मंगलवार, जनवरी 22, 2013

रामविलास का संगीत दर्शन




रामविलास शर्मा हमारे समय के एक गम्भीर अध्येता, मर्मी आलोचक और विचारक रहे हैं। दीर्घ काल तक व्याप्त उनके महत् कार्य का, उसके विभिन्न पक्षों-पहलुओं का ईमानदार मूल्यांकन शायद अब शुरू होगा।
 
उनके लेखन और उनकी सोच के रूबरू तो छिटपुट ढंग से हिंदी का सामान्य से सामान्य पाठक भी होता रहा है - कभी छायावादी कवि निराला पर उन्हें पढ़ते हुए, तो कभी नयी कविता और अस्तित्ववाद से गुज़रते हुए। वे एक ओर वृन्दावन लाल वर्मा, प्रेमचंद और नागर जी पर लिख रहे थे तो दूसरी ओर बंगला के कृती पुरुषों रवीन्द्र और शरत् पर भी बेहद बेबाक ढंग से सोच रहे थे। अंग्रेज़ी साहित्य के तो मर्मी अध्येता वे थे ही, रूसी लेखकों में लियो तोलस्तोय से लेकर बोरिस पास्तरेनाक के साहित्य की भी व्याख्याएँ कर रहे थे। संस्कृत में वाल्मीकि और भवभूति और कालिदास पर लिख रहे थे दूसरी ओर युनानी त्रासदियों और शेक्सपियर के नाटकों के पात्रों की मूल्य चेतनाओं की पड़ताल करते दिखते थे।
 
साहित्य तो उनके चिंतन-मनन का केन्द्र था ही - लेकिन भाषाविज्ञान, दर्शन, इतिहास, और कलाएँ भी उनका विषय थी। फिर देश और काल के ओर-छोर तक पसरा उनका यह लेखन साधारण लेखन या एकायामी समीक्षा भर न था। वे कृतियों की दुनिया में अपनी समाज दृष्टि और इतिहास दृष्टि के साथ प्रवेश कर रहे थे, कुछ ऐसे कि साहित्य के पात्रों, उनके भावों, उनके स्वप्नों, शब्दों और तमाम उपकरणों में एक समाज, एक युग एवं दौर की तमाम प्रवृत्तियों का प्रतिबिंब गोचर रूप में उभर आता था।
 
मार्क्सवाद या फिर द्वन्द्वात्मक ऐतिहासिक भौतिकवाद की मूल चेतनाओं को आत्मसात कर उसे अपने चिंतन-विश्लेषण का आधार बनाकर आगे बढ़ रहे थे - आज तक भी जब बडे़ बडे़ धुरंधर इस सब पर शास्त्रीय बहस-मुवाहिसों में लगे हैं - और वितंडा कर रहे हैं, रामविलास उसे प्रखरता से 'एप्लाई' कर रहे थे। लेकिन ऐसा भी नहीं कि मार्क्सवाद के यथार्थ की मिररिंग वाले सिद्धांत को अपना कर वे सरलीकरण कर रहे थे - वे काफ़ी सतर्क और सावधान विचारक रहे हैं। सामन्त युग की रौशनी में जब वे कालिदास को पढ़ते हैं या कालिदास में सामन्त युग को पढ़ते हैं तो यह भी कहते हैं - ''कालिदास का साहित्य उस काल की समाज व्यवस्था को प्रतिबिंबित करता है, साथ ही उसका बहुत बडा़ भाग उस व्यवस्था से मुक्त होकर एक कल्पनालोक की सृष्टि भी करता है। इसलिए कालिदास में जो कुछ भी मिले, उस सभी को हम उस युग का सामाजिक यथार्थ नहीं मान सकते।''1
 
इसी तरह वे शेक्सपियर के दुखांत नाटकों के पात्रों ब्रूटस, हैमलेट, क्लौडियस, मैकवेथ, लेडी मैकवेथ, किंग लियर की बेटियाँ और डेस्डीमोना, इआगो नैतिक बोध और द्वन्द्व की व्याख्या कर यूरोप के नवजागरण के अंधेरे उजले कोने उभार देते हैं। और द्वन्द्ववाद और ऐतिहासिकता के दर्शन के आधार पर ही वे सदा चीज़ों में, कलाओं में, प्रघटनाओं में संबंध-सूत्रों की तलाश करते रहे। क्योंकि कोई भी चीज़ नितांत स्वायत्त और कट कर जन्म नहीं लेती। इसीलिए यूरोप के नवजागरण को समग्रता में समझने के लिए वे विभिन्न कलाओं, दर्शनों, विज्ञान एवं अर्थव्यवस्था को जोड़ कर देखा करते हैं। और भारतीय नवजागरण के बारे में कहते थे कि यह अकारण नहीं कि ताजमहल, तुलसी और तानसेन एक ही युग की उपज हैं। वे निरन्तर तुलनाएँ करते, पूर्व और पश्चिम की, वहाँ की कृतियों और व्यक्तियों की, (भरत के साथ प्लेटो अरस्तू) साहित्य एवं संगीत की, दर्शन एवं साहित्य की, लोकभाषाओं और लोकसंगीत की, ... और तब कोई स्थापना रखते।
 
ऐसे संवेदनशील और जिज्ञासु रामविलास अगर संगीत के इतिहास और नवजागरण से उसके संबंधों के बाबत गैर मामूली स्थापनाएँ करते हैं, तो हैरानी क्यों होनी चाहिए। संगीत ही नहीं उन्होंने नाटक, चित्र से भी गहरा प्रेम किया था। संगीत के प्रति उनका अनुराग इतना ज्यादा था कि वे हर कीमत पर गायन सीखना चाहते थे, वायलिन और तबला भी वे बजाते थे। वे लिखते हैं - ''मैंने तय कर लिया है कि मुझे म्यूज़िक सीखना है, म्यूज़िक उतना ही सुंदर है जितनी कि कविता, शायद उससे भी सुंदर। कविता के आनन्द का चाहे आप वर्णन कर दें ... मुख्य कारणों को भी ढूंढ़ निकालें, पर संगीत का आनन्द केवल हृदय से ही जाना जा सकता है।''2 या ''हर कला का अपना माध्यम होता है। हर कला का अपना स्थापत्य होता है, अपनी चित्रमय व्‍यंजना होती है। संगीत का माध्यम नाद है। नाद ऐसी संवेदनाओं को जगा सकता है, जिन तक अन्य कलाओं की पहँच मुश्किल है।''3
 
