मवादी भारत और भौतिकतावादी पश्चिम की इन श्रेणियों को स्वीकार कर लिया था। बंकिमचंद्र चटर्जी और रवीन्द्र नाथ टैगोर भी कुछ हद तक इसकी ज़द में रहे।

इसी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि में उभरे ई. बी. हैवेल एवं आनंद केंटिश कुमारस्वामी, माइकल मधुसूदन दत्त आदि। सुदूर दक्षिण में भारतीय और तत्कालीन अंग्रेज़ी कला परंपराओं से अछूते राजा रवि वर्मा तैल रंगों में अंग्रेज़ी नैरेटिव चित्रों और शबीह को एक किस्म के अकादमिक यथार्थवाद में ढाल रहे थे। लेकिन भारतीय मिथकों और निजंधरों के अंकन में भारतीय अन्तर्वस्तु और प्राणमयता लुप्त सी थी।

इस परिदृश्य में हैवेल और कुमारस्वामी ने अपनी आवाज़ बुलंद की। हैवेल की 

आनंद कुमारस्वामी
सौंदर्य दृष्टि पैनी थी और मद्रास और कलकत्ता में कला शिक्षण करते हुए वे भारतीय संस्कृति और सभ्यता, धर्म और दर्शन के रूबरू भी हुए थे। उन्होंने  मुख्यतः वैदिकऔपनिषदिक एवं बौद्ध दृष्टियों को पढ़ा था और भारतीय कला कृतियों का  अध्ययन भी किया था। लेकिन फिर भी वे भी उसी भ्रांति के शिकार हुए कि भारत का मानस और  सांस्कृतिक दृष्टि धार्मिक, आध्यात्मिक और जीवन से परे देखने वाली है। उन्हें लगा कि भारतीय  सौन्दर्यबोधशास्त्र का उत्स ट्रांसीडेंटल दर्शन में खोजा जा सकता है। उन्होंने भारतीय कला पर,  कलाकार पर इसी दृष्टि से लिखा। वे मानो पश्चिम के लिए भारत की कला-दृष्टि के प्रबल प्रवक्ता बने। दूसरी ओर अंग्रेज़ माता और सिंहली पिता की संतान आनंद केंटिश कुमारस्वामी अंग्रेज़ी समाज की श्रेष्ठ अकादमिक परंपराओं में प्रशिक्षित थे। एशिया के कुछ भागों और भारत में राष्ट्रवाद के ज्वार में विज्ञान को तज वे भारत के आध्यात्मिक चिंतन को भारतीय कला में तलाशते रहे। बहुत गहरे श्रम से वे अपने स्रोत अनेक भाषाओं, पुरातत्व, इतिहास, धर्म और आध्यात्म में खोजते रहे। अपने पूर्वजों की धरती के प्रति उनमें एक गहरा नास्टेल्जिया था कि इस तरह उससे जुडने में वे प्राणपण से जुट गए।[6]

माइकल मधुसूदन दत्त 
अब इस सब के बीच से एक अहम सवाल यह उठता है कि अगर कलाशास्त्र एक स्वतंत्र ज्ञानानुशासन है, तो कलाकृति के अपने कलामूल्य और सौंदर्य मूल्य भी तो होंगे, फिर वह कृति चाहे सहित्यकृति हो, शिल्पकृति हो, सांगीतिक रचना होचित्रकृति हो या नाट्यरचना। उसका विमर्श केवल धार्मिकप्रतीकात्मक या बुद्धिजीवी किस्म का कैसे हो सकता है। कला की भाषा कोई बौद्धिक भाषा नहीं, बल्कि इन्ट्यूटिव (intuitive) संज्ञान वाली होती है जो अनुभूति और अनुभव से दीप्त रहता है, अतः वास्तविक जीवन से भी। पारंपरिक भारतीय कला जिसे हम धार्मिक की श्रेणी में रख देते हैं, है तो वह भी अनिवार्यतः मानवीय ही, मानवीय इन्द्रियों और संवेदनाओं के स्तर पर निवास करती हुई। उदाहरण के लिए शिव की छवि, या बुद्ध प्रतिमा या फिर भारतनाट्यम का एक नृत्यखण्ड...। है तो उसकी भाषा भी ऐन्द्रीयिक ही। वह भी अनिवार्य मानवीय अपील और महत्व से मंडित ही है। लेकिन आधुनिक शास्त्रीय व्याख्याओं ने बदकिस्मती से इस केंद्रीय अर्थ को नहीं पहचाना। एक कलाकृति या शिल्पकृति को केवल धर्मशास्त्रीय इलस्ट्रेशन या किसी निजंधर या प्रतीक में ही समेट लेना क्या कला का प्रकार्य है? इनमें यह तत्व हो सकते हैं, पर पूरी व्याख्या की धुरी का सन्दर्भ यही कैसे हो सकता हैदेखना होगा कि कलाकृति के रूप में वह कैसी है, हमारी इन्द्रियों, हमारे मानस के साथ वह कैसे सम्वाद करती है, उनमें कोई मानवीय भावदशाएँ, अनुभूतियाँ और संवेग हैं जो मानवीय अनुभव को अंततः ज्यादा व्यापक और गहन बनाते हैं, उन्हें कृति  कैसे साकार करती है। अर्थात कला की अन्वीक्षा को मानवीय, सामाजिक और रूपपरक दृष्टि से रखना ही शायद पहली शर्त होगी। उसमें अपने समय की, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक आकृतिबन्ध की व्यवस्था भी होगी जो कलाकृति का वृहत्तर परिपाठ या कॉन्टेक्स्ट हो सकता है। उसमें डूबकर निर्वचन व्यापक सत्यों को भी खोल सकेगा।

