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आंगन में मंदिर के ऐन मुख पर, यानी शुरुआत में नंदी की भारी भरकम प्रतिमा है, जो धर्म एवं आनंद का ही प्रतीक है। नाटय कला में यह नांदी पाठ के शुरुआती अनुकर्म में भी फलित होता है। संभवत: इस पशु प्रतीक का संबंध एक कृषिमूलक सभ्यता की शुरुआत से हो। इसी नंदी के पीछे एक बड़ा चौकोर गढ़ा है जो यजन (यज्ञ) के काम आता है। पुरातत्त्व के विद्वानों का मानना है कि लिंग, मातृमूर्तियां, नाग-यक्षों जैसी प्राकृतिक शक्तियों की पूजा द्रविड़ों से आई है और फिर पूजा में भक्तिपरक मनुष्याकार मूर्तियां भी वहीं से विकसित हुईं। आर्यों के प्रतीक अमूर्त थे। डॉ. कुमारस्वामी का मानना है कि द्रविड़ों की मूर्ति पूजा ने आर्यों के यजन पर विजय पा ली। इस मंदिर में तो अनेक सांस्कृतिक धाराओं का संगम दिखता है। मुख्य पिंड तो शिवलिंग ही है, पर मंदिर का वैभव तो नाना रूप सृष्टि के सशरीर प्रतिअंकन का ही परिणाम है। शिखर शैली के बैजनाथ मंदिर का वास्तु क्रमश: तीन स्तरों वाला और सीढ़ीदार है। ये तीन स्तर धीमी उठान में उठते जाते हैं। पहला द्वार मंडप, दूसरा सभा मंडप, अंतराल और फिर विमान। द्वार मंडप को भोग मंडप भी कहा जाता है। उसके बाद मुख्य सभा मंडप से पहले नाटय मंदिर का भाग होता है जो नृत्य एवं कीर्तन आदि के लिए प्रयुक्त होता है। इसके बाद सभा मंडप या जगमोहन। उसके आगे एक छोटा अंतराल और फिर गर्भगृह।
मंदिर में प्रवेश से भी पहले मंदिर की दीवारों और स्तम्भों पर नजरें अटक जाती हैं। हर अंश चित्रित है, उत्कीर्णित है - जीवन की गति से गतिमान - कोई कथा सुनाता हुआ - किसी गहन विचार को मूर्त करता सा या फिर किसी पुरा ऐतिहासिक क्षण को जीवित करता हुआ। मिथकीय रूपों के जरीए जीवन के अगम रहस्यों को सहजता से खोलता हुआ। प्रो. टकी कहते हैं,

जब हम भारतीय स्थापत्य एवं शिल्प के सामने होते हैं तो हम केवल उसके सौंदर्यात्मक मूल्य पर ही मुग्ध नहीं होते वरन् हम एक ऐसे प्रतीक को परत दर परत खोल रहे होते हैं जिसमें सदियों पुरानी चेतनाएं छिपी हैं। एक छवि, एक मूर्तिकरण - एक ऐसी किताब है जिसमें वैश्विक आद्यरूपों (आर्केटाइप्स) की आदिम झलक पराभौतिक भाषा में व्यक्त होती है। भारतीय कला केवल वस्तुओं को उद्भासित नहीं करती, बल्कि उच्चतर विचारों, जटिल समाधि अवस्थाओं और बिजली सी कौंधती अन्तर्दृष्टियों को व्यक्त करती है।