संगीत पर लिखी इस पुस्तक में रामविलास जी के बेटे विजय मोहन शर्मा ने उनके संगीत के निजी संग्रह की भी बानगी प्रस्तुत की है। उसमें हिन्दुस्तानी संगीत के दिग्गज गायकों और वादकों के कैसेट हैं (मल्लिकार्जुन मंसूर, पलुस्कर, उ. फैयाज़ खां, बडे़ गुलाम अली खाँ, भीमसेन जोशी, सिद्धेश्वरी देवी, किशोरी अमोनकर, रविशंकर, बिस्मिल्लाह खां, अलाऊद्दीन खाँ) तो कर्नाटक संगीत की विभूतियाँ भी हैं, शास्त्रीय संगीत के साथ श्मशाद बेगम और मुहम्मद रफ़ी के भी वे प्रेमी थे। पाश्चात्य संगीत की सिम्फनी रचनाओं को भी वे विभोर होकर सुनते थे और सुनते हुए प्रकृति के भू दृश्यों की कल्पना करने लगते थे। उन्हें बारव और मैण्डलसौन जिन्होंने ब्रिटेन के उत्तर में समुद्र तट पर बैठ कर संगीत रचा था, बेहद पसंद थे।
 
और इसी अनुराग का सहज फल यह था कि न केवल संगीत के अनुभव में वह डूबते, उतराते, भीगते रहे बल्कि वह संगीत के विषय में निरन्तर पढ़ते, सोचते और लिखते रहे। बचपन से लेकर जीवन के अंतिम वर्षों तक संगीत उनके अंग संग रहा। यहाँ तक कि वे संगीत की थरोप्यूटिक भूमिका को भी अपने पर आज़मा रहे थे। उनको निकट से जानने वालों ने यह भी लिखा है कि वे जब संगीत सुनते थे तो बाकी सब काम बंद कर देते थे- सभी इन्द्रियों को साथ ले, मन और आत्मा के संग वे संगीत के लोक में कदम धरते थे।
 
ऐसे मनस्वी रामविलास जी संगीत के इतिहास की खोज में ॠग्वेद के सूक्तों से लेकर नाट्यशास्त्र, अमीर खुसरो और संत, सूफ़ी और भक्तों के साहित्य और अन्तत: ब्रिटिश काल तक जाते हैं। इन्हीं में वे त्यौहारों और लोकसंगीत, लोकसंगीत और भाषाओं के प्रखर, लोकसंगीत और दरबारी संगीत, मज़हबी दृष्टिकोण और हिंदी जाति का अविभाजित संगीत, अरब और ईरान और ब्रिटिश युग की अंधकारमयता के बेहद ज़रुरी मुद्दे उठाते हैं - और तुलनात्मक तौर पर कभी कर्नाटकी संगीत परंपराओं से तो कभी वृहद फलक पर योरुप के नवजागरण के संगीत की चर्चा करते हैं।
 
जिस तरह रामविलास जी ने ॠग्वेद के सूक्तों में चित्र, नृत्य संगीत की संवेदनाओं और डिटेल्स को उभारा है, वह बेहद चामत्कारिक है। वेदों की मानवीय और यथार्थवादी व्याख्याओं के एवज़ उन्हें तथाकथित प्रगतिशीलों का कोपभाजन बनना पडा़ था - पर रामविलास जी ने ऐसी जड़ताओं और हदबंदियों को कब माना। वे साफ़ साफ़ कहते हैं -''ॠग्वेद को अगर कोई धर्मग्रन्थ या कर्मकांड समझता है तो समझा करे। मेरे लिए तो वे दार्शनिक काव्य के अनुपम ग्रन्थ है।''4
 
सूक्तों की उपमाओं में, क्रियापदों या बिंबनों में उन्हें वैदिकों के जीवन की झलक दिखने लगती है और वे रहस्य के पर्दों को उठा कर देखते हैं तो उन्हें रथकार के चक्र और अराएँ दिखती हैं जो चित्र और स्थापत्य का आधार है - रथ का यही पहिया कालचक्र बन जाता है, ॠग्वेद का कवि जिसे घुमाता है। सूक्तों में सूर्य आकर अंधकार को ऐसे समेट देता है जैसे चमडे़ का कारीगर समेट देता है - या अंधकार को समुद्र में चमडे़ की तरह डुबोता है। चित्रकला की अद्भुत संवेदना जगती है मरुतों के वर्णन में जो श्याम तुरंगों पर बैठे, सुनहले मुकुट और अस्‍त्र लिए आते हैं और अपने रथों से धरती पर कोष बरसाते हैं। रामविलास जी कहते हैं ये कोष बादल हैं और वे जो धन बरसाते हैं वह जल है। फिर उषाएँ आती हैं और अंतरिक्ष और द्युलोक को ही नहीं धरती को भी प्रकाश और रंगों से भर देती हैं, पूरब का दरवाज़ा खोलती हैं कि प्रकाश अंधकार से बाहर आ जाए।
 
नृत्य की छवियों के विवेचन के बाद रामविलास संगीत के वाद्यों के बीसियों नाम और उनके संदर्भ खोज लेते हैं। हर सूक्त को पढ़ते हुए रामविलास जी की कल्पना भी पश्यन्ति हो उठती है। वे वीणा और मजीरे जैसे वाद्यों को सुनते हैं और सात सुरों के संदर्भ भी ढूंढ़ लेते हैं। सबसे बढ़कर तो यह कि रामविलास जी वैदिक ॠषि को ॠषि न कहकर 'कवि' कहते हैं - ''पक्षी का स्वर सुनकर न कवि को इस बाजे (कर्करि) की याद आती है।''5
 