डॉ मेघ ने यही महनीय कार्य किया है कि 'अथातो सौंदर्य जिज्ञासा' नामक अपनी पुस्तक में सौन्दर्यबोधशास्त्र के तरल ज्ञान-अनुशासन को ठोस आकार दे दिया है। उसकी महत्तम परिसीमा तय कर दी है जिसके भीतर कला और उसकी प्रक्रिया के तमाम अनिवार्य अनुषंग समेट लिए हैं। और उन तक पहुँचने की प्रविधि भी बतलाई है। यानी एक स्वतंत्र शास्त्र की सम्पूर्ण रूपरेखा को स्थिर करने का प्रयास। यह शुद्ध सिद्धांत निर्माण का क्षेत्र है, एक बेहद कठिन डगर। एस्थेटिक्स पर पश्चिम में तो खूब मनन हुआ है पर हमारे देश में वह अस्वीकृत सा ही रहा है। या तो उसे कलावाद और बूर्ज्वा कह कर ठुकरा दिया जाता है, या फिर  दार्शनिक व्यायाम। इस विषय में, और इसकी जरूरत के विषय में भ्रांतियां छाई हुई हैं।

नंदलाल बोस

अथातो सौंदर्य जिज्ञासा में दस अध्याय हैं। पहला अध्याय कला, सौंदर्य और सौन्दर्यशास्त्र है तथा अंतिम संस्कृति, मनुष्य और इतिहास। यह सबसे बाहरी और व्यापक फ्रेम है। इसमें कला और आशंसा का रिश्ता वृहद स्तर पर सक्रिय होता है।  इस व्यापकतम परिवृत्त के  भीतर कलाकृति, कलाओं का वर्गीकरण, कलाकार, आशंसक और सृजनप्रक्रिया, अभिव्यंजना और सम्प्रेषण और सौन्दर्यबोधानुभव पर अध्याय हैं। यहां शास्त्र का पूरा वास्तु गढ़ा गया है। पहले अध्याय में कला चिन्तन की विराट ऐतिहासिक विरासत उभरती है- कला के चरण, कलाचिन्तन की तीन दृष्टियां यानी कला कला की भावना, कला-प्रक्रिया और कला-प्रभाव के रूप में देखी जाती है।

सौंदर्य की खोज प्रकृति एवं कला दोनों में की गई है। सौंदर्य की अवस्थिति कहां है, यह दार्शनिक विवाद भी आकार ग्रहण करता है। लेकिन डॉ मेघ के चिंतन के शिखर तो वे महान प्रश्न एवं जिज्ञासाएं हैं जिन्हें द्वन्द्वात्मकता, समांतरता, अंतर्विरोधों को समन्वित करते हुए वे मानव-मेधा, संस्कृति और इतिहास के सम्मुख अपनी खास शैली में, बेहद सच्ची आकुलता से उठाते हैं।

मनुष्य कलाकार है तो भौतिक और प्राकृतिक शक्तियां भी कहां किसी कलाकार से कम हैं। वे भी तो बेहद सुंदर रूपों को आकार देती हैं। विज्ञान प्रकृति की इसी कला का अनुसंधान करता है। अत: कुंतल मेघ विज्ञान एवं कला का द्वन्द्व-न्याय रचकर अंतिम ध्वनि में उन्हें समन्वित भी कर डालते हैं। रूप के तत्वों अर्थात् अनुपात, संतुलन, कंट्रास्ट, सिमेट्री को वे वनस्पति जगत और प्राणी जगत में भी घटाकर दिखाते हैं। वे मैथेमैटिक्स ऑफ ब्यूटीकी झलक दिखलाते हैं और सौंदर्य और विज्ञान का समतोलन कर देते हैं।

कलाकृति के अध्याय में केवल साहित्य कृति नहीं,

राजा रवि वर्मा 
बल्कि तमाम कलाओं के संदर्भ आते हैं। कलाकृति को वे कलाभवना, कलासृजन, काला आशंसा, और तमाम सौन्दर्य मूल्यांकन  की केंद्रीय धुरी  करार देते हैं। कला अनुभव मे और  कलाकार मे भी, रूप और अंतर्वस्तु  अविभाज्य होते हैं। ये कलाकृति के रूप और अन्तर्वस्तु की एकता ही है जिसके अगर तीन आयाम माने जाएं तो इन्द्रिय बोधों के सम्मुख प्रस्तुत होने वाला आकार या गठन कृति का रूप तत्व और अर्थ का, गहराई वाला आयाम जो संवेद्य और बुद्धिगम्य है, अन्तर्वस्तु है। रूप केवल दृश्य कलाओं का ही विषय नहीं। लेकिन हर कला मे वह भिन्न तरह  से आता है। जैसे रूप में कई तहें और चरण हैं, तो अर्थ भी सूचनात्मक, भावात्मक, प्रतीकात्मक और सौंदर्यपरक होता जाता है। पूरा अध्याय चित्र, संगीत और वास्तु पर अद्भुत अन्तर्दृष्टियां प्रदान करता है। लगभग गणितीय ढंग से हर कला मे वे रूप और अंतर्वस्तु की दूरी मापते हैं। 

फिर कलाकार की धारणा की भी बारीक तहकीकात फ्रायड, जुंग, एडवर्ड सेपीर, मैलिनोवस्की, रेडक्लिफ ब्राउन और रूथबेनेडिक्ट जैसे नृतत्वशास्त्रियों के सहारे उन्मीलित होती है।

और फिर अवतीर्ण होता है एस्थेटिक्स के क्षेत्र का सबसे महत्वपूर्ण और सबसे रहस्यमय प्रश्न- अर्थात् सृजन प्रक्रिया। विभिन्न कृतियों, महाकाव्यों, कविताओं, वास्तु भवनों, मूर्तियों का निर्माण कैसे होता है – क्या इसका कोई एक खाका खींचा जा सकता है? विभिन्न कलाओं के संदर्भ में चेतन-अवचेतन की भूमिका, करने और होने की द्वन्द्वात्मकता, इन्द्रियों, मन, बुद्धि की सम्पूर्णता (स्नायु-संस्थान, मस्तिष्क और मांसपेशियों के आपसी संबंध भी) मनोविज्ञान, दर्शन, सौंदर्यबोधशास्त्र – सहित अनेक विज्ञान शाखाएं इस रहस्योन्मीलन में लगी हैं।

कला के अन्य घटकों की तरह अभिव्यंजना एवं सम्प्रेषणीयता की व्याख्या भी लगभग सभी कलाओं के संदर्भ में की गई है। प्रेषणीयता को संकेत विज्ञान (सिमियॉटिक्स) के सहारे अनेक कलाओं में घटाया गया है।

सौंदर्यानुभव के अध्याय में बदलते सौंदर्यानुभवों को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रखा गया है। उदाहरण के लिए नाटक के संदर्भ में भरत का रस सूत्र, ब्रेख्त का एपिक थियेटर, बैकेट और आयेनेस्को का एब्सर्ड थियेटरऔर ज्यां जेने के एंटी थियेटर के रूप देखे जा सकते हैं। इतिहास-क्रम में उनके सामाजिक उत्सों को खोजा गया है। संवेदना, प्रत्यक्षीकरण, प्रेक्षण, भावना, चिंतन की सीढ़ियां यहां भी चढ़ी गई हैं।

अथातो सौंदर्य जिज्ञासा 

कह सकते हैं कि कुंतल मेघ का यह मेघवर्णी विवेचन हर धारणा के भीतर छिपे बारीक तंतुओं, रज्जुओं, संबंधों को उन्मीलित करने वाला विवेचन है – जहां हर रहस्य अनेक विरोधाभासों की पकड़ में खुलता है। यह पुस्तक सौंदर्यबोध शास्त्र की गंभीरतम संहिता है – जिसमें एक ओर अब तक के तमाम सौंदर्य चिंतन का वृहद् फलक पर समाहार हुआ है, वहां इस परंपरा से आगे प्रस्थान एवं नए प्रयाण, नई प्रतिपत्तियां, नई दृष्टियां भी रखी गई हैं। एक सम्पूर्ण शास्त्र,  एक सम्पूर्ण सिस्टम का निर्माण भारतीय सौंदर्यशास्त्र के लिए एक अनुपम योगदान है। लेकिन अवदान इतना ही नहीं है कि उन्होंने कला के जिज्ञासुओं के हाथ में एक सुनिश्चित शोध अभिकल्प और संयत्र थमा दिया है, सिद्धांत निर्माण के साथ साथ उन्होंने निरंतर सौंदर्यबोधशास्त्रीय आलोचिंतना के अनुप्रयोग भी तो किए हैं।

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अब क्यों न उनकी सौंदर्यबोधी दृष्टि की विशिष्टता की बात करें जिसका आधार ऐतिहासिक द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी दर्शन रहा है – उनका तमाम लेखन सूक्ष्म स्तर पर इसी उपागम का महती अनुप्रयोग है। यह आधारशिला है – जिसकी दीप्ति उनके लेखन में, विश्लेषणों में हर जगह है – फिर वह चाहे आधुनिकता पर उनका लेखन हो, एक सुदीर्घ इतिहास में,  हिन्दी साहित्य के विभिन्न कवियों (सिद्धों से लेकर सूरदास, तुलसीदास, मीरा, महादेवी और प्रसाद आदि) रीतिकालीन साहित्य हो, आधुनिक साहित्य की कृतियां और कृतीकार हों। और यही क्यों, उनका मानना है कि अन्य कलाओं की कृतियों में भी कला की अविरल मानवीय अपील को रेखांकित और संबोधित किए बगैर सौंदर्यबोधी- कला-चिंतन अधर में लटका रहेगा। अत: इसके हित सौंदर्यबोध शास्त्र और समाज दर्शन का आमना-सामना करना ही होगा – तभी कला और जीवन का तादात्म्य फलित होगा –

इसीलिए अजंता के चित्रों में शृंगार करती हुई युवती और दैनिक लौकिक जिंदगी में शृंगार करके खड़ी हुई अपनी प्रिया के प्रति प्रतिबोध में सौंदर्यबोध शास्त्र फर्क न कर सकेगा। हमारे लौकिक जीवन में घटी हुई त्रासदी  तथा भवभूति के उत्तररामचरित में राम की त्रासदी के मानवीय गुणों का समान महत्व हो जाएगा। इस तरह कलामय जीवन तथा जीवनयुक्त कला एक जैसे प्रत्यय बन सकेंगे।[7] अत: उनके अनुसार सौंदर्यबोध का सही आधुनिक संदर्भ होगा – पहले साहित्य और कलाओं का कांत संयोग, तदुपरांत कला-साहित्य और जीवन की द्वन्द्वात्मक एकता ।  

दूसरा महत्वपूर्ण प्रयाण कला एवं कलाकृति को उसके अनिवार्य सामाजिक एवं ऐतिहासिक परिपाठ (context) में समझने का भी है – उसके सामाजिक उत्सों की तलाश से वह सम्पन्न होगा। डॉ. कुंतल मेघ ने जब भी किसी कृति का, कृती कलाकार की कला भावना का डीकन्स्ट्रक्शन किया है – सदा देश, काल, संस्कृति से जोड़कर ही। कला की संरचना के रूप भी समाज के जटिल यथार्थ से दीप्त होते ही हैं।

हमारी प्रति 

 ‘यूनान में त्रासदी की संरचना के पीछे वहां के यथार्थ जीवन एवं इतिहास की आतंकपूर्ण यथार्थता थी – जिसके कारण दुर्भाग्य देवता (नेमेसिस) कुलीन नायक को एक हेमार्शिया (कोई बड़ी भूल) की ओर धकेल देता है। दूसरी ओर आर्य गोत्रों की ऋचाओं में स्वस्ति का अभिषेक हुआ था – आर्यों का ऋत (नैतिक व्यवस्था) के मंगल पक्ष पर प्रबल विश्वास था[8] – अत: यहां जो नाटक का आकृतिबंध उभरा उसमें हत्या का आतंक या त्रासदी के भाव न थे।