इसी तरह रामविलास जी भरत मुनि के नाटयशास्त्र की अन्वीक्षा करते हैं जो कलाओं (नाटय, नृत्य, संगीत) के सामंजस्य की, सहअस्तित्व की, और समाहार की भारतीय दृष्टि को सामने रखता है। वे नाटयशास्त्र के विशद हवालों के साथ साथ उसकी मूलवर्तनी, विचारों की लोकायतिक चेतनाओं, और ज़मीन के नीचे बहने वाली अन्त: सलिलाओं को डीकोड करते हैं। इस प्रयत्न में भी वे उसी युग के दो और प्रतिनिधि ग्रंथों को भी समकोण पर रख लेते हैं। शारीरिक रोगों पर लिखा ग्रन्थ चरक संहिता और राजनीति अर्थनीति और समाज व्यवस्था पर लिखा ग्रन्थ - कौटिल्य का अर्थशास्त्र। वे लिखते हैं - '' 'नाटयशास्त्र', 'चरक संहिता', 'कौटिल्य का अर्थशास्त्र' एक ही युग की संस्कृति प्रतिबिंबित करते हैं। तीनों ही यथार्थवादी लोकायत पंरपरा से प्रभावित हैं। एक में साहित्यशास्त्र है, दूसरे में शरीर विज्ञान और तीसरे में समाज विज्ञान और तीनों का उद्देश्य लोकरंजन, लोकोपदेश और लोक-उपकार है। यहाँ भी वे प्लेटो और अरस्तू के काव्य एवं नाट्य दृष्टियों से भरत की तुलना करते हैं और साबित करते हैं कि भरत का दृष्टिकोण कलाओं के प्रति ज्यादा स्वस्थ और सकारात्मक और ट्रांसेन्डेटेल है। प्लेटों के लिए तो काव्य एवं कलाकार भावावेश भड़काने वाले हैं, अरस्तू मानसिक भावों का रेचन नाट्य से करना चाहते हैं - पर भरत तो आनन्द की भूमि तक संतप्त मानवता को ले जाना चाहते हैं - वे भावों को रोग नहीं - रस का आधार मानते हैं। नाट्यशास्त्र विषयक 'मिथकों' को रामविलास जी यथार्थपरक संभावनाओं से खोलते हैं कि कैसे 'स्वर्ग में नटों को ॠषियों ने शाप दिया और नाटक धरती पर आ गया।' वे कहते हैं कि ये ॠषि दरअस्‍ल भरतकालीन पुरोहित थे और अपने उपहास पर क्रुद्ध हो गए थे और यों नट शूद्र वर्ण में रख दिए गए। संगीत का विवेचन करते हुए भरत सात स्वरों की 'प्रकृति' की चर्चा करते हैं। संगीत से रसों के संबंध के बारे में वे कहते हैं - 'मध्यम' और 'पंचम' स्वर की बहुलता होने पर हास्य और शृंगार... गांधार और निषाद की बहुलता से करुण रस... आते हैं। रामविलास जी का निष्कर्ष है कि यों 'नाट्यशास्त्र' में शास्त्र शब्द जुडा़ है पर उसमें शास्त्रों जैसी जकड़बंदी कहीं नहीं। और सर्वत्र लोक एवं कारीगर एवं अभिनेता का दृष्टिकोण प्रमुख रहा है।
 
रामविलास जी ने संगीत के बारे में जो भी स्थापनाएँ रखी हैं, उसकी ज़मीन आचार्य बृहस्पति की खोज एवं विचारों से बनी है। और रामविलास जी उसमें अपनी दृष्टि मिलाकर हिंदी के पाठक को बहुत कुछ देते हैं। जैसे हंगरी रूस मंगोलिया के लोक संगीत में आचार्य बृहस्पति को भारतीय राग (भोपाली, दुर्गा, मालकोंस, इत्यादि) साफ़ सुनाई पड़ते हैं - जिसे रामविलास जी भाषा विज्ञान की अपनी समझ के टुकड़ों से जोड़ कर पूर्ण कर लेते हैं।
 
स्पष्ट ही हंगरी निवासी मग्यार जनों के पूर्वज जब हमारे पडो़सी थे, तब यह लोकसंगीत निर्मित हुआ था। मग्यार भाषा तुर्क-मंगोल परिवार की है और इस परिवार के अनेक भाषिक तत्त्व द्राविड़ परिवार में सुलभ हैं।6
 
यों भी यह एक ज्ञात तथ्य है कि शास्त्रीय रागों की उत्पत्ति लोक संगीत के स्वर समूहों से हुई है और रामविलास शर्मा भी इस बात को पुरज़ोर ढंग से रेखांकित करते हैं। वे कहते हैं कि जैसे भाषा के इतिहास लेखन के लिए लोक भाषाओं का सर्वेक्षण करना अनिवार्य है वैसे ही संगीत के इतिहास लेखन के लिए लोकगीत का सर्वेक्षण अनिवार्य है। इस दृष्टि से वे चार चरणों वाली एक क्रमबद्ध योजना भी पेश करते हैं। इनमें देशों का घेरा व्यापक होता जाएगा।
 
यूरोप और भारत के इतिहास की तुलना करते हुए रामविलास जी बडे़ मार्के की एक बात कहते हैं कि भारत का भक्ति आन्दोलन धार्मिक सुधार और सामाजिक नवजागरण दोनों भूमिकाएँ अदा कर देता है पर यूरोप में ये दो अलग अलग आन्दोलन हैं, रिनैसां के मूल में गैर ईसाई यूनान है और रिफौर्मेशन में धार्मिक पुनरुत्थान है और आपसी रंजिश, घृणा और टकराहटें हैं। 'भक्त कवियों ने प्रेम के मन्त्र से कर्म के बंधन काट दिए, पुरोहितों के रचे प्रलोभनों और आतंक (स्वर्ग-नरक) को पोंछ डाला और लोक जीवन में घुलकर मानववाद का उद्धोष किया। संतों भक्तों ने धर्मों के बीच की खाई को भर दिया था - वर्णभेद को भी पाट दिया था, पर यूरोप में ऐसा न हो पाया था। भाषा चाहे ब्रज-अवधी हो, या खडी़ बोली - मज़हब से परे थी।
 
रामविलास जी मानते हैं कि भक्ति साहित्य संगीत को महनीय देन की तरह था। वे कहते हैं जिसे शास्त्रीय संगीत कहा जाता है, और जो मूलत: लोकसंगीत है, भक्‍त कवि उसके निर्माता हैं।  


Ramvilas Sharma Udbhavana1वे कहते हैं कि ध्रुवपद और धमार गायकी ब्रज की थी और वहीं से वह ग्वालियर-आगरा और फिर दिल्ली के राजदरबारों में पहँची थी। यही ब्रजभाषा संगीत और फिर काव्य की मुश्तर्का भाषा भी थी। यही हिन्दुस्तानी संगीत और हिन्दी साहित्य का वैभव युग भी है। सुनीतिकुमार चाटुर्ज्‍या इसे तानसेन का जीवनकाल मानते हैं जब उनके समसामयिकों में मलिक मुहम्मद जायसी, तुलसीदास और एक पीढी़ पहले अन्धे कवि सूरदास हुए थे। यही 'हिंदी जाति' के निर्माण का काल है जब हिन्दू मुस्लिम मिलकर सांस्कृतिक अभिव्यंजनाएँ कर रहे हैं। और फिर अगर दिल्ली-आगरे के सुलतानों ने फारसी को राजभाषा बनाया था- तो उसका संबंध धर्मभाषा से नहीं मातृभाषा से ही था। यह भारतीय स्थापत्य का भी ज़रखेज़ युग था (उत्तर-दक्षिण दोनों ओर) और इसी समय चित्रकला में राजपूत और मुगल शैली की चित्रकला के फूल भी खिले थे। रामविलास जी मानों एक आह भरते हैं और भविष्य में देखते हुए कहते हैं कि आज जब सांस्कृतिक विघटन ज़ोर पकड़ रहा है तब साहित्य और संगीत की वह एकताबद्ध संस्कृति ही सही राह दिखाएगी। आचार्य बृहस्पति के उद्धरण देते हुए रामविलास जी हिन्दी भाषा, ब्रज और हिन्दूस्तानी संगीत में अमीर खुसरो को भी बडे़ आदर से याद करते हैं। वे ब्रज में जन्मे थे, उसके बाद अवध और फिर दिल्ली (कुरु जनपद) पहुंचे थे। अमीर खुसरो का रुझान भी शास्त्रीय संगीत से ज्यादा लोक संगीत की ओर था।
 
ब्रिटिश भारत ने ही हर चीज़ की तरह संगीत को भी हिन्दू-मुस्लिम में बांटने की कोशिश की - जबकि संगीत में सबकी समान भागीदारी थी।
रामविलास जी सूफ़ियों के योगदान के सम्मुख भी नतमस्तक भाव रखते हैं - जिनके दार्शनिक आधार में नवप्लेटोवाद के साथ साथ वेदान्त का भी आधार था। जात-पात को संतों की मानिंद उन्होंने भी नकार दिया था - लोक भाषा को अपना लिया था, उनकी खानकाहों में संगीत के सुर गूंजा करते जबकि मौलवियों की स्थिति इनसे अलग थी। उन्होंने लोकसंस्कृति से साहित्य की सामग्री ली थी और कव्वाल भारतीय भाषाओं में रहस्यवादी गीत गाते थे। संतों की संस्कृति जनवादी थी, उनके पद लोकगीतों से ही उठी हुई एक लहर थी। इसीलिए आज भी शास्त्रीय गायक सूर-मीरा के पद गाते हैं या, कि साज़ पर कोई लोक धुन बजाते हैं या फिर गायिकाएँ कजरी इत्यादि से समापन करती हैं या कहें कि संगीत के मूल स्रोत को प्रणाम करती हैं।
 
इसी तरह रामविलास जी ने कन्नड़ भाषियों के जातीय संगीत की भी बारीकी से चर्चा की है और यूरोप की परंपराओं का भी खुलासा किया है कि इटली अन्य कलाओं के अलावा संगीत का भी गढ़ था। वहाँ स्वरलिपि लिखने की परंपरा थी - जबकि भारत में गुरू शिष्य परंपरा पर ज्यादा जोर रहा है - लेकिन औद्योगिक क्रांति और पूंजीवाद ने जहाँ संगीत को सर्वजन सुलभ कराया वहाँ वाद्य यंत्रों में इतना सुधार कर दिया कि उसमें भारतीय मिठास ही न रही और लोगों ने उन्हें त्याग दिया।
 
इस तरह संगीत पर रामविलास जी का यह ग्रन्थ एक बार फिर उनकी समग्रतापरक दृष्टि का, दार्शनिक गहनता का प्रमाण है।
संदर्भ
1. शर्मा, राम विलास, आस्‍था और सौंदर्य, दिल्‍ली, राजकमल प्रकाशन, 1961, पृष्‍ठ 58.
2. शर्मा, राम विलास, संगीत का इतिहास और भारतीय नवजागरण की समस्‍याएं, दिल्‍ली, वाणी प्रकाशन, 2010, पृष्‍ठ 236.
3. शर्मा, राम विलास, संगीत का इतिहास और भारतीय नवजागरण की समस्‍याएं, दिल्‍ली, वाणी प्रकाशन, 2010, पृष्‍ठ 222.
4. शर्मा, राम विलास, संगीत का इतिहास और भारतीय नवजागरण की समस्‍याएं, दिल्‍ली, वाणी प्रकाशन, 2010, पृष्‍ठ 14.
5. शर्मा, राम विलास, संगीत का इतिहास और भारतीय नवजागरण की समस्‍याएं, दिल्‍ली, वाणी प्रकाशन, 2010, पृष्‍ठ 21.
6. शर्मा, राम विलास, संगीत का इतिहास और भारतीय नवजागरण की समस्‍याएं, दिल्‍ली, वाणी प्रकाशन, 2010, पृष्‍ठ 79.

रामविलास शर्मा की किताब पर यह समीक्षा उद्भावना के विशेषांक में छपी है

रविवार, जनवरी 23, 2011

अप्रतिम दीठ



विनोद कुमार शुक्‍ल के नौकर की कमीज, खिलेगा तो देखेंगे और दीवार में खिड़की रहती थी

उपन्यासों पर
सुमनिका सेठी और अनूप सेठी के बीच संवाद का तीसरा और अंतिम हिस्‍सा
विनोद कुमार शुक्ल का देखना