तीसरी बात जो उनके इतिहास बोध से ही उपजती है कि तथाकथित भौतिकवादियों की तरह  डॉ मेघ कभी इतिहास का परित्याग नहीं करते – और न ही उसका पुनरुत्थान करते हैं। वे न तो इतिहास के प्रति पूर्वाग्रहग्रस्त हैं – न उसके अंधभक्त। तभी वे इतिहास दर्शन के सच्चे अन्वेषक हो पाए हैं। कहते हैं कि इस के लिए आवश्यक है कि हम नए ज्ञान औजारों का इस्तेमाल करके (सामाजिक विज्ञानों की सहायता से) उसका पुनर्मूल्यांकन करें। नहीं तो कलाशास्त्रों की इतनी ज्योतिर्मयी परंपरा का अतीत हमसे छिन जाएगा।[9] भारतीय सौंदर्यबोध के संदर्भ मे यही हुआ है की या तो वर्तमान से विछिन्न हो हम अतीत मे लुक छिप जाते हैं या फिर उसे सिरे से ही नकार देते हैं।

फिर गतिमान सभ्यता का हर चरण ज्ञान के संधान में अपने लिए विचार के नए औजार और नयी ज्ञान शाखाएँ जोड़ता आया है। जैसे जैसे ज्ञान का क्षितिज व्यापक होता है वैसे वैसे साधक और जिज्ञासु का मानस क्षितिज  भी तो विस्तार पाता है। डॉ. मेघ चूंकि सुपरिगठन के, संस्कृति के रहस्यों के साधक हैंवे ज्ञान की विभिन्न शाखाओं के सहवर्तनमें विश्वास करते हैं, तभी तो उनके निर्वचन में समाज विज्ञान, नृतत्वशास्त्र, मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र, पुरातत्व, राजनीति और दर्शन शास्त्र ही नहींभौतिकी, रसायनशास्त्र, जीवशास्त्र, चिकित्सा के अलावा सायनेटिक्स और सायबरनेटिक्स जैसी अधुनातन प्रशाखाएं भी शामिल हैं। वे आवश्यकतानुसार उनके दृष्टिबिंदुओं और औजारों का प्रयोग करते हैं। इसे लोगों ने घटाटोप भी कहा है- पर है यह सत्य की समग्रता तक पहुंचने का आधुनिक मार्ग ही । वे मानते हैं ज्ञान के समाजशास्त्र का सहस्रदल कमल अक्सर तीन ढंग से खिलता है। (अ) परस्पर व्यवहार द्वारा (आ) शब्दों के रजिस्टरों की अदला बदली से (इ) रूपकों के अंतरबंधन से।[10]

चूंकि सौदर्यबोधशास्त्र स्वयं कलाओं का संश्लेष है तो सौंदर्यबोधशास्त्रीय शोध की प्रकृति भी  अंतर्कलानुशासनो वाली और तुलनात्मक होगी ही। कम से कम दो या उससे अधिक कलाओं का मिलवर्तनकिसी  कलात्मक शोध को सौंदर्य बोधशास्त्रीय शोध में रूपांतरित कर सकता है । 

जैसे सौंदर्यबोधशास्त्र को लेकर एक भ्रांति यह रही है कि यह मात्र अनुभूति केंद्रित है – यानी नितांत वैयक्तिक है- अत: ज्ञानानुशासन नहीं बन सकता, वहीं दूसरी ओर दार्शनिक अमूर्तनों के चलते यह धारणा भी है कि यह ठेठ शुष्क बौद्धिक तर्कजाल है। उसी तरह एक दूसरी भ्रांति सौंदर्य शब्द को लेकर यह भी छायी रही है कि यह केवल सुखकर या सुखात्मक अनुभूति ही है। कैसे यह हम भूल गए कि पारंपरिक भारतीय काव्यशास्त्र में भी स्थाई भावों और रसों की जो गणना हुई हैउसमें यह बात पहले से विद्यमान है – श्रृंगार के साथ-साथ वीभत्स है, रौद्र भी, करुण भी। और यह सब आनंदया रस में ही समाहित है – आनंद का अर्थ क्या हर्षहै? बिल्कुल भी नहीं – यह तो वास्तविक लौकिक अनुभवों से कुछ भिन्न मानसिक कला अनुभव है। मानवीय भाव दशाओं की रेंज नौ रसों में भी काफी व्यापक है और फिर यह भी कभी दावा नहीं किया गया है कि यह अंतिम है – इतिहास, सभ्यता, संस्कृति के बढ़ते कदम इन्हें बदलते भी हैं – इनमें नए-नए भाव जोड़ते भी हैं। उसी तरह सौंदर्यबोध शास्त्र के परिवृत्त में असुंदर, आतंकपूर्ण, कुरूप, कुत्सित और किमाकार को भी स्थान प्राप्त है।

डॉ. मेघ सच ही तो कहते हैं कि कलाओं और उनमें भी दृश्य कलाओं को लेकर दृश्य अनपढ़ताका गहरा सूनापन पसरा है। चित्र, मूर्ति और वास्तु की औसत समझदारी भी हम हासिल नहीं कर पाए। तब इतनी विशाल विरासत तथा धरोहर हमें क्या दे पाएगी? फिर नग्नता और काम को लेकर भी हमारी दृष्टि में विकार आ चुका है। पारंपरिक कला की दृष्टि हमसे ज्यादा स्वस्थ थी।

मेघ अंक

विचारों का इतिहास इस तरह नहीं लिखा जाता कि विचारधारात्मक अंतरों को हम सुनना ही न चाहें। भारतीय दार्शनिक ग्रंथों में एक अद्भुत तरीका था – पहले पूर्वपक्ष को प्रस्तुत किया जाता – फिर उसका खंडन-मंडन करते हुए अपनी स्थापनाएं रखी जाती थीं – पूर्वग्रंथों पर टीकाएं और भाष्य लिखकर भी उन्हें अपने रंग में ढाल लिया जाता था – इस तरह दार्शनिक विवाद का जो क्रम चलता था वह शताब्दियों तक को समेट लेता था (मध्ययुगीन रसदर्शन और समकालीन सौंदर्यबोध की प्रस्तावना)। हर दार्शनिक यही करता है – भट्टलोल्लट का विरोध श्री शंकुक करते हैं और मीमांसा दृष्टि को न्याय दृष्टि में  ढाल देते हैं, श्री शंकुक का विरोध भट्टतौत और भट्टनायक करते हैं .... मध्यकालीन कलाशास्त्रीय इतिहास लेखन की यह तरकीब रही है कि इसमें विरोध को कभी अनुचित नहीं माना जाता बल्कि एक अनवरत संवाद चलता रहता है।

कलाओं के विषय में उनकी आंखें एक स्वप्न देखती हैं जैसे-जैसे धीरे-धीरे एक गुणात्मक परिवर्तन घटित होगा, समाज बदलेगा – कलाओं का संसार भी नागरक और मध्यवर्ग से उतर कर जन-जन के अनुभवों का वाहक होगा – सौंदर्य के रूप बदलेंगे, धारणाएं विकसित होंगी – और तब सौंदर्य भी रति और शोभा की बंद सीपियों से मोती की तरह बाहर आकर कर्म एवं विचार से जुड़ जाएगा।

 



[1] देखिये रमेश कुंतल मेघ, साक्षी है सौंदर्य प्राश्निक (नयी दिल्ली : नेशनल प्ब्लिशिंग हाउस, 1980) पृष्ठ– 316-17

[2] रमेश कुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (नयी दिल्ली : द मैक्मिलन कंपनी आफॅ इंडिया लि., 1977) (प्रस्तावना) 

[3] निहार रंजन रे, एन अप्रोच टू इंडियन आर्ट (चंडीगढ़ : पब्लिकेशन ब्यूरो, पंजाब यूनिवर्सिटी, 1974) पृष्ठ-1

[4] वही, पृष्ठ- 3 से 5 

[5] वही, पृष्ठ- 9 

[6] वही, पृष्ठ- 12 से 16

[7] रमेश कुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (नयी दिल्ली : द मैक्मिलन कंपनी आफॅ इंडिया लि. 1977) (प्रस्तावना)

[8] देखिये रमेश कुंतल मेघ, साक्षी है सौंदर्य प्राश्निक (नयी दिल्ली : नेशनल प्ब्लिशिंग हाउस, 1980) (भूमिका) पृष्ठ– 19

[9] रमेश कुंतल मेघ, मध्ययुगीन रसदर्शन एवं सौंदर्यबोध (नयी दिल्ली, राधाकृष्ण प्रकाशन, 2012) (मुखबंध)  

[10] देखिये रमेश कुंतल मेघ, साक्षी है सौंदर्य प्राश्निक (नयी दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, 1980) (भूमिका) पृष्ठ– 29


बुधवार, जून 22, 2022

मेघ : सौंदर्य चिंतन के आयाम

 


रमेश कुंतल मेघ के समग्र साहित्यिक कार्य पर एक अंक निकालने की योजना पर लंबे समय से विचार चल रहा था। इसमें मुंबई से प्रकाशित चिंतनदिशा पत्रिका मित्रमंडली की अहम भूमिका थी। अंतत: दिल्ली से बनास जन से यह अंक प्रकाशित हुआ। इसका संपादन प्रदीप सक्सेना ने किया। इसमें लगभग दो दर्जन लेखकों ने योगदान किया है। यहां पत्रिका की जानकारी और विषय सूची दी जा रही है। यदि आप पत्रिका पढ़ना चाहें तो बनास जन से संपर्क कर सकते हैं। 



   

शुक्रवार, अक्तूबर 01, 2021

मलिका-ए-ग़ज़ल फरीदा खानम


चमन में रंगे बहार उतरा  

(मलिका-ए-ग़ज़ल फरीदा खानम के संगीत के सफर के साथ चार कदम )

कितना कुछ है इस दुनिया में जो बहुत सुंदर है, बेहद दिलफरेब... और जिन्हें हम अपने मन की सौ सौ परतों में सहेज कर, छिपा कर रखते हैं... न जाने कितनी स्मृतियां, दृश्य, खुशबुएँ, रंग और स्पंदन । इन्हीं में एक है फरीदा खानम की गायकी, उनकी स्पर्शी आवाज़। पूरा एक ज़माना लिपटा चला आता है जब भी उनकी गुनगुनाहट, उनका आलाप शुरू होता है ।

उनकी आवाज़, उनके सुरों और अल्फ़ाज़ का जादू मेरे आसपास शायद तब से घुमड़ रहा है, जब मैं उन्हें ठीक से समझ भी न पाती थी । अमृतसर में लाहौर टी वी खूब देखा जाता था । उसी में दो बड़े कार्यक्रमों के बीच कभी-कभार उभर आने वाली उनकी बेहद खूबसूरत और खुशरंग शख्सियत । याद आता है कि उन्हें श्वेत-श्याम रंगों में देखा था और फिर बहुरंगीय पटल पर भी । अक्सर वे बैठ कर बेहद इत्मीनान से गाती नज़र आतीं । खूबसूरत, कशिश भरा चेहरा, बाकायदा एक परफार्मिंग कलाकार का रखरखाव, सजीली ढब और गीत या ग़ज़ल से पहले उनका सुरीला आलाप ।  याद करूं तो लगता है कि पहले उनके गायन के सुरों ने दस्तक दी होगी, पहले वही मंडराए होंगे और फिर यह सब डिटेल्स दिखनी शुरू हुई होंगी, या फिर.... दोनों एक साथ... कह नहीं सकती ।

संगीत तो अपने आप में एक संपूर्ण कला है ही- इतनी सम्पूर्ण जो तुरंत आपका हाथ थाम  इस लोक से किसी दूसरे रस लोक में आपको लिए चलती है । दूसरी ओर काव्यकला भी कहाँ किसी से कमतर है, शब्दों में ही शब्दों के परे चले जाने वाली कला । और जब इन दो का सम्मिलन हो जाए... कोई ऐसा कलाकार हो जो शब्दों की रूह को संगीत में ढाल दे, संगीत के रंगों से आंकने लगे, तब यह कहना मुश्किल हो जाता है कि कौन किसमें रंग भर रहा है ।  परंपरा में ऐसे मेल, ऐसे संवाद और संयोजन अक्सर चित्र और वास्तु में, वास्तु और मूर्ति में, काव्य और संगीत में घटित होते आए हैं । 