अनूप : आम तौर पर रचना में दो पहलुओं की छानबीन कर लेने से काफी कुछ पता चल जाता है कि उसमें क्या कहा है और कैसे कहा गया है। शुक्ल जी के संदर्भ में उनके देखने के अंदाज को देखना जरूरी लगता है। जैसे किसी भी घटना, पात्र, स्थिति, विचार, वस्तु को जानने के लिए यह जरूरी होता है कि हम उसे कहां से देखते हैं। दूर से, पास से, ऊंचे से, नीचे से, करुणा से, उदासीनता से, संलग्नता से या निर्लिप्तता या निर्ममता से। रचनाकार क्या पोजीशन लेता है, उससे उसके सरोकार तय हो जाते हैं
विनोद कुमार शुक्ल की दृष्टि अद्भुत है। वे अपने पात्र को मचान पर बैठकर या गर्त में गिराकर नहीं देखते। उनके पात्र न तो ऊंचाई से दिखने वाले खिलौने हैं, न ही नीचे से दिखने वाले भव्य महापुरुष‎‎। रचनाकार समस्तर पर रहकर देखता है। उसके पास पात्र को रंगने या बदरंग करने की कोई कूची भी नहीं है। जैसे रचनाकार को किसी चीज को जैसी है वैसा ही कहना बड़ा पसंद है। जैसे दिन की तरह का दिन था, या रात की तरह की रात थी। इसी तरह उसके पात्र जहां और जैसे हैं वे वास्तव में ही वहां और वैसे ही हैं। रचनाकार बस उनके अंग संग बना रहता हैý
सुमनिका : पर वो एक स्थिति को कोण बदल बदल के भी देखता है।
अनूप : इस देखने में मजे की बात है कि सिर्फ पात्र ही नहीं, पूरा जीवन-जगत ही उसके अंग संग है। उसमें व्यक्ति, प्राणि जगत और प्रकृति सब समाहित है। यहां व्यक्ति का मन भी उसी पारदर्शिता से दिखाता है जितनी स्फटिक दृष्टि से प्रकृति और वनस्पति जगत को देखा गया है
सुमनिका : हां। सम्पूर्ण जीवन के प्रति ऐसी समानुभूति कि एक हिलता हुआ पत्ता भी मानवीय स्थिति का हिस्सा ही होता है, संवादरत होता है। पेड़ की छाया भी, चींटी भी, चिड़िया भी, आलू प्याज और तोते का पिंजरा भी। सचमुच मुझे यह बचपन की नजर का अवतरण लगता है। जब कुछ भी निर्जीव नहीं होता। न ही अपने संसार से बाहर होता है। यह अद्भुत लौटना है। मैं इस नजर पर अभिभूत हूं
अनूप : विनोद कुमार शुक्ल के देखने में भावुकता नहीं है। निर्ममता और उदासीनता की कोई जगह नहीं है। पूरी तरह से संलिप्तता भी नहीं है। उस पर निर्लिप्तता की छाया प्रतीत होती है।
सुमनिका : हां, दृश्य पहली नजर में निर्लिप्त लगते हैं..
अनूप : हां, पर शायद इन्हीं दोनों के संतुलन से करुण दृष्टि का जन्म होता है। रचनाकार का देखना करुणा से डबडबाया हुआ है। यह एक दुर्लभ गुण है। इस तरह उपन्यासकार जीवन-जगत के सम-स्तर पर रहते हुए उसे करुणा-आप्लावित नजर से देखता है। इस वजह से उनका गद्य अनूठा बनता है। करुणा से देखे जाने के कारण ही रचना श्रेष्ठ होती है, इसमें कोई शक नहीं है। यहां रचनाकार प्रकृति और प्राणि जगत को भी उसी सजल नजर से देखता है। चाहे वे पेड़ पौधे हों, हाथी हो, चाहे बादल आकाश प्रकाश और अंधेरा हो।
सुमनिका : हां, यह उनकी बहुत बड़ी शक्ति है। और यह करुणा सपाट बयानी की तरह नहीं आती। करुणा पर वो एक झीना परदा डाल्ते हैं। यह उनके खास शिल्प का पर्दा है जिसमें लोक कथाएं, बच्चों के खेल और परी कथाओं का शिल्प है। सच और झठमूठ के खेल का एक निराला संतुलन बनता है
अनूप : विनोद कुमार शुक्ल की नजर में एक और गुण है, उनकी आर पार देखने की शक्ति। इसी नजर से वे आकाश को देखते हैं और उसमें अंधेरे उजाले को देखते हैं। इसी दृष्टि के कारण वे हाथी की खाली होती जगह देखते हैं और लिखते हैं 'हाथी आगे आगे निकलता जाता था और पीछे हाथी की खाली जगह छूटती जाती थी' यह पंक्ति दीवार में खिड़की रहती थी के पहले अध्याय का शीर्षक बनती है। यथार्थ को रूढ़िबध्द ढंग से देखने का आदी पाठक इस पंक्ति को निरर्थक पाता है। रूढ़ि में नवीनता देखने वाला पाठक इस पंक्ति में चमत्कार देखता है। लेकिन अगर आप ध्यान से पढ़ें और देखने लगें तो हाथी की जगह आपको दिखने लगेगी
सुमनिका : हम कह सकते हैं कि एक दृश्य के गतिशील तत्वों को वे देखते हैं तो रुके हुए तत्वों को भी। फोरग्राउंड को देखते हैं तो बैकग्राउंड को भी। और उन्हें इंटरचेंज भी कर देते हैं। कभी अग्रभूमि का आकार देखते हैं तो कभी पृष्ठभूमि का। जैसे अंधेरा और हाथी। फिर अंधेरे के हाथी। पानी के भीतर और पानी के ऊपर का अंधेरा। मनोविज्ञान में यह परसेप्शन का खेल होता है
अनूप : असल में विनोद कुमार शुक्ल को हड़बड़ी में नहीं पढ़ा जा सकता। धीरज से पढ़ने पर ही अनूठी दुनिया खुलती है। जाते हुए हाथी से हाथी की विशालता, कालेपन और मंद चाल का एहसास होता है। लेखक उसे दत्तचित होकर जाता देखता है। रघुवर प्रसाद, सोनसी और छोटू हाथी को इसी नजर से देखते हैं
सुमनिका : हां, वो दृश्य में इतने गहरे उतरते जाते हैं .. क्षण क्षण के विकास के साथ। और हम से भी उसी चाल की मांग करते हैं। और शायद ऊब की तोहमत इसी कारण लगती है कि हमारी नजर ऐसी विलंबित और दृश्य में डूबी हुई नहीं होती।
अनूप : इसी तरह रचनाकार प्रकाश और अंधेरे की छटाओं की विलक्षणता को देख और दिखाकर पाठक को आह्यलाद से भर देता है। खिड़की से बाहर जाता या अंदर आता अंधेरा या प्रकाश वास्तव में ही दिखने लगता है। गहन अंधेरे के बाद अत्यधिक उजाले को वे दो सूर्यों का उजाला कहते हैं। विरह के अंधेरे में पड़े रघुवर को दिन का उजाला इतना ज्यादा चुभता है मानो वह दो सूर्यों का उजाला हो। हाथी को स्वतंत्र करने का सुख रघुवर प्रसाद को इतना ज्यादा है कि उन्हें आगे पीछे अंधेरे का स्वतंत्र हुए हाथियों का जूलूस निकला हुआ महसूस होता है। इससे एक तरफ अंधेरे की सघनता का बिंब बनता है, दूसरी तरफ हाथी को आजाद करने का उल्लास सारे वातावरण में घुल जाता है। एक अन्य प्रसंग में बिजली के उजाले में गिरती हुई पानी की बूंदें दिखती हैं जो पतंगों की जरह जीवित दिखती हैंý
इसी में सोनसी का अपने घर जाने और रघुवर प्रसाद के विरह का प्रसंग भी बहुत मार्मिक है। यहां 'नहीं है' शब्दों की ध्वनि मानो कई दिन तक हवा में अटकी रहती है। रचनाकार मानो ध्वनि को भी देख रहा है। रघुवर प्रसाद हाथी को खोलने के लिए जा रहे हैं। जाते जाते सोनसी पेड़ पर बैठे रहने वाले लड़के के बारे में पूछती है। वे धीरे से चिल्ला कर कहते हैं 'नहीं है'। रात के सन्नाटे में यह आवाज आगे तक चली गई। एक और आदमी जो अपने घर के सामने बैठा था, उसने भी यह आवाज सुनी। वह सहज बोल उठा, 'कौन नहीं है' इसके बाद सोनसी के जाने का प्रसंग है। रघुवर प्रसाद को लगता है कि बस इस तरह रवाना हुई जैसे सोनसी को छीन कर ले गई। जो रघुवर खिड़की से बाहर अपने मन के लोक में रमे रहते थे, वे अचानक यांत्रिक हो जाते हैं। नवविवाहित का पत्नी के बिना मन नहीं लग रहा। रात को नींद खुलने पर वे सड़क पर आ जाते हैं। वे रात के सन्नाटे में 'नहीं है' शब्द बोलना चाहते हैं। उन्हें लगा 'नहीं है' जैसा वातावरण गहराया हुआ है। वे दृश्य की कल्पना सी करते रहते हैं जिसमें कोई आदमी फिर पूछता है 'कौन नहीं है भाई'। रघुवर कातर मन से कहते हैं 'सोनसी नहीं है'‎‎। यह ध्वनि मानों कई दिन तक अटकी रही आती है‎‎। यह रघुवर की अटकी हुई मन:स्थिति ही है
सुमनिका : कदम कदम पर उनके वर्णन करुण-हास्य या ब्लैक कामेडी के जीवित उदाहरण हैं
अनूप : हां। इस तरह हम कह सकते हैं कि विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों की विषय-वस्तु और शिल्प का आस्वाद तभी लिया जा सकता है जब हम उनके देखने को भी तनिक समझ लें। अगर उनकी तरह के देखने से हम तदाकार नहीं होते हैं तो हमें कथा, कथ्य, विषय-वस्तु बहुत साधारण लगेगा। उनके कहने का तरीका चामत्कारिक लगेगा। तब उपन्यासों को रूपवाद की तरफ ठेल दिया जाएगा। ऐसा करना इन उपन्यासों के साथ अन्याय होगा। इसका अर्थ है कि उपन्यासों के क्या और कैसे को उनकी अप्रतिम दीठ के जरिए समझने में मदद मिलती है
चित्र इंटरनेट से साभार

रविवार, जनवरी 16, 2011

अप्रतिम दीठ



विनोद कुमार शुक्ल के नौकर की कमीज, खिलेगा तो देखेंगे और दीवार में खिड़की रहती थी उपन्यासों पर सुमनिका सेठी और अनूप सेठी के बीच संवाद. दूसरा हिस्‍सा...
उपन्यास कैसे कहते हैं ?
अनूप: विनोद कुमार शुक्ल की कहनी अलग तरह की है। कुछ बिंदु हैं जिनकी मदद से उनके कथा लेखन को समझने में मदद मिल सकती है और उससे उपन्यास क्या कहते हैं, इसे जानने में और भी मदद मिल सकती है। उपन्यासकार कथा को रंग-संकेतों की तरह कहता है। वह कथा वर्णित नहीं करता। वह दृश्य का वर्णन करता है। दृश्य के अतिरिक्त कम ही बोलता है। इसमें दो शैलियां मिश्रित हो रही हैं। एक तो नाटक के रंग संकेत लिखने की शैली, दूसरे चित्रकला की तरह चित्र रचने की शैली
सुमनिका : चित्र तो हैं। लेकिन जितनी छोटी छोटी डिटेल इनके चित्रों में दिखती है वैसी तो किसी चित्रकृति में दिखाई नहीं देती। उसमें ऐसे छुपे हुए हिस्से तक प्रकट होते हैं जो एक दो आयामी चित्र में नहीं समा सकते। और फिर एक चित्र कई कई एसोसिएशन और इम्प्रेशन पैदा करता है। और वे कई समानांतरताएं सामने रखते जाते हैं। इससे अर्थ का दायरा भी विस्तृत होता जाता है।
अनूप : लेखक मन:स्थितियों को भी लगभग इसी चतुराई से वर्णित कर देता है। हिंदी में इस पध्दति से धारा-प्रवाह लेखन शायद कम ही हुआ है। इसलिए इसका प्रभाव भी अलग तरह से पड़ता है। संयोग से तीनों उपन्यासों में इसे शैली की तरह उन्होंने विकसित किया है। उनका लेखन समय लगभग बीस सालों तक फैला है। नौकर की कमीज 1979 में आया था। खिलेगा तो देखेंगे और दीवार में खिड़की रहती थी 1994 से 1996 के बीच लिखे गए हैं। जगदीश चंद्र की उपन्यास त्रयी की भी बहुत जमीनी हकीकत की कथा है, पर उसकी कहनी पारंपरिक गद्य लेखन की शैली है‎.
सुमनिका : उनका पूरा लेखन मुख्यधारा से अलग एक वैकल्पिक संसार रचता है। जिसमें शैली और शिल्प तक में भी उनकी सबाल्टर्न दृष्टि प्रकट होती है। लोक कथाएं और परिकथाएं और मिथक कथाएं, बच्चों के खेल और संवाद पूरी हकीकत को बेहद मासूमियत से उकेरते हैं
अनूप: विनोद कुमार शुक्ल के पात्र एक खास तरह की भाषा बोलते हैं। उनका अंदाज भी खास है। कई बार वह एक जैसा भी लगता है
सुमनिका : खास का मतलब है कि इतनी ज्यादा आम बल्कि कहें वास्तविक और ठेठ.. कि जहां कुछ भी अतिरेक नहीं होता। पर जिस तरह से विनोद कुमार शुक्ल अपने बड़े खास दृश्यों के बीच उन्हें रख देते हैं, उससे वे कविता के शब्दों की तरह उद्भासित हो जाते हैं
अनूप : नौकर की कमीज के बड़े बाबू और नायक संतू बाबू के संवाद कई जगह विसंगत (एब्सर्ड) नाटकों की याद ताजा करवा देते हैं। दीवार में खिड़की रहती थी के विभागाध्यक्ष भी कई बार त से कुत पर उतर आते हैं। ये लोग बेमतलब की बात करने लग जाते हैं। कई जगह उससे हास्य विनोद पैदा होता है, कहीं वह यूं ही ऊलजलूल संवाद बन के रह जाता है, एब्सर्ड नाटकों के संवाद की तरह
सुमनिका : मुझे बार बार कुछ ऐसा भी लगता है कि उपन्यासकार का कथ्य जो घनघोर यथार्थ और जीवन है, क्रूर और सुंदर भी है, उसे व्यक्त करने में लेखक उसे बच्चों के खेल संसार जैसा मासूम बना देता है। उनके संवाद, शिल्प, उछाह, सब जैसे शिशुता की रंगत से रंगे हैं। शायद इसीलिए उनमें लोककथाओं के संवादों सी पुनरावृत्ति, शैलीबध्दता और लय मिलती है। खिलेगा तो देखेंगे के कुछ दृश्य तो कार्टून फिल्म की याद दिलाते हैं। जब बस गुरूजी के परिवार को लेने आती है और उनके पीछे पड़ जाती है। वे उससे बचने के लिए पतली गली में जाते हैं। बस भी पतली हो के उस गली में घुस जाती है। वे सीढ़ियां चढ़ जाते हैं तो बस भी चढ़ जाती है। इसी तरह इसी उपन्यास में नवजात को सेकने का प्रसंग है। या चिरौंजी के चार बीजों से पेट भरने का प्रसंग है। ऐसा लगता है कि बच्चा अपनी अटपटी सरल रेखाओं में दुनिया को अंकित कर रहा है, दुख को और सुख को। क्योंकि बच्चे ही हैं जो नाटय और झूठमूठ में भी सचमुच का मजा लेते हैं‎.