भारतीय संगीत को चार श्रेणियों में बांट कर समझा जाता है । शास्त्रीय (ध्रुपद, धमार, ख्याल) उप शास्त्रीय (ठुमरी, कजरी, चैती, होरी इत्यादि), सुगम संगीत (ग़ज़ल, गीत, भजन इत्यादि) और लोक संगीत ।

तो ग़ज़ल गायकी यों तो सुगम संगीत का रूप है लेकिन जिस गायिका और गायन की बात हम कर रहे हैं वह एक दूसरे अर्थात् उपशास्त्रीय रूप की ओर झुकती है । ग़ज़ल ने देश काल का एक लंबा सफर तय किया है । वह फ़ारसी से उर्दू में आई है । ऊपर जिन चार संगीत रूपों का संकेत किया गया है उनमें अल्फ़ाज़ या शब्दों का महत्व एक सा नही है । शास्त्रीय गायन में शब्द हैं तो सही पर उनका महत्व वैसा नहीं । ग़ज़ल और गीत में शब्द की महिमा बहुत है । जबकि उपशास्त्रीय रूप में शब्द की स्थिति इन दोनों के बीच की है । तो बात मुख्तसर यों कि जब ग़ज़ल गाई जाती है तो दो पूर्ण कलाओं के मेल की अन्यतम मिसाल हो जाती है ।  लेकिन बात तो फरीदा खानम की चली थी- शायद वे और ग़ज़ल इतने अभिन्न हो गए हैं कि बात ग़ज़ल की तरफ अजाने ही फिसल गई । उनकी आवाज़ से रिश्ता तो पुराना है पर उनके जीवन के कुछ बिखरे से टुकड़े हाल ही में पता लगे । उनके बारे में यहां वहां थोड़ा  पढ़ते, सुनते हुए पता चला कि वे सन 1935 में कोलकाता में जन्मीं । उनका परिवार बड़ा संभ्रांत, सुसंस्कृत एवं कलानुरागी परिवार था । अपने अतीत पर बात करते हुए तमाम  इंटरव्यूज में वे अपनी बड़ी बहन मुख्तार बेगम (mukhtar begum) को बहुत याद करती हैं जो न केवल पारसी थिएटर की मशहूर अदाकारा थीं बल्कि महान् गायिका भी थीं और बाद में  फिल्मों में भी आई थीं । वे बुलबुल-ए-पंजाब कहाती थीं । [1]  मुख्तार बेगम पारसी थिएटर के बड़े लेखक आगा हश्र काश्मीरी की पत्नी थीं । फरीदा खानम को संगीत का संस्कार घर से ही मिला था और खासकर अपनी बड़ी बहन मुख्तार बेगम से । उनकी पूरी शख्सियत को वो तरह तरह से याद करतीं हैं । उनके गले में बेहद मीठी तानें बसी हुई थीं । जिस राह पर चल कर फरीद खानम ने इतनी इज़्ज़त और संगीत प्रेमियों का प्यार पाया, वह राह उनकी बहन ने ही उनके लिए सिरजी थी । मुख्तार बेगम कलकत्ता के मंच का सितारा थीं । उनकी गाईं ग़ज़लें... मेरे काबू में   न मेरा दिल नाशाद आया और  चोरी कहीं खुले न  नसीमे  बहार की... खुशबू उड़ा  के लाई है जो  गेसुए यार की... बेहद प्रसिद्ध थीं ।

फरीदा खानम जब सात साल की नन्ही बच्ची थीं, तभी से मुख्तार बेगम उन्हें संगीत की शिक्षा दिलवाना चाहती थीं और बड़े गुलाम अली से उन्होंने इस सिलसिले में गुजारिश की थी । खां साहब ने आगे आशिक अली खां को यह दायित्व सौंपा था । आशिक अली खां यों तो युवा थे पर उनकी तबियत दरवेशों जैसी थी शायद इसीलिए वे बाबा जी कहाते थे । जब उनकी बहन विख्यात पटियाला घराना के उस्ताद आशिक अली खां के पास उन्हें ले गईं थीं और तब वहीं से शुरू हुआ था एक मासूम नन्ही बच्ची का शास्त्रीय संगीत का कठिन रियाज । उन्होंने ही उन्हें दादरा, ठुमरी और खयाल गायकी की शिक्षा दी । उनकी आंखों में कई यादें कौंधती हैं, कई झिलमिलाती हैं, और मंद स्मित से कहती हैं कि उन्होंने संगीत के लिए छड़ी की मार भी खाई है, रोई भी बहुत हैं । वे याद करतीं हैं कि कैसे वे रागों का रियाज़ करवाते थे । सुबह भैरव के सुर लगवाते, शाम को यमन और भीम पिलासी के । सुरों का  नियंत्रण उन्होंने सिखाया, कभी प्यार से तो कभी डांट के ।  वे जितने ही अनुशासनप्रिय थे, नन्ही फरीदा का मन उतना ही रह कर भागने को और खेलने को मचलता ।[2]  पर उसी कठिन श्रम और प्रशिक्षण का ही फल है कि वह आज ऐसे निर्बाध रूप से  गाती हैं जैसे बल खाती हुई कोई नदी अपना रास्ता खुद बनाती बहा करे ।

कोलकाता में जन्मी फरीदा का बचपन बीता अमृतसर में । पाकिस्तान के युवा लेखक और स्वयं अच्छे गायक अली सेठी बताते हैं कि कुछ साल पहले जब वागा की सरहद को लांघ फरीदा खानम भारत में अमृतसर आईं तो वह अपना छूटा हुआ घर देखना चाहती थी, उसी की तलाश में आईं थीं जो घर 1947 के बदकार माहौल में छूट गया था । अली सेठी बताते हैं कि शहर थोड़ा तो बदला था लेकिन पुराना शहर इतना भी न बदला था । फरीदा जी बड़ी सहजता और तत्परता से बताती गईं  वे तमाम मोड़ और वे तमाम गलियां जो शायद रगों की तरह उनके अपने अंदर भी फैली हुई थीं । वे कहती हैं कि बचपन में मीठी गोलियां खरीदने हाथ में दो पैसे लेकर घर से निकलते थे... पैदल... तो क्योंकर वे रास्ते कभी भूल सकती हैं । लेकिन जिस बचपन के घर की खोज में वे निकलीं थी, वह घर उन्हें कहीं दिखा नहीं । वे आगे कहती हैं कि वे बड़े अच्छे दिन थे ।  [3]    

उनमें कतई बड़बोलापन नहीं, ज़रा सा भी दर्प नहीं, बखान नहीं, सब करनी गुरु की है ।  क्या उनकी कला जन्मजात है, पूछने पर वे नकार देती हैं।  बड़ी ईमानदारी से वे मानती हैं कि उनका हुनर जन्मजात नहीं । कहती हैं कि आवाज़ ईश्वर की देन हो सकती है पर संगीत तो गहन श्रम से सीखना पड़ता है, राह बनानी पड़ती है, अर्जित करना पड़ता है । अपनी गायकी का सारा श्रेय वे क्लासिकी संगीत की तरबियत को ही देती हैं । कहतीं हैं कि संगीत की तमाम धाराएं, तमाम रूप क्लासिकी स्रोतों ही से तो निकले हैं ।

यह  पूछने पर की ठुमरी और ख्याल गायकी की जगह उन्होंने ग़ज़ल को क्यों चुना तो फरीदा कहती हैं कि उस समय रागदारी के आसमान पर बहुत से चमकदार सितारे थे... उमेद अली खां, नज़ाकत-सलामत अली, अमानत अली खां, रोशन आरा बेगम, इकबाल बानू, बरकत अली खां, तो मैंने तय किया कि इनके सामने रागदारी क्या करूँ... और यों शुरू हुआ गज़ल का सफर । और उन्होंने ग़ज़ल को ही अपने लिए चुन लिया । [4] ग़ज़ल का खास रोमानी अंदाज़ उन्हें खूब भाया । हालांकि ठुमरी अंग की ग़ज़ल गायक़ी का उनका ये अंदाज फूटा था क्लासिकी रागों की तरबियत ही से । वे बेगम अख्तर की ग़ज़लें सुनते हुए बड़ी हो रही थीं... और उनकी एक खास ग़ज़ल अक्सर गुनगुनाया करतीं...

दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे ।

वर्ना कहीं तकदीर  तमाशा  न बना दे...

और यों संगीत के सुरों की, लफ़्ज़ों की, अबूझ भावों और अर्थों से जन्मी दीवानगी उन पर तारी होती चली गई । वे याद करतीं हुई बताती हैं कि 1947 में एक महीने तक उनका परिवार मौजूदा पाकिस्तान के पहाड़ी स्थल मरी में ठिठुरता रहा... और वहीं उन्होंने सुना कि दो देश बन गए... और वे घर न लौट सकीं। वहां से फिर शहर शहर भटकना हुआ... रावलपिंडी, कराची, शायद पेशावर भी। न जाने कितने घर बदले, लेकिन घर से बेघर हुए परिवार को कहीं राहत और सुकून न मिल पा रहा था । रावलपिंडी के एक घर को याद करती हुई वे कहती हैं कि वह सिखों की छूटी हुई बहुत बड़ी हवेली थी। उसमें वे, उनकी माँ और दो छोटे भाई । चारों तरफ कमरे और बीच में बड़ा सा सहन । लेकिन उनकी मां के दिल मे डर समा गया । उन्हें लगता कि कुएं से कोई रूह रात में निकलती है और भटकती है । अतः डर से वह घर भी छूटा । वे आगे बताती हैं कि हर शहर का भी अपना चरित्र और मिज़ाज़ होता है... रावलपिंडी में बसने की सोची तो वहां इतना ज्यादा पर्दा था कि क्या कहिये... संगीत का तो नाम ही लेना मुश्किल था । खैर किसी तरह लाहौर आये और वहीं रहना हुआ । वहीं विवाह हुआ । रेडियो में पहला प्रोग्राम शायद 1950 में हुआ । वे काफी छोटी उम्र में रेडियो पाकिस्तान की गायिका बनीं और फिर टेलीविज़न और संगीत के कॉन्सर्ट्स में गातीं रहीं । [5]

आज बेगम अख्तर के बाद ग़ज़ल की मलिका कही जाने वाली फरीदा ख़ानम की ज़िंदगी में  तीन पड़ाव महत्वपूर्ण लगते हैं, जिन्होंने शायद भीतरी छटपटाहट को और दुर्दम बनाया होगा । यों तो पिता की मृत्यु जल्दी हो गई थी । फिर भी पहला बड़ा उखड़ाव 1947  में हुआ जब फ़िज़ा धार्मिक उन्माद के विष से भर गई और अपने ही घर से बेघर हो जाना पड़ा । इसके बाद एक 'घर' की तलाश बनी रही....  लेकिन शायद स्थाई घर उन्हें संगीत के सुरों, शायरों की ग़ज़लों, गीतों और नज़्मों में ही मिल पाया।  पीछे जो वक्त और घर छूटा, बंगाल हो या पंजाब... वहां शास्त्रीय संगीत की शमाएं जल रहीं थीं, आगे जो वक्त आया, वहां भी संगीत के सहारे उन्होंने अपना घर, अपनी पहचान रची और  कैदे हयात  से अपने सुरों के पंखों पर सवार ऊपर उठती गईं । इसी के सहारे लांघीं, उन्होंने औरत होने की सीमाएं, देशों की सरहदें, धर्म और जाति के बंधन । उनकी आवाज़ हवा की तरह बहती रही... दरियाओं, समंदरों को लांघदुनिया के हर सरगोशे तक जा पहुंची ।

उनकी ज़िंदगी का दूसरा मोड़ था उनका विवाह और अपना एक परिवार बसाना । वे कहती हैं कि यह ज़रूरी था, और इससे बहुत कुछ पाया भी- पर संगीत बिल्कुल  बंद था । इसके लिए गुंजाइश नहीं बन पा रही थी । वे साफ कहती हैं कि रियाज़ भी बिल्कुल नहीं हो पाया । जो हुआ सो पहले ही हुआ । लेकिन फिर कराची में एक बड़ी कान्फ्रेंस हुई जिसमें पाकिस्तान के तमाम गुणीजन पधारे । वहां फरीदा खानम भी गईं । और उन्होंने फैज़, दाग़ और आगा साहब की ग़जलें गाईं और उसके बाद उनका गाने का सिलसिला चल निकला ।