अनूप : नौकर की कमीज में तो दफ्तर के बाबू लोगों ने एक जगह बाकायदा नाटक की दृश्य रचना की है। जैसे वे उसमें अभिनय करने वाले हों। हालांकि विसंगत नाटक बाहरी तौर पर अर्थहीन से होते हैं। वे सिर्फ एक माहौल की रचना करते हैं। यही माहौल नाटयानुभव में बदलता है। जबकि इन उपन्यासों की वर्णन शैली में कथा भी आगे बढ़ती है। विषय-वस्तु सामाजिक जीवन से गहरे जुड़ी हुई है। नौकर की कमीज और खिलेगा तो देखेंगे उदास कथा कहते हैं, वहीं दीवार में खिड़की रहती थी उल्लास से परिपूर्ण आख्यान है‎.
सुमनिका : यह नाट्य सुख उनके तीनों उपन्यासों में है। क्योंकि जीवन में जो कष्ट है वो सचमुच का है तो उसको झूठमूठ के सुख से ही मात दी जा सकती है। जैसे कोटवार पूरे यथार्थ भाव से झूठमूठ की बीड़ी पीने का सुख उठाता है। और गुरूजी झूठमूढ की बीड़ी न पीने को बजिद्द हैं कि उससे भी तो लत लग जाएगी। उपन्यासकार कहता भी है कि यह झूठमूठ धोखा देना नहीं है बल्कि खेल है और इसका सुतंलन जीवन में हो तो जीवन जीया जा सकता है
अनूप: उपन्यासकार चूंकि दृश्य का वर्णन करके ही कथा और चरित्र को आगे बढ़ाता है, इसलिए उसकी अपनी कोई भाषा या भंगिमा नहीं है। वर्णन की भाषा भी पात्रों की ही भाषा है। इस पर स्थानीयता का रंग काफी गहरा है। इसमें खास तरह की अनौपचारिकता, आत्मीयता और अकृत्रिमता है‎‎। यही उपन्यासकार की भाषा शैली बन जाती है। यह हमारे आंचलिक कथा साहित्य की भाषा से अलग है। विनोद कुमार शुक्ल की भाषा की यह खूबी है
सुमनिका: और उनका वाक्य विन्यास?
अनूप: विनोद कुमार शुक्ल की भाषा का वाक्य-विन्यास भी भिन्न है। इनके वाक्य छोटे होते हैं। आधुनिक पत्रकारिता में छोटे वाक्य लिखना अच्छा माना जाता है। वे किसी दृश्य या घटना का छोटा छोटा ब्योरा छोटे छोटे वाक्यों में देते हैं। इससे एक तरह का लोक कथा वाचन का रंग भी आता है। पर शुक्ल की कहानी में नाटकीय भंगिमा बिल्कुल नहीं है। बल्कि भंगिमा ही नहीं है। यही इसकी खूबी है। यह खूबी पात्रों के साथ मेल खाती है। क्योंकि पात्रों की भी कोई भंगिमा नहीं है। सीधे सादे जमीनी पात्र। गरीबी का गर्वोन्नत भाल लिए। यहां गरीबी या अभाव का रोना नहीं है। आत्मदया की मांग नहीं है। उससे बाहर आने के क्रांतिकारी तेवर भी नहीं हैं। असल में वे जैसे हैं, वैसे ही उपन्यासों में हैं। हां फ यह है कि ये वैसे नहीं हैं जैसा हम लोगों के बारे में सोचते हैं। विनोद कुमार शुक्ल का सारा गद्य ही वैसा नहीं है जैसा हम प्राय: पढ़ते हैं। यह अपनी ही तरह का गद्य है। इसने गद्य की रूढ़ि को तोड़ दिया है। हमें रूढ़ गद्य पढ़ने की आदत है। शायद इसीलिए विनोद कुमार शुक्ल पर उबाऊ गद्य लिखने की तोहमत लगती है‎.
सुमनिका : ऊब का कारण शायद पाठक की हड़बड़ी में छिपा है, कि वो उनकी चाल से दृश्य में नहीं रम पाता। वैसे विनोद कुमार शुक्ल के शिल्प में कदम कदम पर आभास एक दूसरे में बदल जाते हैं। जैसे गाड़ी का डिब्बा जीवन की गाड़ी का डिब्बा हो जाता है जिसमें परिवार के साथ गुरूजी बैठे हैं और टिकट जेब में है। जैसे बुखार की गाड़ी तीन दिन तक जिस्म के स्टेशन पर रुकी रह जाती है। पैरों में चप्पल नहीं होती लेकिन माहुर का लाल रंग हवा पे छूट जाता है। वैसे विसंगत नाटक वाली बात भी पते की है
चित्र इंटरनेट से साभार

मंगलवार, जनवरी 11, 2011

अप्रतिम दीठ


विनोद कुमार शुक्ल के नौकर की कमीज, खिलेगा तो देखेंगे और दीवार में खिड़की रहती थी उपन्यासों पर सुमनिका सेठी और अनूप सेठी के बीच संवाद. उपन्‍यास कया कहते हैं की आखिरी किस्‍त. इसके बाद आएगा कैसे कहते हैं और अंत में विनोद कुमार शुक्‍ल का देखना.