उनके संगीत के लिए तीसरा और अजब दौर  1980 के दशक में तब सामने आया, जब पाकिस्तान में धार्मिक कानून अर्थात शूराक्रेसी (जनरल जिया उल हक का दौर) लागू हुई । इसी समय अफगानिस्तान में रूसी हस्तक्षेप हुआ । और धार्मिक कट्टरता के दौर में फरीदा खानम पर भी हज़ार बंदिशें लग गईं ।

उनकी  गायीं कई  ग़ज़लों के  शब्द कानों में गूंजते हैं

और उनमें व्यक्तिगत एवं सामाजिक त्रासदियों की अबूझ से अनुगूंजें सुनाई  देने लगतीं हैं-

है यहां नाम इश्क़ का लेना, अपने पीछे  बला लगा लेना । (मौलाना  मुहम्मद अली जौहर का कलाम, राग नट नारायण एवं देसी तोड़ी के सुरों का मिलाप) या फिर शायर अतर नफ़ीस की यह ग़ज़ल...

वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया, अब उसका हाल बताएं क्या

 कोई मेहर नहीं कोई कहर नहीं, फिर सच्चा शेर सुनाएं  क्या ।

...

वो ज़हर जो दिल मे उतार दिया, फिर उसके नाज़ उठाएं क्या...।

एक आग ग़मे तन्हाई की, जो सारे बदन में फैल गई, जब जिस्म ही सारा जलता हो,

फिर दामने दिल को बचाएं क्या ।

फरीदा ख़ानम की आवाज़ का टेक्सचर बेहद अलग है । बहुत ऊंचे स्वरमान पर गाने वालों से बेहद अलग उनका कुछ नीचा स्वरमान, थोड़ी भारी, कुछ कुछ ऐन्द्रिय सी आवाज़, बेमालूम सी खराश लिए जैसे कोई खूबसूरत ग्रेन हो आवाज़ में । आवाज़ का यह स्पर्शी गुण उन्हें सब से अलग कर देता है ।

उनकी छवियां याद आती हैं, साड़ी का पल्ला एक कांधे से घुमा कर दूजे कांधे पर लपेटे, खूबसूरत काली आंखों में काजल, आंखों में चमकते चाँद, काले बालों में फूल, झूमते  झुमके... और बेहतरीन शायरों के कितने नाज़ुक, कितने गहन, कितनी खलिश भरे अशआर ।  ग़ालिब से लेकर  दाग देहलवी, अमीर मीनाई, अल्लामा इकबाल, फ़ैज़, मुनीर नियाज़ी, आगा हश्र काश्मीरी से लेकर शकील बदायुनी, सलीम गिलानी तक। इन्हें वे इतने भाव से गातीं कि शेर के मानी और वे मानो एक  हो गए हों । एक एक  पंक्ति के अर्थ... या कि अर्थ नहीं बल्कि अनुभव खुल-खुल पड़ते, और सीधे दिल मे उतर जाते । उनका यों आना और गाना मानों चमन में रंगेबहार (मुनीर नियाज़ी) का आना होता... ग़ज़ल तो अब भी गाई जाती है पर ऐसी ग़ज़ल तो नहीं । इस तरह की शैली के पीछे बड़ी पुख्ता शास्त्रीय पकड़  है । राग-रागिनियों के स्वर संसार में फरीदा ख़ानम  बेलौस घूमती हैं, गाते वक्त तरह तरह से नवोन्मेष करती  हुईं । उनका कहना भी है कि वे शब्दों के अर्थों के अनुरूप सुर लगाती हैं, तभी तो अर्थ भाव बन जाते हैं।

ग़ज़ल के एक एक शब्द में, एक एक पंक्ति में तहों के भीतर तहें छुपी रहती हैं... जो गाते वक्त इम्प्रोवाईजेशन से उन्मीलित होती हैं- कहीं वियोग का छटपटाता दर्द, कहीं अनख, स्वाभिमान, कहीं सदा और पुकार... कहीं भावों का आरोहण कहीं गहन समर्पण और अवरोहण, उतराईयां, दर्शन के तल और दृष्टियां । लेकिन यह सब उभारती हैं ख़ानम अपनी संवेदना और कला के सहारे से । कभी यों भी लगता है कि वह शायर की भावनाओं को केवल अपने सुर नहीं बक्श रहीं हैं, बल्कि उनकी गाई हुई ग़ज़ल उनकी अपनी सांगीतिक एवम् भावमय व्याख्या बन जाती है । कुछ कुछ उसी तरह जैसे शेक्सपीयर के पात्रों को हर अदाकार अपनी अपनी तरह जीता, और व्याख्यायित करता है । ऐसे में ग़ज़ल उनकी अपनी ग़ज़ल हो जाती है, उनके भीतर समा जाती है, रक्त कणों में बहती है, रगों में उतर जाती है तब बाहर आती है । श्रोता भी एक ही ग़ज़ल में कइयों को सुनता है, शायर को, गायक को, लेकिन इन सब के माध्यम से वह भी तो अपने अनुभव संसार की परतें खोलता है, सर धुनता है और अश अश कर उठता है । शायर, गायक, श्रोता, सब प्राण ज्यों एक होकर धड़कने लगते हैं, स्तब्ध, दम साधे गुम होते जाते  हैं... । बद्धताएँ, ग्रंथियां, और पीड़ाएँ घुलती जाती हैं, कुछ भी पराया नही रहता, सब अपना हो जाता है । कुछ ऐसे

रात जो तूने दीप बुझाये, मेरे थे

अश्क जो तारीकी ने छुपाये मेरे थे।

मेरे थे वो ख्वाब जो तूने छीन लिए

गीत जो होंठों पर मुरझाए, मेरे थे (सलीम गिलानी)  



[3] वही, भाग एक (यू ट्यूब)