अनूप : दीवार में खिड़की रहती थी के रघुवर प्रसाद साइकिल के पैडल मारने वाले परिवार से हैं। नौकर की कमीज के संतू बाबू भी साइकिल से आगे नहीं सोचते। उन्हें दफ्तर के बड़े बाबू माल गोदाम से एक नई साइकिल निकलवा देते हैं। रघुवर प्रसाद को उसके पिता अपनी साइकिल भेज देते हैं। विभागाध्यक्ष स्कूटर वाले हैं। रघुवर को स्कूटर या कार खरीदने या उनकी सवारी करने की इच्छा नहीं है। हाथी पर भी वे डरते डरते ही चढ़ते हैं। हालांकि बाद में उस भारी भरकम पशु के मोह में भी पड़ जाते हैं। पर अंतत: उसकी जंजीर खोल कर उसे मुक्त कर देते हैं। हाथी को मुक्त करने की उन्हें बड़ी खुशी है‎.
सुमनिका : खिलेगा तो देखेंगे के अंतिम हिस्से में पहाड़ी से जो आदमी कांवर लिए उतरता है उसमें कंद, धान के बीज और शहद भरा है। ये कंद भी जमीन से निकले हैं। विनोद कुमार शुक्ल लिखते हैं, 'धान के मोटे बीज थे जिससे पेट भरता था। .. ये धान तेज आंधी में भी खेत में गिर नहीं जाता था, लहलहाता था। लहलहाने से बांस की धुन सुनाई देती थी।'
अनूप : अगर नौकर की कमीज में कमीज के जरिए विरोध का रूपक रचा गया है तो दीवार में खिड़की रहती थी में उपभोक्तवादी सभ्यता का एक बेहद रोमानी और मासूम प्रतिपक्ष रचा गया है। रघुवर प्रसाद की खिड़की एक स्वप्न लोक में खुलती है। सुबह-सवेरे, शाम-रात, सोते-जागते वे कभी भी उस खिड़की से बाहर प्रकृति की गोद में जा रमते हैं। यहां तक कि नहाना-धोना, कपड़े धोना जैसी नेमि क्रियाएं भी वहीं पूरी हो जाती हैं। रघुवर के माता पिता और विभागाध्यक्ष भी उस खिड़की से नीचे उतर चुके हैं। विभागाध्यक्ष के भीतर उस जगह के यथार्थ को जानने की छटपटाहट है। खिड़की से खुलने वाला यह संसार बड़ा सुरम्य है। वहां एक बूढ़ी अम्मा है जिसने सोनसी को सोने के कड़े दिए हैं। मजेदार बात यह है कि यह दुनिया भौतिकवादी दुनिया से बिल्कुल अलग है। यहां स्वच्छ जल वाले तालाब हैं। हरे-भरे पेड़ हैं। बंदर हैं, मछलियां हैं। हवा है, बादल हैं। लाभ-लोभ से परे का स्वच्छ निर्मल संसार है। ऐसा लगता है कि उपन्यासकार नौकर की कमीज और खिलेगा तो देखेंगे के खुरदुरे लेकिन बेहद देशज यथार्थ के बरक्स उतना ही देशज, लोककथाओं वाला रोमानी स्वप्न-संसार खड़ा करना चाहता है। यहां समृध्दि, सुख और तृप्ति के अर्थ ही भिन्न हैं। शायद इसीलिए यह वर्णन हमें अलग तरह का लगता है और अचम्भे में डालता है‎.
सुमनिका : शायद वे आदमी के भीतर उस दृष्टि को जगाना चाहते हों, उस खिड़की को खोलना चाहते हों, जहां से कल्पना लोक दिखता है और जो चीजों में सौंदर्य देख पाती है। कल्पना के रेशे बुनने वाली बुढ़िया से हमें मिलाना चाहते हों जो इस भौतिकवादी दुनिया में कहीं खो गई है
अनूप : नौकर की कमीज और दीवार में खिड़की रहती थी में पारिवारिक रिश्तों की एक टीस भरी कड़ी पिता-पुत्र के संबंध के रूप में आती है। बड़े बाबू का बेटा घर से भाग गया है। उन्हें लगता है वह उनके पीछे से घर में आता है। सामने नहीं पड़ता। एक स्वप्न जैसे प्रसंग में संतू मूंगफलीवाले को एक बच्चे के डूबने का किस्सा सुनाता है। बड़े बाबू को पता चलता है तो वे सच्चाई जानने मूंगफली वाले के पास पहुंच जाते हैं, यह जानते हुए भी कि यह सच्ची घटना नहीं है। सारे किस्से में उन्हें अपना पुत्र दिखता रहता है। इसी तरह दीवार में खिड़की रहती थी में दस ग्यारह साल का एक लड़का रघुवर के घर के सामने एक पेड़ पर चढ़कर बैठा रहता है। वह पिता की मार से डरता है और यहां छिपकर बीड़ी पीता है। पिता घर में होने न होने को अपने डंडे से जतलाते हैं। बाहर डंडा रखा हो तो पिता घर में है, डंडा नहीं है तो पिता घर में नहीं हैं। डंडा बाहर न होने पर ही पुत्र घर में घुसता है। सोनसी कभी कभार इस लड़के को कुछ खाने को भी दे देती है। रघुवर और सोनसी इन पिता-पुत्र का मेल करा देते हैं। विधुर पिता का पुत्र पर स्नेह अपने हिस्से की जलेबी देने से प्रकट होता है‎.
सुमनिका : खिलेगा तो देखेंगे में संबंधों की बड़ी प्रामाणिक और साथ ही बड़ी काव्यमय छवियां हैं। बेटी जिसके जन्म पर माता पिता एक चिड़िया की सीटी सुनते हैं और उसका नाम बेटी चिड़िया रख देते हैं। बेटा मुन्ना जो भूख को सहता रहता है फिर अचानक अवश होकर गिर पड़ता है और पूरा परिवार भूख की इस जंजीर से बंधे बच्चे की रक्षा का उपाय सोचा करता है‎.
अनूप : ये प्रसंग बहुत करुण और निष्कलुष हैं। असल में विनोद कुमार शुक्ल के सारे ही आख्यान में करुणा जीवन जल की तरह व्याप्त है। यथार्थ बहुत सच्चा और अकृत्रिम है। समाज का यह तबका कथा-साहित्य में कम ही आया है। बिना किसी तामझाम के आने की वजह से पाठक को हतप्रभ भी करता है। सच्चाई, निष्कलुषता और करुणा मिलकर सारे आख्यान को बेहद भावालोड़न से भर देते हैं